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विश्व टीबी दिवस: हर दिन 4 से 6 जिंदगियां छीन लेती है टीबी,जानें बचाव के उपाय

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| मार्च 24 , 2018 , 12:30 IST

टीबी यानी ट्युबरक्यूलोसिस को वैसे तो बीते जमाने की बीमारी के तौर पर देखा जाता है, लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी टीबी के मरीजों की संख्या हर साल बढ़ रही है। यही वजह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO की ओर से पूरी दुनिया में हर साल 24 मार्च को विश्व टीबी दिवस मनाया जाता है। इसका मकसद इस रोग के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। वैसे तो टीबी लाइलाज नहीं है लेकिन अगर इसके इलाज में लापरवाही बरती जाती है तो यह जानलेवा भी साबित हो सकती है। केंद्र व राज्य सरकारों के स्वास्थ्य विभाग की ओर से टीबी की रोकथाम के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में तो टीबी का फ्री में इलाज भी किया जाता है।

दुनियाभर में प्रति सेकंड एक नया मनुष्य टी.बी. जैसे मर्ज से संक्रमित होता है। मेडिकल साइंस के अनुसार टीबी (ट्यूबरक्लोसिस) लाइलाज रोग नहीं है, लेकिन रोगी द्वारा नियमित रूप से दवा न लेने के कारण अब इस मर्ज ने भारत समेत दुनियाभर में एम.डी.आर. और एक्स डी.आर टीबी के रूप में एक नई गंभीर स्वास्थ्य समस्या उत्पन्न कर दी है।

''दुनियाभर में प्रति सेकंड एक नया मनुष्य टीबी की बीमारी से संक्रमित होता है''

इस रोग को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है

टीबी (ट्यूबरक्लोसिस) की बीमारी का मुख्य कारण माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्यूलोसिस नामक जीवाणु (बैक्टीरिया) है। यह बैक्टीरिया लोगों के शरीर में निष्क्रिय अवस्था में हफ्तों से महीनों तक जीवित रह सकता है।

 ''अगर किसी मरीज की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है, तो ऐसी स्थिति में यह बैक्टीरिया उस व्यक्ति को टीबी से ग्रस्त कर सकता है''
 

जब भी कोई मरीज फेफड़े की टीबी की बीमारी से पीड़ित होता है, तो खांसते या छींकते समय ये जीवाणु हवा में फैलने लगते हैं और सामने वाले व्यक्ति के शरीर में सांस द्वारा फेफड़े के अंदर चले जाते हैं। कभी-कभी ये जीवाणु फेफड़े में या शरीर के अन्य भागों में निष्क्रिय रहते हैं। जब कभी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है, तो यह उस व्यक्ति में टीबी पैदा कर सकते हैं।

 बीमारी के प्रकार

अधिकतर मरीजों में टीबी के जीवाणु फेफड़े को प्रभावित करते हैं। इस कारण फेफड़े में टीबी की बीमारी हो जाती है। 20 से 25 प्रतिशत लोगों में ये जीवाणु शरीर के किसी भी भाग को प्रभावित कर सकते हैं। खासकर आंत और हड्डी को। गौरतलब है कि टीबी के सबसे अधिक संक्रमण मरीजों को सिर्फ फेफड़े में ही होते हैं।

फेफड़े की टीबी के लक्षण

दो हफ्ते से ज्यादा वक्त तक खांसी आना, खांसी में बलगम या खून आना

लंबे समय तक बुखार रहना

सीने में दर्द होना

वजन में कमी होना

आंत की टीबी के लक्षण

पेट में दर्द होना

पेट में सूजन आना

आंत का फट जाना

कैसे लगाएं बीमारी का पता

बीमारी का पता करने के लिए मुख्य तौर पर फेफड़े का एक्स-रे, बलगम की जांच, पेट का अल्ट्रासाउंड और गले की गांठों की जांच की आवश्यकता पड़ती है। सामान्य तौर पर टीबी की बीमारी 6 से 9 महीने में सही दवाओं के इस्तेमाल से ठीक हो जाती है। मरीज को यह सलाह दी जाती है कि दवाओं का प्रयोग नियमित तौर पर करें।

दवाओं को निर्धारित समय से पहले छोड़ देने से दवाओं का असर कम हो जाता हैं और जीवाणु इन दवाओं के लिए प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा लेते हैं। दवाएं तब तक जारी रखें, जब तक डॉक्टर परीक्षण करके इन्हें बंद करने की अनुमति न दें।

राष्ट्रीय संशोधित टीबी(क्षय रोग)नियंत्रण कार्यक्रम के तहत टीबी मुक्ति के लिए इलाज की निगरानी पर ध्यान दिया जा रहा है। एक बार थोड़ा सा ठीक होने के बाद दवा छोड़ने के कारण कई लोग फिर से टीबी की चपेट में आ रहे हैं। जिला स्वास्थ्य विभाग के रिकार्ड के मुताबिक हर महीने 300 से अधिक टीबी मरीजों की पुष्टि की जाती है।

इनमें से 5 फीसद मरीज ऐसे होते हैं, जिन्हें दोबारा टीबी ने घेरा है। जो मरीज दोबारा टीबी की चपेट में आते हैं, उनकी स्थिति ज्यादा गंभीर होती है। यही वजह है कि अब टीबी मरीजों के इलाज की निगरानी को प्रमुखता से लिया जा रहा है।

टीबी से बचाव के उपाय

ख़बरों के अनुसार टीबी और एचआईवी पीडि़त मरीजों के लिए सरकार ने एक नई मुहिम '99 डॉट्स' शुरू की है। जिसके तहत रोगी के दवा लेने के बारे में डॉक्टर को मोबाइल से पता चल जाएगा, इससे मरीजों के इलाज की बेहतर मॉनिटरिंग हो सकेगी।

इस नए अभियान से रोगी को दवा का उपयोग करने के बाद टेबलेट के रेपर के नीचे लिखे मोबाइल नंबर पर मिस्ड कॉल करना होता है। जिसके आधार पर यह पता चल जाता है की मरीज ने दवा खा ली है। किसी के पास मोबाइल नही है तो उसके लिए डॉट्स प्रोवाइडर अपने मोबाइल से फोन करेंगे। यदि वो भी फोन नहीं करते है तो समझा जाएगा की दवा नहीं ली गई है।


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