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सरकारी क़त्लेआम! चूक गए चौहान ...

icon कुलदीप सिंह | 0
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| जून 7 , 2017 , 22:37 IST | नई दिल्ली

मोदी राज में ये क्या हो रहा है?

किसानों की मांगों और असली स्थिति का अंदाज़ा लगाने में एमपी की शिवराज सरकार पूरी तरह नाकाम साबित हुई, जहां बात हो सकती थी वहां पुलिस ने गोली चलाई और 6 किसान मारे गए। नर्मदा यात्रा निकालने का जश्न मना रहे शिवराज सिंह को नींद तो बिल्कुल नहीं आ रही होगी। महाराष्ट्र में भी किसान आंदोलन तेज होता जा रहा है।

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सवाल ये है कि मोदी सरकार की उपलब्धियों का भोंपू बजा रही बीजेपी नेतृत्व वाली राज्य सरकारें किस बेफिक्री में जी रही हैं? सोशल मीडिया पर फोटो खिंचवाकर वाहवाही लूटने वाले नेताओं की आंखों पर भ्रम की पट्टी कैसे बंध गई? दो राज्यों (महाराष्ट्र और मध्य-प्रदेश) में किसानों का आक्रोश कोई एक रात के अंसतोष का नतीजा नहीं है। महाराष्ट्र में किसानों के आंदोलन की शुरुआत 22 मार्च को हुई थी जब किसानों ने अहमदनगर के पुणतांबा गांव में पहली बार हड़ताल करने का फैसला किया था। दरअसल हड़ताल नासिक जैसी बड़ी मंडी में दूध,फल सब्ज़ियों के उचित दाम नहीं मिलने को लेकर कॉल की गई थी। किसान लंबे वक्त से कर्ज़ माफी की मांग कर रहे थे, वो प्रोडक्शन कॉस्ट से 50 फीसदी ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग कर रहे हैं। किसानों के संगठन की मांग है कि 60 साल से ज्यादा उम्र के पारंपरिक किसानों के लिए पेंशन योजना भी लाई जाए। नजदीकी राज्य मध्य-प्रदेश में विरोध के सुर लापरवाह सरकार को 2 जून को सुनाई दिए जब किसानों ने सड़क पर उतरकर गुस्सा जाहिर करना शुरु किया। मंदसौर, नीमच, इंदौर, देवास, रतलाम, खंडवा, खरगोन में आंदोलन की आग फैल चुकी है, सड़क पर धू-धूकर जल रही गाड़ियां इस बात की तस्दीक कर रही हैं कि बात आसानी से दाएं बाएं नहीं होने वाली।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस कह रहे हैं कि 31 अक्टूबर तक किसानों की कर्ज़ माफी का फैसला कर लिया जाएगा लेकिन बाकी मांगों का क्या होगा नहीं मालूम! शिवराज सिंह चौहान मंदसौर गोलीकांड में मारे गए किसानों को एक करोड़ मुआवज़ा देने पर मजबूर हैं और कह रहे हैं कि बातचीत के बाद समस्या का हल निकाला जाएगा। तो क्या अब तक दोनो बीजेपी राज्य सरकारें सो रहीं थी, किसानों की मांगों पर जनप्रतिनिधियों ने क्या सरकार को नींद से जगाने की कोशिश नहीं की। क्या सरकारी मशीनरी भी सोशल मीडिया पर अपने आकाओं की खोखली उपलब्धियों का शंखनाद करने में व्यस्त थी?

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2007 में यूपीए -1 के दौरान स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट सरकार को सौंपी गई थी जिसमें कहा गया था कि किसानों को फसल की लागत में उसका 50 फीसदी लाभ जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाना चाहिए। अफसोस की बात ये है कि यूपीए सरकार इसे लागू करने में नाकामयाब रही। सत्ता में आने से पहले बीजेपी ने चुनावी वादा किया था कि वो स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों का लागू कर आत्महत्या पर मजबूर किसानों को संकट से उबार लेंगे, लेकिन लगता है सरकार वादा खिलाफी कर गई। बीजेपी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने तो यहां तक कह दिया था कि केन्द्र सरकार फसल बीमा योजना ले आई है लिहाज़ा स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने का कोई औचित्य ही नहीं बनता। अब जब संकट गहरा रहा है तो दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री बातचीत और मुआवज़े की दुहाई दे रहे हैं। कलेक्टर को सरेआम किसानो ने पीटा, पुलिस ने गोली से जो रास्ता खोला है उसपर सरकार चलेगी तो वोट नहीं मिलेंगे उल्टा सत्ता से विदाई हो जाएगी।

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आखिर ये सब हो क्यों रहा है? मोदी सरकार उद्योग और निवेश को बढ़ावा देने के नाम पर कॉरपोरेट घरानों का कर्ज़ माफ करने का मन बना सकती है लेकिन किसानों का नहीं! किसानों की आत्महत्या के लिए बदनाम विदर्भ का दर्द भी मुख्यमंत्री फडनवीस की समझ नहीं आता...आम आदमी मंहगी सब्जी, दाल खाने को मजबूर है, किसान फटेहाल हैं और बिचौलियों की मौज है, लेकिन इसका इलाज करने की फिक्र किसी को भी नहीं है। बीजेपी भले ही किसान आंदोलन को विपक्ष की साजिश करार दे लेकिन सच ये है कि इस बार किसान बिना किसी बड़े चेहरे और पार्टी पॉलिटिक्स के आर-पार के मूड में है। फडनवीस नए हैं मुमकिन है स्थिति को समझने में उनसे गलती हुई हो लेकिन शिवराज सिंह चौहान तो तीसरी बार सत्ता में है और 2018 में फिर चुनावी ताल ठोंकने की जुगत लगा रहे हैं। ऐसे में किसानों की मांगों को हल्के में लेने वाले शिवराज को नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं। पुलिस की गोली की गूंज गांव-गांव जा रही है... गलत प्रशासनिक फैसलों की आंच से अब बिना झुलसे निकल पाना मुमकिन नहीं है....

धैर्य रखते तो बात हो सकती थी लेकिन अब क्या फायदा किसानों का सरकारी कत्लेआम तो हो गया... अब तो चूक गए चौहान!