ख़ास रिपोर्ट

पुण्यतिथि विशेष ‘चे ग्वेरा’: क्रान्ति का अंतर्राष्ट्रीय चेहरा जिनकी 39 की उम्र में हत्या कर दी गई

शाहनवाज़ ख़ान , ब्लॉगर | 0
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| अक्टूबर 9 , 2017 , 16:53 IST | नई दिल्ली

क्रांति के पर्याय, पेशे से डॉक्टर, 33 साल की उम्र में क्यूबा के उद्योग मंत्री और अमेरिका की बढ़ती ताकत को पचास और साठ के दशक में चुनौती देने वाले युवक– अर्नेस्तो ‘चे ग्वेरा’ का जन्म 14 जून 1928 को अर्जेंटीना के रोसरिओ में हुआ था। उन्होंने अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस एयर्स के एक कॉलेज से डॉक्टरी की पढाई की। अपने पढाई के दौरान ही उन्होंने दक्षिणी अमरीका का दौरा किया था।

अपने आसपास ग़रीबी और शोषण देखकर उनका झुकाव मार्क्सवाद की तरफ़ हो गया। चे के अनुसार इस गरीबी और आर्थिक विषमता के मुख्य कारण पूंजीवाद, नव-उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद थे जिनसे छुटकारा पाने का एकमात्र तरीका विश्व क्रांति था।

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इसी मकसद पर काम करते हुए चे ने गुआटेमाला के राष्ट्रपति याकोबो आरबेंज़ गुज़मान के द्वारा किए जा रहे समाज सुधारों में भाग लिया। उनकी क्रांतिकारी सोच और मजबूत हो गई जब 1954 में गुज़मान को अमरीका की मदद से हटा दिया गया। इसके बाद 1955 में यानी 27 साल की उम्र में चे फिदेल कास्त्रो से मिले और क्यूबा की जुलाई क्रांति में शामिल हो गए। चे शीघ्र ही क्रांतिकारियों की कमान में दूसरे स्थान तक पहुँच गए और बातिस्ता के राज्य के विरुद्ध दो साल तक चले अभियान में इन्होंने मुख्य भूमिका निभाई।

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क्यूबा की क्रांति में अहम् भूमिका निभाने के बाद चे 31 साल की उम्र में क्यूबा के राष्ट्रीय बैंक के अध्यक्ष बन गए और उसके बाद क्यूबा के उद्योग मंत्री भी बने। 1964 में चे ग्वेरा ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में क्यूबा की ओर से भाग लिया। इस 36 वर्षीय नेता को सुनने के लिए दुनिया भर के वरिष्ट नेता आतुर थे।

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37 साल की उम्र में क्यूबा के सबसे ताक़तवर युवा ‘चे ग्वेरा’ ने क्रांति की संदेश अफ़्रीका और दक्षिणी अमरीका में फैलाने का प्राण लिया और उन्होंने काँन्गो में विद्रोहियों को गुरिल्ला लड़ाई की पद्धति सिखाई। फिर उन्होंने बोलीविया में विद्रोहियों को प्रशिक्षित करना शुरू किया। अमरीकी खुफ़िया एजेंट चे ग्वेरा को खोजते रहे और आख़िरकार बोलीविया की सेना की मदद से चे को पकड़ लिया और उनकी गिरफ्तारी के एक दिन बाद आज ही के दिन 9 अक्टूबर, 1967 को उनकी हत्या कर दी गई। चे ग्वेरा को जब मारा गया उनकी उम्र 39 साल थी। मरते वक्त चे ने बोलिवियाई सार्जेंट टेरान से कहा था-तुम एक इंसान को मार रहे हो, पर उसके विचार को नहीं मार सकते।

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उन्होंने एक मोटरसाइकिल से पूरे लैटिन अमेरिकी देशों की यात्रा की थी और इन देशों में व्याप्त गरीबी और शोषण को काफी करीब से महसूस किया था। चे ने अपनी इस यात्रा पर एक डायरी भी लिखी थी। जिसे उनकी मौत के बाद द मोटरसाइकिल डायरी के नाम से छापा गया और 2004 में ‘द मोटरसाइकिल डायरीज’ नाम से एक फिल्म भी बनी।

यह भी देखें : द मोटरसाइकिल डायरीज का ट्रेलर

चे की छवि अक्सर एक हिंसक हत्यारे के रूप में गढ़ी जाती है, लेकिन चे ग्वेरा एक लड़ाके थे जिन्हें दुनिया के शोषितों से प्यार था। उनका कहना था कि एक सच्चा क्रांतिकारी प्यार की गहरी भावना से संचालित होता है।

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ग्वेरा की भारत यात्रा -

चे जब क्यूबा की सरकार में मंत्री थे तब उन्होंने भारत की यात्रा की थी। इस यात्रा के बाद चे ने 1959 में भारत रिपोर्ट लिखी थी जो उन्होंने फ़िदेल कास्त्रो को सौंपी। इस यात्रा के दौरान चे की मुलाक़ात भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु से भी हुई थी।

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नेहरु को उन्होंने क्यूबा की मशहूर सिगार भेट की और नेहरु ने उन्हें स्मृति चिन्ह के रूप में एक खुकरी दी थी जिसमे देवी दुर्गा की मूर्ती चिन्हित थी।

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अपनी विदाई को याद करते हुए चे ग्वेरा ने लिखा था, "जब हम भारत से लौट रहे थे तो स्‍कूली बच्‍चों ने हमें जिस नारे के साथ विदाई दी, उसका अनुवाद कुछ इस तरह है- क्यूबा और भारत भाई भाई। सचमुच, क्यूबा और भारत भाई भाई हैं।”

चे की भारत यात्रा की ख़ास बात यह है की 2007 तक इसकी जानकारी किसी को नहीं थी। 2007 में वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने अपनी क्यूबा यात्रा के दौरान इसका एक सिरा तलाशा और फिर भारत आकर भी काफी शोध के बाद कास्त्रो कि उस यात्रा के संदर्भ में अहम तथ्य जुटाए और सितम्बर में अपना लेख छापा जिससे लोगों को चे के भारत यात्रा की जानकारी मिली। 


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