ख़ास रिपोर्ट

फिर गुस्से में हैं पाकिस्तानी हिन्दू!

वीरमा राम, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 9
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| जून 20 , 2017 , 12:29 IST | थारपारकर

जिसका अंदेशा था वही हुआ। पाकिस्तान के सिंध सूबे में एक नाबालिग हिन्दू दलित लड़की का अपहरण होता है, लड़की के परिजनों को अंदेशा था कि लड़की का जबरन धर्मान्तरण करवाने के बाद उसकी शादी करवा दी जाएगी, और हुआ भी ठीक ऐसा ही। 

पूरा मामला रेगिस्तानी थारपारकर जिले में नगरपारकर इलाके के वरयानों गांव का है। रविता मेघवार (या मेघवाल) नाम की एक 16 वर्षीय नाबालिग लड़की के परिजनों का आरोप था कि रविता को उनके गांव के ही कुछ दबंग उठा ले गए हैं। आरोपों के मुताबिक अपहरणकर्ताओं ने 5 जून की रात इस नाबालिग के परिवार के 15 सदस्यों को नींद की गोलियां खिलाई और रविता को अगवा कर ले गए। परिवार का कहना था कि रविता का जबरन धर्मान्तरण करवा कर गांव के प्रभावशाली सैयद नवाज अली शाह के साथ उसकी शादी करवा दी जाएगी।

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ठीक दस दिन बाद ऐसा ही हुआ जब 16 जून को रविता मेघवार से गुलनाज बन चुकी यह लड़की अपने से दोगुनी उम्र के पति नवाब अली शाह के साथ उमरकोट में मीडिया के सामने आई। इस मौके पर सैयद नवाज अली शाह और उसके साथियों का कहना था कि लड़की बालिग है और उसने सबकुछ अपनी मनमर्जी से किया है। रविता के धर्मांतरण सर्टिफिकेट और शादी के प्रमाण-पत्र में कहा गया है कि उसकी उम्र 'लगभग '18 साल है। हां, मैरिज रजिस्ट्रार के दस्तावेज में नवाज अली शाह की जन्मतिथि 1980 बताई गई है।

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उधर रविता के परिवार और उनकी पैरवी करने वालों का कहना है कि रविता की उम्र 18 साल से कम है और ‘हिन्दू मैरिज एक्ट' के तहत 18 साल से कम उम्र की किसी हिन्दू लड़की का धर्म परिवर्तन नहीं करवाया जा सकता है। पूरे मामले को लेकर परिवार, हिन्दू समुदाय के लोग और मानवाधिकार कार्यकर्ता जो सवाल उठा रहे थे वो वाजिब भी लगते हैं, क्योंकि 6 जून को ही लड़की का धर्म परिवर्तन करवा लिया गया, जिस दिन उसे अगवा किया था और उसी दिन दोनों ने (दस्तावेजों के मुताबिक) उमरकोट जिले के यूनियन काउंसिल समारो के रजिस्ट्रार दफ्तर में शादी भी कर ली। लेकिन रविता के परिवार ने प्राइमरी स्कूल का जो दस्तावेज (TC) पेश किया है उसके मुताबिक उसकी जन्म तिथि 14 जुलाई 2001 है, यानि रविता 16 साल की भी अभी नहीं हुई है और नाबालिग है जो कानूनन शादी नहीं कर सकती। 

उधर मैरिज रजिस्ट्रार के दफ्तर से जारी शादी प्रमाण-पत्र में रविता की उम्र लगभग 18 साल बताई गई है लेकिन यहां उसके नेशनल आइडेंटिटी कार्ड नंबर का कोई जिक्र नहीं है। इस शादी के प्रमाण पत्र का आधार है रविता का धर्मांतरण सर्टिफिकेट, जिसमें भी बिना नेशनल आइडेंटिटी कार्ड नंबर का जिक्र किए उसकी उम्र लगभग 18 साल बताई गई है। यह सर्टिफिकेट उमरकोट जिले के समारो में स्थित मदरसे 'मजदीदया गुलज़ार खलील' के पीर मोहम्मद अय्यूब जान फ़ारूकी (धार्मिक उपदेशक) की दस्तखत से जारी किया गया है, जहां लगभग 18 साल की उम्र के साथ-साथ रविता का नया नाम गुलनाज लिखा गया है।

