राजनीति

कैराना में बीजेपी को धराशायी कर विजयी पताका लहराने वालीं तबस्सुम हसन कौन हैं?  

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 1
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| जून 1 , 2018 , 19:56 IST

उपचुनाव में मिली हार के बाद यह बहस छिड़ गई है कि क्या 2019 का लोकसभा चुनाव बीजेपी के लिए उतना आसान नहीं रहने वाला है जितना 2014 में रहा था। बीजेपी की हार में सबसे बड़ा सबब बना कैराना। कैराना की सीट से गठबंधन की उम्मीदवार बेगम तबस्सुम हसन ने बीजेपी की मृगांका सिंह को हराकर फतह हासिल की। तबस्सुम हसन के लिए ना तो राजनीति नई है ना ही जीत।

कौन हैं तबस्सुम हसन

तबस्सुम कैराना से सांसद रह चुके अख्तर हसन की बहू और मुन्नवर हसन की पत्नी हैं। हसन परिवार कैराना की राजनीति का काफी पुराना खिलाड़ी रहा है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद साल 1984 के चुनावों में सहानुभूति की लहर पर चढ़कर चौधरी अख्‍तर हसन ने बड़ी जीत दर्ज की थी। इससे पहले सिर्फ 1971 में ही कांग्रेस यहां से जीत सकी थी। अख़्तर हसन की राजनीतिक विरासत उनके बेटे मुनव्वर हसन ने संभाली और 1991 में पहली बार वो कैराना सीट से विधायक बने। इस चुनाव में उन्होंने हुकुम सिंह को हराया था।

2009 में मुनव्वर हसन की पत्नी तबस्सुम हसन बसपा के टिकट पर कैराना लोकसभा सीट से सांसद चुनी गईं। इसी चुनाव के साथ राजनीति में प्रवेश कर रहीं तबस्सुम ने छह बार कैराना से विधायक रहे हुकुम सिंह को हराया था। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में हुकुम सिंह ने उनके बेटे को हराकर इस हार का बदला ले लिया।

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2014 में तबस्सुम हसन के बेटे नाहिद हसन बीजेपी लहर के चलते हारे थे, लेकिन इलाके के लोगों के मुताबिक ये हार उनके परिवार में पड़ी फूट का नतीजा थी। तब नाहिद हसन समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार थे और उनके चाचा कंवर हसन बीएसपी के टिकट पर चुनाव लड़े थे। इस चुनाव में नाहिद हसन दूसरे नंबर पर और उनके चाचा तीसरे नंबर थे।

सहारनपुर के जेबीएस इंटर कॉलेज से हाई स्कूल तक पढ़ीं तबस्सुम मुस्लिम गूजर समुदाय से संबंध रखती हैं। कैराना में हिंदू और मुस्लिम गूजरों की संख्या करीब तीन लाख है और राजनीतिक रूप से ये काफी प्रभावी भूमिका में रहते हैं।

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सामाजिक और धार्मिक कार्यों में रुचि रखने वालीं तबस्सुम हसन उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की सदस्य हैं। उपचुनाव में जीत दर्ज कराने के साथ ही वो लोकसभा में उत्तर प्रदेश से मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली एकमात्र महिला होंगी। 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम उम्मीदवार जीत हासिल नहीं कर सका था।


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