ओपिनियन

देश को कौन बांट रहा है?

icon अनिल राय | 0
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| अप्रैल 11 , 2018 , 14:09 IST

जिस चंपारण के जरिए गांधी ने देश को जोड़ा था उसी धरती से जोड़ने की आवाज फिर से उठी। पीएम की मौजूदगी में नीतीश ने टकराव और तनाव को लेकर चिंता जाहिर की तो मोदी जी के लिए भी जवाब देना जरूरी हो गया। लेकिन एक बड़ा फर्क रहा। गांधी जी देश से बाहर की ताकतों के खिलाफ देश को जोड़ने की कोशिश कर रहे थे जबकि आज वो खतरा घर से ही है।

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(फाइल फोटो: भागलपुर-नाथनगर सांप्रदायिक हिंसा)

जाहिर है नीतीश की चिंता हाल के दिनों में बिहार में हुए दंगों को लेकर थी क्योंकि इस दाग को लेकर नीतीश की साख पर भी सवाल उठे हैं। दंगा भड़काने के आरोप सीधे तौर पर एक केन्द्रीय मंत्री के बेटे पर लगे थे, लिहाजा पीएम मोदी की मौजूदगी में नीतीश इस पर कुछ जवाब चाहते थे और ये संदेश भी बिहार को देना चाहते थे कि वो अपने सिद्धांतों से समझौता और सौदा कर बीजेपी को समर्पित नहीं हो गए हैं। लेकिन नीतीश जिस जवाब की अपेक्षा प्रधानमंत्री से कर रहे थे वैसा जवाब आया नहीं। प्रधानमंभी मोदी ने जन-जन को तोड़ने के लिए सीधे तौर पर विपक्ष को जिम्मेदार ठहरा दिया। नीतीश का इशारा जिनकी तरफ था वो (अश्विनी चौबे) न सिर्फ सभा में मौजूद थे, बल्कि पीएम की उस संभावित नसीहत से भी बच निकले, जिसकी अपेक्षा कम से कम नीतीश कर रहे थे।
देश टूट रहा है। समाज बिखर रहा है। ये बात देश चलाने वाले भी मान रहे हैं। लेकिन जब कार्रवाई की बात आती है, तो वही देश के नायक अपने पुराने ढर्रे से टस से मस होने के लिए तैयार नहीं दिखते। सरकार में बैठे लोगों की मानें, तो विपक्ष और विपक्ष की मानें तो सरकार सारी बुराइयों के लिए कसूरवार है।

शायद यही वजह है कि समाज के अंदर एक अजीब-सी कशमकश है। एक दूसरे को लेकर अविश्वास है। साम्प्रदायिक दंगे तो आम थे ही अब जातीय दंगे भी आम होने लगे हैं। देश में दंगे और मौत के आकड़े चौंकाने वाले हैं :

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सिर्फ बीते साल यानी 2017 की ही बात करें, तो यूपी में 195 दंगे हुए, जिनमें 44 लोगों की जान चली गई और 452 लोग घायल हो गए। जबकि कर्नाटक में 100 दंगों में 9 और राजस्थान में हुए 91 दंगों में 12 लोग मारे गए। बिहार, पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक में पिछले साल दंगे हुए।

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भारतीय संविधान और व्यवस्था की मानें तो दंगे रोकने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। लेकिन साफ है कि जिस तरह राजनीतिक दल सिर्फ वोट के लिए समाज को धर्म और जाति में बांट रहे हैं उसे देखते हुए हम किसी भी राजनीतिक दल को क्लीन चिट नहीं दे सकते।

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2019 के लोकसभा चुनावों के उलटी गिनती शुरू हो गई है और राजनीतिक दल किसी भी तरह इन चुनावों को जीतना चाहते हैं। जिस तरह चुनावों से पहले राजनीतिक गठबंधन बन रहे हैं उससे साफ है कि भले ही ये नेता मंच से विकास की बातें करते हों, लेकिन चुनाव जाति और धर्म के नाम पर ही लड़े जाएंगे। पहले गुजरात में हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश के जातीय कार्ड को एक साथ कबूल कर और फिर कर्नाटक में लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देकर कांग्रेस ने भी इस आशंका को सही साबित किया है। तो मध्य प्रदेश में 5 साधुओं को राज्य मंत्री का दर्जा देकर शिवराज ने और यूपी में बाबा साहब के साथ रामजी को टैग कर योगी जी ने भी अपने पत्ते खोल दिए हैं।

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यूं तो 2019 से पहले जाति-धर्म की प्रयोगशाला में देश के तमाम राज्य तपेंगे, लेकिन 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में बीजेपी भगवा चेहरे वाले सीएम के सहारे किन नारों के साथ चुनाव में जाएगी और माया-अखिलेश के गठजोड़ के साथ विपक्षी खेमा किन एजेंडों को आगे करेगा इसे समझना अब मुश्किल नहीं है। हिन्दुत्व के सामने दलित-यादव-मुस्लिम गठजोड़ दांव पर है। फैसला जनता को करना है। लेकिन जनता को प्रभावित करने वाले टोटके हद से आगे निकल जाएं, तो इस बार आश्चर्य नहीं करना है।

(लेखक न्यूज़ वर्ल़्ड इंडिया के प्रबंध संपादक हैं)