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टॉयलेट (एक प्रेम कथा): फिल्म से ज्यादा संदेश का ओवरडोज, बाकी सब ठीक है

श्वेता बाजपेई, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अगस्त 11 , 2017 , 15:35 IST | मुंबई

अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर अभिनीत फिल्म टॉयलेट: एक प्रेम कथा शुक्रवार को देश भर के सिनेमा घरों में रिलीज हो चुकी है। फिल्म के ट्रेलर से साफ हो गया था कि यह फिल्म घर में शौचालय जैसे संजीदा मुद्दे पर बनी है। दुल्हन शादी के कुछ ही दिनों बाद ससुराल छोड़ कर आ जाती है, क्योंकि वहां घर में टॉयलेट बना हुआ नहीं है। यह दुल्हन (भूमि पेडनेकर) महिलाओं के खुले में शौच जाने के खिलाफ है और चाहती है कि उसके ससुराल वाले घर में टॉयलेट बनवाएं, वह तभी वापस आएगी। बस यही से शुरू होती है गांव और परिवार वालों के खिलाफ इस कपल (अक्षय कुमार–भूमि पेडनेकर) की जंग। आखिरकार सरकार को वहां टायॅलेट बनवाना ही पड़ता है।

फिल्म के कई संवाद प्रभावित करते हैं। जैसे- जब तक समस्या निजी ना हो कौन लड़े, कौन हल निकाले या तुम्हारी लड़ाई सभ्यता से है आदि। साथ ही सरकार की स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत गांव में क्या-क्या नियम-कानून हैं, के बारे में भी बताया गया है। अक्षय कुमार का अभिनय उम्दा और सराहनीय है।

फिल्म का फर्स्ट हाफ जहां मलाई की तरह चलता है, वहीं इंटरवेल के बाद फिल्म को देखकर दिमागी कब्ज का एहसास होने लगता है, क्योंकि यहां फिल्म, फिल्म न रहकर संदेश का ओवरडोज बन जाती है। कुछ सीन तो ऐसे लगते हैं जैसे मौजूदा सरकार के काम-काज की तारीफ करने के लिए ही गढ़े गए हैं। यही नहीं फिल्‍म में कहीं न कहीं डायरेक्टर ने सरकार के अलग-अलग अभियानों के साथ जोड़ने की कोशिश की है।वहीं फिल्म में कहीं-कहीं फूहड़ता भी नजर आती है जैसे अक्षय का संवाद है कि औरत धोती है क्या, जो मैं उसे संभालूं, या भाभी जवान हो गई दूध की दुकान हो गई आदि। ये जबरदस्ती से ठूंसे गए डायलॉग्स लगते हैं।


सेकंड हाफ करता है बोर

फिल्म की कहानी की बात करें तो फर्स्ट हाफ काफी कसा हुआ और दमदार है, लेकिन फिल्म का सेकंड हाफ काफी बोर करता है। इंटरवल के बाद फिल्म उपदेशात्मक हो जाती है, जिससे कई जगह पर दर्शक बोर भी होते हैं। कुल मिलाकर एमएस धोनी : द अनटोल्ड स्टोरी जैसी सुपरहिट फिल्म बनाने वाले नीरज पांडे ने यहां कहानी के मामले में थोड़ा निराश किया है।

स्टारकास्ट की परफॉर्मेंस

एक्टिंग के मामले में अक्षय कुमार और भूमि ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। दोनों की एक्टिंग जबरदस्त है। भूमि ने लोटा पार्टी और खुले में शौच की जो धज्जियां उड़ाई है वह कमाल है। दोनों का ही देसी अंदाज दिल को छू जाता है। अक्षय के पिता के रोल में सुधीर पांडे की एक्टिंग शानदार है। अक्षय के भाई के रोल में दिव्येंदु मजा दिलाते हैं। अनुपम खेर का सनी लियोन प्रेम मजेदार है। इस फिल्‍म के वन लाइनर भी कमाल-धमाल हैं।

डायरेक्शन

फिल्म का डायरेक्शन अच्छा है। जैसा कि कहानी गांव की है ऐसे में सभी सीन्स रियल लोकेशन पर पिक्चराइज्ड किए गए हैं। स्क्रीनप्ले की खासियत यह है कि वो एक खास मुद्दे की तरफ भी आपका ध्यान आकर्षित करता है। देखा जाए तो डायरेक्शन स्क्रीनप्ले, कैमरा वर्क कमाल का है। साथ ही बैकड्रॉप भी अच्छा है।

फिल्म का म्यूजिक

लंबी फिल्म में कमजोर संगीत फिल्म की ये बात खटकती है फिल्म के संगीत की बात है तो ये औसत है। लठ्ठ मार वाला गीत ही कुछ अच्छा लगता है।


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