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समाज के माथे पर कलंक है बाल मजदूरी, आइए इसे जड़ से खत्म करें

शुभा सचान , न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जून 12 , 2018 , 15:37 IST

हर साल 12 जून को विश्व बाल श्रम दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत में बाल श्रम की समस्या दशकों से चली आ रही है। आए दिन होटलों से लेकर कई संस्थानों, कारखानों में बाल श्रम के मामले सामने आते रहते हैं। भारत सरकार बाल श्रम को कानूनी अपराध मानती है और ऐसा करने वालों के लिए सजा का प्रावधान भी है। कई संगठन सेमिनार, गोष्ठी और चर्चा कर बाल श्रम को रोकने के लिए लोगों को जागरुक भी करते हैं।

बाल श्रम निषेध दिवस की शुरुआत

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने वर्ष 2002 में बाल श्रम को लेकर जागरूकता के उद्देश्य से 12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाने की शुरुआत की थी। लेकिन, यह दिन केवल आयोजन, गोष्ठी और चर्चा तक ही सिमटता जा रहा है।

बीस साल पहले बाल मजदूरी के खिलाफ विश्वव्यापी यात्रा ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर का आयोजन हुआ था। तब 103 देशों से गुजरकर 80 हजार किलोमीटर लंबी दूरी तय कर यह यात्रा जेनेवा के संयुक्त राष्ट्र संघ भवन में पूरी हुई थी। तब पहली बार इस भवन के दरवाजे दुनिया के सबसे शोषित, पीड़ित और उपेक्षित बाल मजदूरों के लिए खोले गए थे और इसके गलियारों में बाल मजदूरी बंद करो..., हर बच्चे को शिक्षा दो जैसे नारे गूंजे थे। तब उस बाल श्रम विरोधी विश्व यात्रा में तकरीबन डेढ़ करोड़ लोगों ने शामिल होकर एक नए अंतरराष्ट्रीय कानून की मांग की थी। दुनिया की सभी सरकारों ने यह मांग मानकर बदतर तरह की बाल मजदूरी के खिलाफ एक कानून पारित किया था, जिसे आईएलओ कन्वेंशन-182 के नाम से जाना जाता है। और तभी से इसके उपलक्ष्य में 12 जून को विश्व बाल श्रम विरोधी दिवस मनाया जाता है।

हालांकि इन दो दशकों में दुनिया में बाल मजदूरों की तादाद 26 करोड़ से घटकर तकरीबन 15 करोड़ रह गई है। भारत में सरकारी आंकड़ों के हिसाब से इस दौरान बाल मजदूर सवा करोड़ से घटकर 45 लाख रह गए हैं। अब बाल मजदूरी एक वैश्विक मुद्दा बन चुकी है।

देश में नेशनल चिल्ड्रेन ट्रिब्यूनल की जरूरत

नोबल पुरस्कार विजेता और बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले कैलाश सत्यार्थी के मुताबिक बच्चों के खिलाफ अपराध को रोकने के लिए चिल्ड्रेन ट्रिब्यूनल जैसी संस्था की जरूरत है, जो बच्चों के साथ होने वाले अपराधों पर न केवल पैनी निगाह रख सके, बल्कि उनका शीघ्र से शीघ्र निराकरण भी कर सके।

भारत में बच्चों के लिए पॉक्सो और केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन एक्ट जैसे कानून हैं, लेकिन उनके कार्यान्वयन में भारी कमी है, कानून और उसके सही तरीके से कार्यान्वयन होने के बीच एक बड़ा गैप (फासला) है। इस गैप में कई चीजे हैं। भारत में प्रतिबद्ध, विशिष्ट और इस तरह के मामलों की निगरानी करने वाली अदालतों की जरूरत है। इसके लिए हर जिले में कम से कम एक अदालत ऐसी होनी चाहिए जो केवल बच्चों के मामलों या बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों का निराकरण करे।

बच्चों के साथ अपराधों के मामले पहले से ज्यादा

नेशनल क्राइम रिकॉर्डस ब्यूरो के अनुसार, वर्ष 2015 की तुलना में 2016 में बच्चों के साथ अपराधों के मामलों में 14 फीसदी वृद्धि हुई है। वहीं, वर्ष 2014-15 में पांच फीसदी की वृद्धि हुई थी। 2016 में भारतीय दंड संहिता और पॉक्सो के तहत बच्चों से जुड़े अपराध के 1,06,958 मामले दर्ज हुए। और ये आंकड़े हर रोज बढ़ते ही जा रहे हैं।

आज बाल श्रम अपराध पर सख्त से सख्त कानून और उसका सही कार्यान्वयन ही बच्चों के अपराधों की बढ़ती संख्या को रोक सकता है। और इसमें आपकी और हमारी भागीदारी सुनिश्चित होना जरूरी है।


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