ख़ास रिपोर्ट

रेड कॉरीडोर और भारते के रिसते ज़ख्म...

icon अमितेष युवराज सिंह | 0
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| अप्रैल 25 , 2017 , 11:28 IST | रायपुर

छत्तीसगढ़ के सुकमा में सोमवार को बड़ा नक्सली हमला हुआ। इस हमले में सीआरपीएफ के 26 जवान शहीद हो गए हैं और 7 जवान जख्मी बताए जा रहे हैं। सभी जवान सीआरपीएफ की 74 बटालियन के थे। हमले के दौरान नक्सलियों ने जवानों के हथियार भी लूट लिए।

पिछले दो दशक से ज्यादा समय से छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश से लेकर तेलंगाना तक भारत का आदिवासी बहुल भू-भाग नक्सली हिंसा से रक्तरंजित रहा है। क्या हिंसा यहां जवाबी कार्रवाई है या फिर अन्याय का प्रतिकार। इसे समझने के लिए हमें आदिवासियों और जन जाति के साथ सनातन काल से हो रहे अन्याय और दास्तां की पूरी कहानी समझनी होगी।

Maoist 1

जल-जंगल और जमीन की लड़ाई

एक लोकतांत्रिक राज्य अपने आदिवासी इलाकों में माओवादी अतिवाद के उभार से कैसे लड़ सकता है? ऐसा किया जा सकता है, यदि एक ओर विकास के फल आदिवासियों के बीच वितरित किए जाएं तथा दूसरी ओर पुलिस द्वारा प्रभावी कार्रवाई को अंजाम दिया जाए। आदिवासियों को आर्थिक विकास में साझीदार बनाने के बजाय ये नीतियां उन्हें और ज्यादा हाशिए पर डाल देती हैं। गैर आदिवासियों द्वारा चलाए जा रहे राज्यों में उन्हीं के वर्चस्व वाले शासन खनन निर्माण और ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आदिवासी जमीनों को बेचे दे रहे हैं।

Salwa judum

सलवा जूडूम से और भड़की है नक्सली हिंसा

वहीं दूसरी ओर प्रभावी पुलिस कार्रवाई की जगह हम नियम और कानूनों का प्रशासन से इतर बाहर से निर्यात किए जा रहे हैं, जैसा कि छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम के रूप में देखने में आया है जहां राज्य सरकार ने खुद एक ऐसी सशस्त्र सेना खड़ी कर दी है, जो क्षेत्र में समानान्तर सरकार चलाती है। जाहिर है इसी का प्रतिकार है नक्सली हिंसा में बढ़ोत्तरी।

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रेड कॉरीडोर का पावर सेंटर है दंतेवाड़ा

छत्तीसगढ़ ऐसे राज्य के रूप में उभरा है जहां नाटकीय तरीके से माओवादियों ने भारी बढ़त ली है, खासकर दंतेवाड़ा जिले के अधिकतर हिस्से उनके कब्जे में हैं। इंद्रावती नदी के एक ओर भारतीय राज्य का नियंत्रण दिन के वक्त जहां अनिश्चित होता है वहीं रात में गायब हो जाता है। दूसरी ओर, जिसे अबूझमाड़ कहा जाता है, वहां दिन या रात कभी भी राज्य की मौजूदगी है ही नहीं।

Red corridor

दंतेवाड़ा उस वन क्षेत्र का हिस्सा है जो छत्तीसगढ़ से आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र तक जाता है। मिथकीय युग में इसे दण्डकारण्य कहा जाता था, इस नाम को अब माओवादियों ने अपना लिया है। दण्डकारण्य की स्पेशल जोनल कमेटी के अन्तर्गत कई डिवीजनल कमेटियां संचालित होती हैं. इनके नीचे रेंज कमेटियां आती हैं जो डिवीजनल कमेटियों को रिपोर्ट करती हैं। संगठन का सबसे निचला स्तर गांव में काम करता है, जहां की कमेटी को 'संघम' कहा जाता है।

आईए एक नज़र डालें छत्तीसगढ़ में माओवादियों के किए सात बड़े हमलों पर

दरभा: 25 मई 2013

बस्तर के दरभा घाटी में हुए इस माओवादी हमले में आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा, कांग्रेस पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष नंद कुमार पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत 30 से अधिक लोग मारे गए थे

धोड़ाई: 29 जून 2010

नक्सल माओवादी कैंप
नारायणपुर जिले के धोड़ाई में सीआरपीएफ के जवानों पर माओवादियों ने हमला किया. इस हमले में पुलिस के 27 जवान मारे गए

दंतेवाड़ा: 17 मई 2010

एक यात्री बस में सवार हो कर दंतेवाड़ा से सुकमा जा रहे सुरक्षाबल के जवानों पर माओवादियों ने बारूदी सुरंग लगा कर हमला किया था, जिसमें 12 विशेष पुलिस अधिकारी समेत 36 लोग मारे गए थे

ताड़मेटला: 6 अप्रैल 2010

बस्तर के ताड़मेटला में सीआरपीएफ के जवान सर्चिंग के लिए निकले थे, जहां संदिग्ध माओवादियों ने बारुदी सुरंग लगा कर 76 जवानों को मार डाला था

मदनवाड़ा: 12 जुलाई 2009

छत्तीसगढ़ माओवादी हमलाइमेज
राजनांदगांव के मानपुर इलाके में माओवादियों के हमले की सूचना पा कर पहुंचे पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार चौबे समेत 29 पुलिसकर्मियों पर माओवादियों ने हमला बोला और उनकी हत्या कर दी

उरपलमेटा: 9 जुलाई 2007

एर्राबोर के उरपलमेटा में सीआरपीएफ और ज़िला पुलिस का बल माओवादियों की तलाश कर के वापस बेस कैंप लौट रहा था. इस दल पर माओवादियों ने हमला बोला जिसमें 23 पुलिसकर्मी मारे गए

रानीबोदली: 15 मार्च 2007

बीजापुर के रानीबोदली में पुलिस के एक कैंप पर आधी रात को माओवादियों ने हमला किया और भारी गोलीबारी की. इसके बाद कैंप को बाहर से आग लगा दिया. इस हमले में पुलिस के 55 जवान मारे गए

दंतेवाड़ा: 17 जुलाई 2007

करीब 800 हथियारबंद नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में हमला किया। 25 मरे, 32 घायल हुए और 250 लोग लापता।

Naxal attack


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अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर हैं

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