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फटा कुर्ता पहनने को मजबूर थे भारत के दूसरे प्रधानमंत्री, पुण्यतिथि पर खा़स बातें

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जनवरी 11 , 2018 , 12:09 IST | नई दिल्ली

2अक्टूबर सिर्फ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नहीं बल्कि भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्मदिन है। महात्मा गांधी के बड़े व्यक्तित्व के कारण हम अक्सर ही 2 अक्टूबर को लाल बहादुर शास्त्री जैसे बड़े शख्सियत बात काम ही कर पाते हैं।

लाल बहादुर शास्त्री के सार्वजनिक, राजनीतिक और निजी जीवन से जुड़ी कई घटनाओं की आज भी लोग मिसाल देते हैं। तो चलिए आज हम आपको लाल बहादुर शास्त्री के जीवन से जुड़ी कुछ ऐसी सच्ची घटनाओं के बारे में बताते हैं।भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1901 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी मुगलसराय में हुआ था। उनके पिता एक स्कूल के शिक्षक थे, और माता का नाम राम दुलारी देवी था।

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लाल बहादुर शास्त्री जब केवल डेढ़ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया, जिक्से कारण बचपन से ही लाल बहादुर शास्त्री को काफी गरीबी का सामना करना पड़ा। पैसे नहीं होने की वजह से लाल बहादुर शास्त्री नदी तैरकर कर स्कूल जाया करते थे। यह बात भी सही है कि उन्हें पैसे नहीं होने की वजह से स्कूल जाने में दिक्कत होती थी। इसके बाद वे वाराणसी में चाचा के साथ रहने चले गए जहाँ से उन्होंने हाई स्कूल की शिक्षा प्राप्त की। 

एक बार बचपन में शास्त्री जी खेल-खेल में एक माली के बाग में बच्चों के साथ फूल तोड़ने गए थे. इस दौरान माली ने बच्चों को देख लिया और सिर्फ 6 साल की उम्र के होने की वजह से वे पकड़े गए और माली ने उन्हें खूब पीटा। शास्त्री जी ने माली से कहा कि मैं बिना बाप का बच्चा हूं इसलिए मुझे पीट रहे हो तो इस पर माली ने कहा कि पिता के न होने पर तो तुम्हारी जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है।

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इसके बाद शास्त्री जी ने जीवन भर अपनी जिम्मेदारियों को उठा लिया। बता दें ललिता शास्त्री के साथ अपनी शादी में उन्होंने दहेज के रूप में सिर्फ एक चरखा और खादी के कुछ कपड़े ही स्वीकार किया था। शास्त्री जी जाति-प्रथा के बिकुल खिलाफ थे।यही मात्र एक कारण की उन्होंने कभी भी अपनी जाति के सरनेम को अपने नाम में नहीं लगाया।

बता दें उनके नाम के साथ 'शास्त्री' उन्हें काशी विद्यापीठ द्वारा दी गई उपाधि थी।शास्त्री जी अपनी कार्यक्षमता और समर्पण के बल पर जल्दी ही कांग्रेस के लोकप्रिय नेताओं में से एक बन गए। भारत की आजाद के बाद कांग्रेस पार्टी ने उन्हें कई जिम्मेदारियां दीं। 1951 में उत्तर प्रदेश से नई दिल्ली आने के बाद उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई विभागों का प्रभार संभाला।

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रेल मंत्री, परिवहन एवं संचार मंत्री, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री, जैसे बड़े तबके पर उनको बिठाया गया। बता दें एक रेल दुर्घटनामें कई लोग मारे गए थे, जिसके लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। जिसके बाद देश और संसद ने उनके इस अभूतपूर्व पहल को काफी सराहना की।

ये उस समय की बात है जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू हुआ करते थे। जिसके बाद नेहरू जी ने इस घटना पर संसद में बोलते हुए कहा कि, लाल बहादुर शास्त्री की ईमानदारी और उच्च आदर्शों की जितनी तारीफ की जाए उतनी काम है। बेहरु जी ने लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया कि जो कुछ हुआ वे इसके लिए जिम्मेदार हैं। बल्कि इसलिए किया क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी।

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प्रधानमंत्री होने के बावजूद भी लाल बहादुर शास्त्री ने कभी प्रधानमंत्री को दी गई सरकारी गाड़ी का उपयोग अपने निजी काम के लिए नहीं किया। बता दें एक बार उनके बेटे ने गाड़ी का उपयोग कर लिया था, जिसके बाद शास्त्री जी ने इसे आधिकारिक रूप ने नोट करवाया और गाड़ी के उपयोग से होने वाले खर्च को जोड़कर उतना पैसा सरकारी खजाने में वापस जमा करवाया।

हो रही निजी आवागमन में दिक्कत और पत्नी के बहुत जोर देने पर उन्होंने लोन लेकर एक कार खरीदी थी। इसी तरह प्रधानमंत्री होने के बावजूद भी उनके घर में उनकी पत्नी की मदद के लिए कोई घरेलू नौकर नहीं था। बता दें शास्त्री जी और उनके परिवार के लोग खाना बनाने से लेकर अपने कपड़े धोने का काम खुद से किया करते थे।

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बता दें शास्त्री जी ने प्रधानमंत्री होते हुए अपने फटे कुर्ते पत्नी से पहनने को मांगा और कहा कि ऊपर से कोट डाल लेने के बाद यह नहीं दिखेगा। इसी तरह की एक घटना यह भी है कि, 1965 के युद्ध में जीत के बाद समझौते के लिए ताशकंद जाते वक्त उनका कोट फटा था। उनके पास नया कोट खरीदने के लिए पैसे नहीं थे जिसके कारण वें फटे कोट को रफू करवाकर वही कोट पहने और ताशकंद में दुनिया के बड़े नेताओं के साथ बैठक की।

बात दें लाल बहादुर शास्त्री की मौत आज भी एक पहेली है, 2009 में केंद्र सरकार ने इसी संबंध में एक आरटीआई के जवाब में कहा कि, अगर शास्त्री जी की मौत से जुड़ी घटनाओं को सार्वजनिक कर दिया जाएगए तो भारत के कई अंतरराष्ट्रीय संबंध खराब हो जाएंगे। लाल बहादुर शास्त्री ने अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में मिशाल पेश की है वह आज के राजनेताओं में ही नहीं उनके वक्त के राजनेताओं में भी मिलना ना मुमकिन है।

 


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