यहां यह बताना जरूरी कि सूफीवाद से बेहद प्रभावित सिंध में पीर-पगारों का बड़ा प्रभाव है. इनमें से कुछ तो धर्मांतरण को लेकर कुख्यात भी हैं जिनमें ऊपरी सिंध के घोटकी जिले में दाहरकी स्थित भरचुंडी शरीफ दरगाह के गादीपति मियां मिठ्ठू का नाम सबसे ऊपर है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के पूर्व सांसद पीर अब्दुल हक उर्फ मियां मिठ्ठू बड़ी संख्या में हरेक साल धर्मांतरण करवाते हैं। अल्पसंख्यकों के लिए 'सिंबल ऑफ टेरर’ बन चुके मियां मिठ्ठू का दावा है कि उनके पास लोग मनमर्जी से इस्लाम ग्रहण करने आते हैं। हालांकि इन्हीं आरोपों के चलते पिछली मर्तबा पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने मियां मिठ्ठू का संसदीय चुनावों के दौरान टिकट जरूर काट दिया था। वैसे इस मामले में पीर मोहम्मद अय्यूब जान फ़ारूकी (जिन्होंने रविता को धर्मांतरण का प्रमाण पत्र दिया) कोई बड़ा या जाना-पहचाना नाम नहीं है।

ऐसा भी नहीं है कि इस मामले में पुलिस बिल्कुल हाथ धरे बैठी है। पुलिस ने पाकिस्तानी पीनल कोड के सेक्शन 365-B (किसी महिला को जबरन उठाना और इच्छा के विरुद्ध शादी) के तहत 4 लोगों के खिलाफ मामला भी दर्ज किया गया है, लेकिन पुलिस सिंध हाईकोर्ट के नोटिस का हवाला देते हुए आरोपियों को गिरफ़्तारी नहीं कर पा रही है। दरअसल अब नवाज, रविता के परिवार वालों से ही खुद की जान को खतरा बता रहा है और उसने सिंध हाईकोर्ट में याचिका दायर करते हुए सुरक्षा देने, धर्म परिवर्तन और शादी को जायज ठहराने की मांग की है जिसके बाद पुलिस लाचार है। दूसरी तरफ पूरे मामले को लेकर रविता के परिवार को गांव छोड़ने के लिए बाध्य किया जा रहा है जहां इनके वरयानों गांव में मेघवार समुदाय के महज चार घर ही हैं.  और अब खबरों में मुताबिक परिवार ने गांव छोड़ पाकिस्तान के एकमात्र हिन्दू बहुल शहर मिठी में पनाह ले ली है।

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उधर रविता के परिवार वालों ने भी सिंध हाईकोर्ट का रुख किया है। रविता के पिता संतराम उर्फ़ सतियो मेघवार के वकील भगवानदास के मुताबिक यह शादी 'सिंध चाइल्ड मैरिज रेस्ट्रेंट एक्ट  2013' का उल्लंघन है जिसके तहत 18 साल से कम उम्र में शादी करना कानूनन जुर्म है। साथ ही परिवार का कहना है कि प्राथमिक शिक्षा के बाद रविता घर से बाहर ही नहीं निकली ऐसे में किसी के सम्पर्क में आने और मनमर्जी से भाग जाने की बात बेमानी है। 

घर वापसी की उम्मीद कम 

भले ही परिवार, उनके रिश्तेदार, सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता रविता को नाबालिग साबित करने और घर वापसी के लिए जुटे हुए हैं। लेकिन ऐसा होगा इसकी उम्मीद बेहद कम है. यह एक तथ्य है जिसके पक्ष में कई उदाहरण मौजूद हैं। मसलन, ऐसे ही एक मामले में साल 2014 में 12 साल की अंजलि कुमारी के अपहरण के बाद उसका धर्म परिवर्तन करवा, शादी करवा दी गई थी। मामला कोर्ट में गया तो दोनों पक्षों की तरफ से दस्तावेज पेश किए गए लेकिन सिंध हाइकोर्ट ने अंजलि की उम्र वैज्ञानिक आधार पर पता लगाने की फैसला लिया और इसके लिए डॉक्टर्स की एक टीम गठित की। इन डॉक्टर्स ने जांच के बाद अंजलि कुमारी की उम्र करीब 14-15 साल ही बताई थी। इस आधार पर सिंध हाइकोर्ट ने अंजलि को शेल्टर होम में भिजवा दिया लेकिन कुछ ही महीनों बाद उसे फिर अगवाकर्ता (या शादी करने वाले) रियाज़ सियाल को सौंप दिया गया। 

