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वर्ल्ड अस्थमा डे: ये हैं इस बीमारी के संकेत, समय पर इलाज से रोकथाम है संभव

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| मई 1 , 2018 , 14:56 IST

1 मई को दुनियाभर में वर्ल्ड अस्थमा डे मनाया जाता है। यह एक ऐसी बीमारी है जिसमें मरीज को सांस लेने में दिक्कत होती है। अस्थमा में मरीज गहरी सांस लेने लगता है। सीने में जकड़न महसूस होने के साथ-साथ बहुत अधिक पसीना आता है और उल्टी भी हो सकती है। जितनी मात्रा में व्यक्ति ऑक्सिजन लेता है। उतनी मात्रा में कार्बन डाईऑक्साइड बाहर नहीं निकाल पाता है। ऐसे समय में दमा रोगियों को खांसी आ सकती है। अस्थमा के रोगियों को रात के समय खासकर सोते समय ज्यादा कठिनाई महसूस होती है।

सभी मरीजों में अस्थमा के लक्षण एक जैसे नहीं होते हैं। अस्थमा मे छाती में जकड़न, सांस लेते और छोड़ते समय सीटी जैसी आवाज निकलती है। श्वांस नली में हवा का प्रवाह सही ढंग से न हो पाना जैसे लक्षण होने पर बिना समय गवाएं अस्थमा का इलाज करवाना चाहिए।

धूल है अस्थमा का बड़ा कारण

धूल में छिपे कण एलर्जिक अस्थमा का सबसे आम कारण पाए गए हैं। बच्चों में अस्थमा के 90 फीसदी और वयस्कों में 50 फीसदी मामलों का कारण ऐलर्जिक रिऐक्शन होता है। ऐलर्जी के मुख्य कारण जैसे धूल,कीड़े, घरेलू जानवरों के रोंए आदि होते है। कई बार खाद्य पदार्थ भी ऐलर्जी का कारण बन सकते है। ऐसा इसलिए होता है। क्योकि शरीर इन पदार्थों को अपने लिए हानिकर मान लेता है और शरीर का इम्यून सिस्टम ऐंटीबॉडी बनाने लगती है।  शरीर में हिस्टामाइन जैसे रसायन भी बनने लगते हैं। यह नाक में कंजेशन, नाक बहना, आंखों में खुजली और त्वचा पर लाल दाने अस्थमा का कारण बन जाते है।

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इनहेलर के गलत इस्तेमाल से बढ़ सकता है अस्थमा

नहेलेशन थेरेपी अस्थमा के इलाज का मुख्य आधार है। इससे फेफड़ों तक दवाएं पहुंच जाती हैं। साइड इफेक्ट का खतरा भी कम हो जाता है। फेफड़ों तक दवाइयों को पहुंचाने वाले उपकरण दवाइयों जितने ही महत्वपूर्ण होते हैं।

भारत में लगभग 90 फीसदी डॉक्टर क्लीनिक में पहली बार आने वाले अस्थमा के 40 फीसदी मरीजों को इनहेलर उपयोग करने की सलाह देते हैं।इनहेलर्स को गलत ढंग से इस्तेमाल अस्मथा पर नियंत्रण नहीं होने देता। इससे उन्हें ओरल थेरेपी लेने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। जो सेहत के लिए हानिकारक हो सकती है।

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इन्हेलर से मिलती है राहत 

अस्थमा के उपचार में सबसे सुरक्षित तरीका इन्हेलेशन थेरपी को माना जाता है। अस्थमा अटैक होने पर मरीज को सांस लेने में बहुत कठिनाई होती है। ऐसे में इन्हेलर सीधे रोगी के फेफड़ों में पहुंचकर अपना प्रभाव दिखाना शुरू करता है। जिससे मरीज को राहत महसूस होती है।

वायु प्रदूषण अस्थमा के लक्षणों को और गंभीर बना देता है। ऐसे में जरूरी है कि जो मरीज ऐलर्जी के लक्षणों से जूझ रहे हैं। तुरंत जांच करा लें। क्योंकि रोकथाम इलाज से बेहतर है।


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