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43 साल पहले इंदिरा गांधी ने दुनिया को दिखाई थी भारत की ताकत...जब हुआ ऐतिहासिक पोखरण-1

icon अमितेष युवराज सिंह | 0
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| मई 18 , 2017 , 14:20 IST | नयी दिल्ली

18 मई 1974 का दिन हिंदुस्तान के इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा। आज ही के दिन पूरी दुनिया को भारत ने सबसे पहले अपनी ताकत का लोहा मनवाया था। आज वह खास दिन है जब हमने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया था। जी हां जैसलमेर जिले के पोखरण में भारत ने सुबह-सुबह परमाणु विस्फोट किया था। इस परीक्षण के लिए 'बुद्धा इज स्माइलिंग' कोड वर्ड का इस्तेमाल किया गया था।

कहते हैं अगर इंदिरा गांधी उस समय देश की प्रधानमंत्री नहीं होती तो भारत ये विस्फोट नहीं कर पाता क्योंकि जिस साहस का परिचय इंदिरा गांधी ने दिया था वह शायद किसी दूसरे से नहीं हो पाता। 18 मई को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक फोन का इंतजार कर रही थीं। कुछ देर बाद उनके पास एक वैज्ञानिक का फोन आता है और वैज्ञानिक कहता है 'बुद्ध मुस्कुराए'। इस संदेश का मतलब था कि भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण कर दिया, जो सफल रहा है। 'बुद्धा इज स्माइलिंग' इस ऑपरेशन का कोड वर्ड था।

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इस विस्फोट के बाद भारत ऐसा पहला देश बन गया, जिसने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य न होते हुए भी परमाणु परीक्षण करने का साहस दिखाया था।  

परमाणु परीक्षण पोखरण के मल्का गांव के एक सूखे कुएं में किया गया था। परमाणु बम का वजन 1400 किलो और व्यास (डायमीटर) 1.25 मीटर था। आर्मी इसे बालू में छिपाकर लाई थी। सुबह 8 बजकर 5 मिनट पर विस्फोट किया गया था। भूमिगत परीक्षण के बाद यहां एक गहरा गड्डा हो गया था। कहा जाता है कि आठ से दस किलोमीटर तक धरती हिल गई थी।

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जिस समय भारत ने परमाणु परीक्षण किया था उस समय पाकिस्तान, भारत का दुश्मन नंबर एक था क्योंकि भारत ने पाकिस्तान को हराकर बांग्लादेश बनाने में मदद की थी।  उस समय अमेरिका का पलड़ा पाकिस्तान के लिए ज्यादा झुका रहता था। इसकी वजह यह थी कि अमेरिका सोवियत संघ के खिलाफ पाकिस्तान के एयरबेस का इस्तेमाल कर रहा था। दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत अब भी गुटनिरपेक्ष देश बना हुआ था। अमेरिका इससे भी नाराज था। वह चाहता था कि भारत उसका हर बात पर उसका समर्थन करें।

इतना ही नहीं, चीन भी पाकिस्तान के साथ था। उस समय पाकिस्तान के समर्थन में दुनिया के दो बड़े देश खड़े थे। इसके बावजूद भारत ने इन विषम परिस्थितियों का बहादुरी से सामना किया और विस्फोट किया। शक्ति संतुलन के लिए भारत को परमाणु क्षमता हासिल करना बेहद जरूरी हो गया था।

हालांकि ये परीक्षण  इतना आसान नहीं था। इस परीक्षण से पहले राह में कई रोड़े आए थे। सबे पहले आईएईसी (IAEC) के चेयरमैन और देश के सबसे बड़े वैज्ञानिक विक्रम साराभाई का निधन हो गया। उनकी जगह होमी सेठना को लाया गया, लेकिन एक बाधा और आ गई। भारत ने PTBT नाम के एक समझौते पर हस्ताक्षर कर रखा था जिसके मुताबिक कोई भी देश इस समझौते के तहत वातावरण में परमाणु परीक्षण नहीं कर सकता था। समझौते में वातावरण का मतलब आसमान, पानी के अंदर और समुद्र शामिल था। इन्हीं वजह से भारत ने इस परीक्षण को जमीन के अंदर करने का निर्णय लिया।

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इस पूरे अभियान को सफल बनाने में बड़ी भूमिका निभाने वाले वैज्ञानिक राजा रमन्ना ने अपनी आत्मकथा 'इयर्स ऑफ पिलग्रिमिज' में लिखा है कि इस पूरे ऑपरेशन के बारे में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के अलावा मुख्य सचिव पी एन हक्सर, पी एन धर, वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. नाग चौधरी और एटॉमिक एनर्जी कमीशन के चेयरमैन एच एन सेठना और खुद राजा रमन्ना को ही जानकारी थी। कुछ लोगों का दावा है कि रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम को भी ऑपरेशन सफल होने के बाद ही जानकारी हो पायी थी।

इस परमाणु परीक्षण को इंदिरा गांधी ने शांतिपूर्ण परीक्षण करार दिया था लेकिन परीक्षण के बाद अमेरिका ने भारत को परमाणु सामग्री और ईंधन की आपूर्ति रोक दी थी।

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अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर हैं

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