सबसे दुखद बात यह है कि रिंकल कुमारी हो, आशा कुमारी हो या फिर अंजलि कुमारी मेघवार जैसी अगवा हो चुकी (या फिर घर से भाग चुकी) सैंकड़ों लड़कियों के वर्तमान जीवन का कोई अता-पता नहीं है। क्या वे पत्नी के रूप में सम्मानजनक जीवन जी रही हैं?, बेच दी गईं हैं? या फिर गुलाम के रूप में जिंदगी व्यतीत कर रही हैं, किसी को कुछ पता नहीं। ये लड़कियां कभी नहीं मिलतीं, न मीडिया को और न ही सामाजिक-मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को।

दूसरा चिंतित करने वाला पहलू यह है कि इस तरह की घटना का थारपारकर जिले में होना. ऊपरी  सिंध के लरकाना, घोटकी, जकोबाबाद जिलों के साथ-साथ बदिन, सांघड़, मीरपुरखास जैसे इलाकों में नाबालिग हिन्दू लड़कियों के धर्म परिवर्तन की कई घटनाएं पहले भी सामने आती रही हैं लेकिन इस मामले में थारपारकर जिला एक अपवाद ही रहा है। करीब 50 फीसदी हिन्दू आबादी वाले रेगिस्तानीजिले थारपारकर को कौमी एकता और भाईचारे के लिए जाना जाता है लेकिन इस ताजा प्रकरण से थर (थार) के इलाके में शांतिपूर्ण और भाईचारे वाले माहौल को एक जबरदस्त धक्का लगा है। बड़ी संख्या में सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता लड़की की घर वापसी और कानूनन कार्रवाई की वकालत कर रहे हैं। उनके मुताबिक इस घटना से इलाके में आपसी विश्वास और सौहार्दता का वातावरण बिगड़ सकता है।

सोशल मीडिया पर भी मेहर तरार जैसे हजारों लोग धार्मिक नेता द्वारा जारी किए गए सर्टिफिकेट पर सवाल उठाते पूरे मामले की जांच और न्याय की मांग कर रहे हैं। 

अहम बिल पर जम चुकी है धूल

पिछले 6-7 महीनों में पाकिस्तानी हिन्दू बिरादरी के लिए दो मौके थोड़ी बहुत खुशखबरी लेकर आए. पहला, 24 नवंबर 2016 को जब अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार और जबरन धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए सिंध सूबे की असेंबली ने 'सिंध क्रिमिनल लॉ (प्रोटेक्शन ऑफ माइनॉरिटी) एक्ट 2015' पारित किया था। बिल के मुताबिक 18 वर्ष से कम आयु का कोई हिन्दू धर्म परिवर्तन नहीं कर सकता, साथ ही किसी हिन्दू का जबरन धर्म परिवर्तन करवाना कानूनन एक जुर्म है। वहीं जबरन धर्म परिवर्तन (हिंदुओं के साथ-साथ दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों के लिए भी) के मामलों में पांच साल से उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान किया गया था। उस समय तमाम राजनीतिक दलों में इसका श्रेय लेने की होड़ मची थी, मिठाइयां बांटी गई थी लेकिन अब यह बिल धूल फांक रहा है। बिल को राज्यपाल ने संशोधन के लिए वापस लौटा दिया। इसकी असली वजह थी जमात-ए-इस्लामी जैसे धार्मिक संगठनों का दबाव. इन संगठनों को बिल के उस क्लॉज़ से आपत्ति है जिसमें कहा गया है कि 18 वर्ष से कम आयु का कोई हिन्दू धर्म परिवर्तन नहीं कर सकता।

हिन्दू नेताओं और सामाजिक-मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की दलील है कि जब 5 से 9 साल उम्र की लड़कियों को धर्म के बारे में कोई जानकारी ही नहीं होती फिर उनका धर्मांतरण कैसे हो जाता है? इन लोगों के मुताबिक यह सब कुछ जबरन होता है जिसे मुस्लिम विद्वान भी गैर-इस्लामी

