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शहादत के साथ भेदभाव, शहीद होने वाले सैनिकों के परिजनों के लिए अलग-अलग मोल!

सतीश वर्मा, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अक्टूबर 8 , 2017 , 10:15 IST | नई दिल्ली

सैनिक चीन की सीमा पर शहीद हो या फिर पाकिस्तान की सीमा पर, देश के लिए उसकी शहादत का मोल अलग-अलग नहीं होता। लेकिन सरकार ने इसकी कीमतें अलग-अलग तय कर रखी हैं। शहीदों के परिजनों को मिलने वाली सहायता राशि के मामले में तो कम से कम यही कहा जा सकता है। पाकिस्तान और चीन की सीमा पर हादसे या दुश्मन सेना से जंग में शहीद होने वाले सैनिकों के परिजनों को सरकार अलग-अलग राशि देती है। पश्चिमी मोर्चे यानी पाकिस्तान सीमा पर शहीद होने वाले सैनिकों के परिजनों को सरकार बढ़ी हुई पेंशन राशि और सहायता राशि देती है, लेकिन चीन सीमा पर दुश्मन से लड़ते हुए जान गंवाने वाले सैनिकों के लिए ऐसा प्रावधान नहीं है।

Indian army

सेना इस भेदभाव के खिलाफ दशकों से उठा रही आवाज

सेना इस भेदभाव के खिलाफ दशकों से अपनी आवाज उठा रही है, लेकिन अब तक न्याय नहीं मिल सका है। पाक सीमा पर शहीद होने वाले सैनिकों के परिजनों को उनकी आखिरी सैलरी के 100 फीसदी के बराबर पेंशन मिलती है। दूसरी तरफ चीन के साथ लगती वास्तविक सीमा पर जान गंवाने वाले सैनिकों के परिजनों को आखिरी सैलरी का 60 पर्सेंट हिस्सा ही मासिक पेंशन के तौर पर मिलता है।

Martyrs

पाक सीमा पर शहीद होने वाले को 45 लाख, अन्य सीमा पर 35 लाख

इसी तरह पाकिस्तान सीमा पर शहादत देने वाले सैनिकों को 45 लाख रुपये की सहायता राशि मिलती है, जबकि वास्तविक सीमा रेखा पर शहीद सैनिकों के परिजनों को सिर्फ 35 लाख रुपये ही मिलते हैं। यह मुद्दा इस वक्त इसलिए प्रासंगिक हो गया है क्योंकि डोकलाम में तनातनी के बाद चीन सीमा पर सैनिकों की तैनाती भी बढ़ा दी गई है। खासतौर पर लद्दाख जैसे पर्वतीय इलाके में सैनिकों को बेहद विपरीत परिस्थिति में देश की सीमाओं की रक्षा करनी पड़ती है।

चीन की सीमा पर डटे रहना ज्यादा कष्टकारी

यह समझना महत्वपूर्ण है कि चीन से सटी 4,057 किलोमीटर वास्तविक सीमा पर रेखा पर ड्यूटी करना पाक से लगे 778 किमी एलओसी और 198 किमी इंटरनैशनल बॉर्डर पर ड्यूटी की तुलना में कहीं अधिक कठिन है। एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने बताया, 'ड्यूटी पर तैनात जवान चाहे हिमस्खलन के चलते शहीद हों या फिर दुश्मन सेना की गोलियों से, उनके परिजनों को मिलने वाली सहायता राशि में भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन वास्तविक सीमा रेखा पर तैनात सैनिकों के परिजनों को एलओसी और आईबी पर तैनात सैनिकों के मुकाबले कम लाभ मिलते हैं।'

 

 


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