राजनीति

दिल्ली में हुए उपचुनाव तो "आप" के साथ कांग्रेस और बीजेपी के लिए भी इम्तिहान का दौर

आशुतोष कुमार राय, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| जनवरी 20 , 2018 , 14:26 IST

EC ने लाभ का पद रखने को लेकर आप के 20 विधायकों को अयोग्य घोषित करने की सिफारिश ऐसे वक्त की है जब दिल्ली में AAP सरकार अपने कार्यकाल का तीसरा साल पूरा करने जा रही है। इन खबरों से उत्साहित दिल्ली कांग्रेस ने संबद्ध विधानसभा क्षेत्रों में संभावित उपचुनावों के लिए योजना बनानी शुरू कर दी।

इसी साल 2019 के आम चुनावों की तैयारी भी शुरू होने वाली है। दिल्ली में उपचुनाव की स्थिति न केवल AAP बल्कि कांग्रेस और बीजेपी के लिए भी टेस्टिंग ग्राउंड होगा। 2019 से पहले दोनों पार्टियां को इस बात का अंदाजा लग जाएगा कि आप को शिफ्ट हुए उनके परंपरागत वोटर्स वापस लौटते हैं या नहीं।

जिन 20 विधायकों को अयोग्य घोषित करने की सिफारिश की गई है उनकी जीत का अंतर इस ओर इशारा कर रहा है कि अधिकतर अरविंद केजरीवाल के मजबूत खिलाड़ी हैं।

ये विधायक दिल्ली के जिन इलाकों का प्रतिनिधित्व करते हैं वे जनसंख्या के हिसाब से काफी विविधता वाले हैं। ऐसे में उपचुनाव की तस्वीर काफी रोचक हो सकती है। एक बार विधायकों की सदस्यता खत्म हुई तो चुनाव आयोग खाली सीटों पर छह महीने के भीतर कभी भी उपचुनाव करा सकता है।

पुरानी दिल्ली से लेकर रिफ्यूजी और दिल्ली में देशभर से आकर बसे लोगों के बाहुल्य वाली इन 20 विधानसभा सीटों की तस्वीर काफी अलग है। इन विधानसभाओं में स्लम, अवैध कॉलोनियों और गांवों की आबादी है तो बड़ी शहरी आबादी भी है। इन जगहों पर अधिकतर लो इनकम ग्रुप के वोटर्स हैं लेकिन मिडल क्लास लोगों की भी एक बड़ी संख्या है।

दिल्ली के सुदूर उत्तर-पश्चिमी इलाके में नरेला जैसी विधानसभा की बात करें तो यहां जेजे क्लस्टर्स, अवैध कॉलोनियों और गांवों की बहुलता है। यहां की चुनावी लड़ाई में यह देखना रोचक होगा कि कम आय वाले वोटर्स जो कांग्रेस से आप में शिफ्ट हुए थे, इस बार क्या करेंगे। नरेला से आप के शरद कुमार 40 हजार से अधिक वोटों के अंतर से जीते थे।

इसी तरह उत्तर दिल्ली की बुराड़ी विधानसभा सीट में भी अवैध कॉलोनियां और ग्रामीण इलाके हैं। यहां से आप के संजीव झा करीब 69000 वोटों के भारी अंतर से जीते थे। केजरीवाल सरकार ने अपने 70 बिंदू के अजेंडा में गरीबों के लिए कई सारे वादे किए थे।

उपचुनाव में केजरीवाल के उन वादों और कामों का भी परीक्षण होगा। इसी तरह दिल्ली के केंद्र में चांदनी चौक की सीट है। कभी कांग्रेस की गढ़ समझे जाने वाली इस सीट पर आप की अलका लांबा ने बाजी मारी थी।

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इस सीट पर मुस्लिम वोटर्स की अच्छी संख्या है। ऐसे में चुनाव हुए तो अल्पसंख्यक समुदाय का मूड भांपने में मदद मिलेगी। इसके अलावा लांबा के नेतृत्व में शाहजहानाबाद डिवेलपमेंट बोर्ड के अधीन यहां विकास कार्यों का भी टेस्ट होगा।

ऐसी ही एक सीट सदर बाजार की है जहां आप के सोम दत्त ने कांग्रेस के दिग्गज अजय माकन को हराया था। यहां भी गरीब वोटर्स के बीच एक बार आप और कांग्रेस, दोनों को खुद को साबित करने का मौका मिलेगा।

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उपचुनाव में पश्चिमी दिल्ली का मिडल क्लास भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। जनकपुरी, तिलक नगर और राजेंद्र नगर में अमीर, मध्य आय वर्ग और गरीब, तीनों ही तरह के वोटर्स हैं। कुछ इलाकों में पंजाबी और सिख वोटों का प्रभुत्व है।

दक्षिणी दिल्ली की कालकाजी और जंगपुरा विधानसभाओं की तस्वीर भी कुछ ऐसी ही है। द्वारका वेस्ट से केजरीवाल के भरोसेमंद आदर्श शास्त्री हैं। दक्षिणी दिल्ली में और नीचे जाने पर महरौली के गांव और वसंत कुंज व साकेत के अमीर इलाके हैं। इसके अलावा इन 20 विधायकों में कोंडली की एक रिजर्व सीट भी है।

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2015 के विधानसभा चुनावों में केजरीवाल की पार्टी ने सभी 12 रिजर्व सीटों पर जीत दर्ज की थी। ऐसे में कोंडली की रिजर्व सीट का उपचुनाव भी रोचक होगा। लक्ष्मी नगर और गांधी नगर विधानसभा में मिडल क्लास और व्यापारी वर्ग की मिश्रित आबादी है।

ये इलाके आप के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। आप सरकार ने कारोबारी समुदाय में अपनी पैठ बनाने के लिए पिछले साल वैट को लेकर और इस साल जीएसटी को लागू कराने के लिए सुविधाएं दे रखी हैं।

शुक्रवार की शाम आप के कुछ विधायक चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचे। बुराड़ी विधायक संजीव झा और रोहतास नगर की सरिता सिंह ने दावा किया कि संसदीय सचिव के तौर पर उन्होंने न तो वेतन लिया है और न ही किसी तरह की सुविधा।

लक्ष्मी नगर से विधायक नितिन त्यागी ने कहा कि चुनाव आयोग पहले हमें हमारा पक्ष रखने का मौका दे तो हम उसका कोई भी फैसला स्वीकार करने के लिए तैयार हैं।

इसी तरह महरौली से विधायक नरेश यादव ने कहा कि किसी भी एमएलए को निजी सुनवाई का मौका नहीं देकर न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन किया गया। चांदनी चौक से विधायक अलका लांबा ने कहा कि संसदीय सचिवों की नियुक्ति पर उपराज्यपाल ने साइन नहीं किया था, इसलिए 'लाभ के पद' का मामला खड़ा ही नहीं होता।


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