मानते हैं  लेकिन जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों का हजरत अली (जिन्होंने 10 साल की उम्र में इस्लाम कबूल किया था) का हवाला देते हुए कहना है कि धर्म परिवर्तन को लेकर इस्लाम में उम्र का कोई प्रावधान नहीं है।

दूसरी खुशखबरी, इस साल 19 मार्च को आई, जब पाकिस्तानी संसद में 'हिन्दू मैरिज एक्ट 2017' पारित हो गया। इस एक्ट के मुताबिक अब हिन्दू शादियों को रजिस्ट्रेशन के जरिए वैधता मिलेगी। इससे पहले पाकिस्तान में हिन्दू शादी की वैधता का कोई प्रावधान ही नहीं था, यानि कोई हिन्दू यह साबित नहीं कर पाता था कि वो किसी का पति है या फिर पत्नी है. ऐसे में जबरन अगवा की गई या फिर मनमर्जी से भागी शादीशुदा हिन्दू महिला के परिवार वालों के पास कोई सबूत ही नहीं होता था कि उक्त महिला शादीशुदा है। ऐसे में 'हिन्दू मैरिज एक्ट 2017' पाकिस्तानी हिन्दुओं के लिए थोड़ी बहुत राहत लेकर आया। फिर भी यह एक्ट करीब 3 करोड़ पाकिस्तानी हिंदुओं (1998 की आखिरी जनगणना के मुताबिक 2,443,614) के लिए एक मामूली प्रावधान ही है।

ईशनिंदा कानून

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय के लिए एक और खतरनाक चीज है, वहां का ईशनिंदा कानून। इस कानून के तहत 50 फीसदी से ज्यादा मामले अल्पसंख्यक समुदाय (बड़ी संख्या में ईसाई और अहमदिया समुदाय भी) के खिलाफ दर्ज होते हैं। इनमें ज्यादातर मामले झूठे, दुर्भावना और बदले की भावना के चलते दर्ज किए जाते हैं। हां, ईशनिंदा के मामले में जनता तुरंत कानून हाथ में भी ले लेती है ठीक उसी तरह जैसे भारत में कथित गौरक्षक लेते हैं. जिस तरह भारत में कथित गौरक्षक, मोहम्मद अखलाक सैफी और पहलू खान मेवाती को पीट-पीट कर मार डालते हैं उसी तरह पाकिस्तान में भी मशाल खान (अब्दुल वली खान यूनिवर्सिटी मरदान, खैबर पख्तूनख्वा) और सलमान तासीर (पूर्व गवर्नर, पाकिस्तानी पंजाब) जैसे लोग भीड़ और उन्माद का शिकार बन जाते हैं। पिछले दिनों बलोचिस्तान के लासबेला जिले में हब नामक जगह के निवासी प्रकाश कुमार को ईशनिंदा के मामले में फंसा कर कुछ लोगों ने खूब हंगामा किया लेकिन पुलिस की सूझबूझ से प्रकाश कुमार, पहलू खान होने से बच गया जिसके चलते लासबेला पुलिस की खूब तारीफ भी हो रही है।

खैर, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और तमाम  इस्लामिक विद्वान भी बार-बार कह चुके हैं कि जबरन धर्मांतरण गैर-कानूनी और गैर-इस्लामिक है लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय का आरोप है कि यह निरन्तर जारी है। 'औरत फाउंडेशन' नाम के एक एनजीओ की 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में हरेक साल अल्पसंख्यक समुदाय की करीब 1 हजार लड़कियों का धर्म परिवर्तन करवाया जाता है (मुख्यत ईसाई और हिन्दू)। रिपोर्ट के मुताबिक निःसन्देह इच्छा से धर्म परिवर्तन भी होता है लेकिन पाकिस्तान में जबरन धर्मांतरण एक कटु सत्य है. इस पूरे मामले में सबसे बड़ी दुर्गति सिंध और पंजाब में रहने वाले दलित समुदाय की है जिनमें मेघवार (मेघवाल), भील, कोली, ओड, वागरी, सांसी, जोगी, वाल्मिकी, जटिया, कलाल, खटीक, नट, गरगुला जैसी 40 जातियां शामिल हैं। 


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