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पति पत्नी में समझौता न हो तो तलाक के लिए खत्म हो सकता है कूलिंग पीरियड: सुप्रीम कोर्ट

श्वेता बाजपेई, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| सितंबर 13 , 2017 , 11:51 IST | नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आपसी सहमति से तलाक के मामले में अगर दोनों पक्षों में समझौते की गुंजाइश न बची हो तो 6 महीने के कूलिंग (वेटिंग) पीरियड को अदालत खत्म कर सकती है। बता दें कि हिन्दू मैरिज एक्ट के मुताबिक तलाक के लिए आवेदन करने पर पति पत्नी को 6 महीने का समय देता था जिसमें वे अपने फैसले पर एक दोबारा सोचते थे। इसे 'कूलिंग पीरियड' कहा जाता था। कूलिंग पीरियड के बाद भी अगर पति पत्नी राजी नहीं होते थे तो उन दोनों के बीच तलाक हो जाता था।

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तलाक के लिए दोनों पक्षों को 6 महीने तक इंतजार करना अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि अगर पति और पत्नी, दोनों ने एक साथ न रहने का फैसला ले लिया है और उन दोनों के बीच बच्चों की कस्टडी को लेकर सहमति बन गई तो दोनों अदालत से 6 महीने की कूलिंग पीरियड को खत्म करने का गुहार लगा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और यु यु ललित की बेंच ने इस बारे में कहा कि अंतिम आदेश के लिए 6 माह का वक़्त लेना सिविल जज पर निर्भर होगा। अगर जज चाहे तो तुरंत तलाक का आदेश दे सकते हैं।

अदालत दिल्ली के एक कपल की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसने आपसी सहमति से तलाक के मामले में छह महीने के वेटिंग पीरियड को खत्म करने की गुहार लगाई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोर्ट यह देखे कि दोनों पक्षों में समझौते की कोशिश हुई है लेकिन समझौते की कोशिश फेल हो गया हो। दोनों पार्टी में तमाम सिविल और क्रिमिनल मामले में समझौता हुआ हो और गुजारा भत्ता और बच्चों की कस्टडी तय हो गई हो। ऐसी स्थिति अगर बन गई है तो वेटिंग पीरियड उनके कष्ट को ही लंबा करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में पहले मोशन के 7 दिनों के बाद दोनों पक्ष वेटिंग पीरियड को खत्म करने की अर्जी के साथ सेकंड मोशन दाखिल कर सकते हैं और कोर्ट उक्त परिस्थितियों के आधार पर वेटिंग पीरियड को खत्म करने का फैसला ले सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने उन ख़ास परिस्थितियों को भी अपने फैसले में भी स्पष्ट किया है जिनमें तलाक का आदेश फौरन दिया जा सकता है :-

1. अगर 13B(2) में कहा गया 6 महीने का वक़्त और 13B(1) में कहा गया 1 साल का वक़्त पहले ही बीत चुका हो। यानी तलाक की अर्ज़ी लगाने से डेढ़ साल से ज़्यादा समय से पति-पत्नी अलग रह रहे हों।

2. दोनों में सुलह-सफाई के सारे विकल्प असफल हो चुके हों। आगे भी सुलह की कोई गुंजाईश न हो।
3. अगर दोनों पक्ष पत्नी के गुज़ारे के लिए स्थाई बंदोबस्त, बच्चों की कस्टडी आदि मुद्दों को पुख्ता तौर पर हल कर चुके हों।
4. अगर 6 महीने का इंतज़ार दोनों की परेशानी को और बढ़ाने वाला नज़र आए।


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