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नारी तुम केवल श्रद्धा हो...कामायनी के रचयिता जयशंकर प्रसाद को नमन

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जनवरी 13 , 2018 , 19:59 IST | नई दिल्ली

कामायनी जैसी महाकाव्य के रचयिता जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी, 1889 में यूपी के वाराणसी में हुआ। इनके पिता का नाम श्री देवी प्रसाद साहू था। जय संकर प्रसाद हिन्दी कवि,नाटककार,कहानीकार, उपन्यासकार तथा निबन्धकार थे। बता दें वे हिन्दी के छायावादी युगके चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं।

उन्होंने हिंदी काव्य में एक तरह से छायावाद की स्थापना की जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव्य में न केवल कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई, बल्कि जीवन के सूक्ष्म एवं व्यापक आयामों के चित्रण की शक्ति भी संचित हुई।

इतना ही नहीं कामायनी तक पहुँचकर वह काव्य प्रेरक शक्तिकाव्य के रूप में भी प्रतिष्ठित हो गया। बाद के प्रगतिशील एवं नयी कविता दोनों धाराओं के प्रमुख आलोचकों ने उसकी इस शक्तिमत्ता को स्वीकृति दी। वे एक युगप्रवर्तक लेखक थे जिन्होंने एक ही साथ कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में हिंदी को गौरवान्वित होने योग्य कृतियाँ दीं।

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उन्हें 'कामायनी' पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ था। उन्होंने जीवन में कभी साहित्य को अर्जन का माध्यम नहीं बनाया, अपितु वे साधना समझकर ही साहित्य की रचना करते रहे। कुल मिलाकर ऐसी बहुआयामी प्रतिभा का साहित्यकार हिंदी में कम ही मिलेगा जिसने साहित्य के सभी अंगों को अपनी कृतियों से न केवल समृद्ध किया हो, बल्कि उन सभी विधाओं में काफी ऊँचा स्थान भी रखता हो।

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रवि शंकर प्रसाद की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही प्रारम्भ हुई। इसके बाद वाराणसी के क्वींस इंटर कॉलेज में अध्ययन किया। सत्रह वर्ष की अवस्था तक इनके माता-पिता एवं ज्येष्ठ भ्राता के देहावसान के कारण गृहस्थी का सारा बोझ इसके ऊपर आ पड़ा। इन्ही परिस्थितियों ने जयशंकर प्रसाद के कवि व्यक्तित्व को उभारा। ‘कामायनी’ जैसे महाकाव्य के रचयिता जयशंकर प्रसाद की रचनाओं में अंतर्द्वद्व का जो रूप दिखाई पड़ता है वह इनकी लेखनी का मौलिक गुण है।

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इनकी अधिकांश रचनाएँ इतिहास तथा कल्पना के समन्वय पर आधारित हैं। जयशंकर प्रसाद की रचनाओं में शिल्प के स्तर पर भी मौलिकता के दर्शन होते हैं। उनकी रचनाओं में भाषा की संस्कृतनिष्ठता तथा प्रांजलता विशिष्ट गुण हैं। चित्रात्मक वस्तु-विवरण से संपृक्त उनकी रचनाएँ प्रसाद की अनुभूति और चिंतन के दर्शन कराती हैं। 48 साल की उम्र में 15 नवंबर 1937 में इनका देहा वसन हो गया।  इतने बड़े रचयिता को उनके पुण्य तिथि पर नमन।  

एक नज़र इनकी रचनाओं पर ...... 

काव्य-चित्राधार, कानन कुसुम, प्रेम-पथिक, महाराणा का महत्व, झरना, करुणालय, आंसू, लहर एवं कामायनी।
नाटक– सज्जन, कल्याणी परिणय, प्रायश्चित, राज्यश्री, विशाख, कामना, जन्मेजय का नागयज्ञ, स्कंदगुप्त, एक घूंट, चन्द्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी।
कथा संग्रह– छाया, प्रतिध्वनी, आकाश दीप, आंधी, इंद्रजाल।
उपन्यास– कंकाल, तितली, इरावती।
निबंध संग्रह– काव्य और कला तथा अन्य निबंध।


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