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कठोर कानून पर लचीला रवैया

icon डॉ. वेद प्रताप वैदिक | 0
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| जून 7 , 2017 , 14:11 IST | नयी दिल्ली

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने पर्यावरण दिवस पर यह कहकर देश के मांसाहारी वर्ग को बड़ी राहत पहुंचाई है कि उनका मंत्रालय लचीला रुख अपनाने को तैयार है। उसका रवैया अड़ियल नहीं है। इस मंत्रालय ने पिछले माह एक अधिसूचना के द्वारा आदेश जारी कर दिया था कि देश के पशु-बाजारों में गाय और भैंस को कत्ल करने के लिए खरीदना गैर-कानूनी होगा। इस आशय का आदेश जारी करने के पीछे 1960 के पशु-दया अधिनियम का थोड़ी कड़ाई से पालन करवाने की मन्शा ही थी लेकिन इसे दलित और मुस्लिम विरोधी कार्य बताकर तगड़ा राजनीतिक रंग दे दिया गया।

देश में जगह-जगह प्रदर्शन होने लगे, जुलूस निकाले जाने लगे और युवक कांग्रेस के लड़कों ने दक्षिण भारत में गोमांस-उत्सव भी रचाए। मद्रास उच्च न्यायालय ने इस आदेश पर एक माह की रोक भी लगा दी। इस सरकारी प्रावधान को उन दुर्घटनाओं से भी जोड़कर देखा जाने लगा, जो कुछ मूर्ख ‘गौरक्षकों’ की कृपा से कई शहरों और गांवों में हो गई थीं। इसमें शक नहीं है कि इस नए आदेश के कारण भारत में चल रहा एक लाख करोड़ रु. का मांस-व्यापार भी प्रभावित होने लगा। डर के मारे कत्ल किए जानेवाले पशुओं की खरीद और बिक्री भी घट गई।

यदि आप पशुओं को खुले बाजार से नहीं खरीदने देंगे तो वे चोरी-छिपे खरीदे जाएंगे। भ्रष्टाचार बढ़ेगा। इस कानून के पीछे जो सदाशय है, वह तो समझ में आता है लेकिन खुद कानून नहीं। पं. बंगाल और केरल के अलावा कुछ उन सीमांत राज्यों ने भी केंद्र को आड़े हाथों लिया, जहां गोमांस-भक्षण पर प्रतिबंध नहीं है। यह आदेश किसी भी मांस-भक्षण के विरुद्ध नहीं है लेकिन असली मुद्दा है-- जीव-दया का।

इस मुद्दे पर अमल करवाना सिर्फ कानून के जरिए नहीं हो सकता। जो लोग जानवरों को नहीं सताते या उनकी हत्या नहीं करते या जो मांस नहीं खाते, क्या ऐसा वे किसी कानून की वजह से करते हैं ? कानून से भी बड़ी चीज है, संस्कार और परंपरा ! क्या उस पर हमारी सरकारों का ध्यान है ? नहीं, यह उनके बस की बात नहीं है। नेताओं के बस की भी नहीं। उनकी गाय तो नोट है और उनकी भैंस वोट है। यह काम साधु-संन्यासियों, मुल्ला-मौलवियों, पादरियों और समाजसेवियों का है। किसी धर्म में मांसाहार अनिवार्य नहीं है। फिर भी वे इस मुद्दे पर मौन रहते हैं। पूरा भारत मांसाहार को तजे, इसके लिए प्रचंड जन-जागरण की जरुरत है। कौन करेगा, इसे ?


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डॉ. वेद प्रताप वैदिक

लेखक प्रसिद्ध पत्रकार और विचारक हैं

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