नेशनल

सिर्फ रस्म अदाएगी नहीं है इंटरनेशनल कंडोम डे (खास रिपोर्ट )

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
2741
| फरवरी 14 , 2018 , 14:05 IST

भारत में अब सेक्स टैबू नहीं रहा है अब यहां भी लोग जागरूक हो रहे हैं। पिछले 10 सालों में भारत में सुरक्षित सेक्स को लेकर महिलाओं में जागरूकता बढ़ी है। अब बड़ी संख्या में अविवाहित और सेक्शुअली ऐक्टिव महिलाएं सेक्स को लेकर सावधानी बरत रही हैं।

14 फरवरी दुनियाभर में वेलेंटाइन डे के तौर पर मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि 14 फरवरी को सिर्फ वेलेंटाइन डे ही नहीं बल्कि इंटरनेशनल कंडोम डे के तौर पर भी मनाया जाता है। 14 फरवरी को हर साल इंटरनेशनल कंडोम डे मनाया जाता है ताकि हमें याद दिलाया जा सके कि कंडोम हमारी और हमारे साथी की सुरक्षा और यौन संक्रमित बीमारियों से बचाव का एक सुरक्षित और सस्ता माध्यम है। अमेरिका में तो इस पूरे हफ्ते को सेक्स अवेयरनेस वीक के तौर पर मनाया जाता है।

अकेले अमेरिका में हर साल यौंन संक्रमित बीमारियों से बीस लाख नए मामले सामने आते हैं, जिन्हें कंडोम के इस्तेमाल से कम किया जा सकता है। भारत में ये आंकडे कहीं ज्यादा हैं।

कंडोम का इस्तेमाल करने से न सिर्फ यौन संक्रमित बीमारियों से बचाव होता है, बल्कि एचआईवी वायरस से भी सुरक्षा मिलती है। किसी भी नए इंसान के से यौन संबंध बनाते समय कंडोम का उपयोग जरूर करना चाहिये। साथ ही कंडोम को इस्तेमाल करने का सही तरीका भी मालूम होना चाहिये।

कंडोम का इस्तेमाल जहां एक ओर अनचाहे गर्भ से छुटकारा दिलाता है, वहीं दूसरी ओर यौन संक्रमण से भी सुरक्षा करता है। जैसे कि एड्स या अन्य संक्रामक बिमारियां क्योंकि, यदि आप दोनों में से किसी को भी कोई संक्रामक बीमारी है तो सेक्स के दौरान यह आसानी से फैलती हैं। इसलिए, सेक्स के दौरान कंडोम का प्रयोग सुरक्षित माना जाता है।

विश्‍व में एड्स की ये है संख्‍या :

साल 2014 की रिपोर्ट के अनुसार 3.99 करोड़ लोग पूरे विश्व में एड्स से पीड़ित हैं और वर्ष 2014 तक 12 लाख लोगों की एड्स से मौतें हो चुकी हैं।  पिछले 15 वर्षों में एड्स के मामलों में 35% कमी आई है और पिछले एक दशक में एड्स से हुई मौतों के मामलों में 42%  कमी आई है। अगर हम भारत की स्थिति की बात करें तो पूरे विश्व में एचआईवी पीड़ितों की आबादी के मामलें में हमारा देश पूरे विश्व में तीसरा स्थान रखता है। यहां 15-20 लाख लोग एड्स से पीड़ित हैं और 1.50 लाख लोग वर्ष 2011-2014 के बीच इसकी वजह से मर चुके हैं। हमारे देश में कुल एड्स पीड़ितों में 40% महिलाएं इससे पीड़ित हैं।

किशोर अधिक पीड़ित :  

विश्व में एचआईवी से सबसे अधिक किशोर 10-19 वर्ष से पीड़ित हैं। यह संख्या 20 लाख से अधिक है। वर्ष 2000 से अब तक किशोरों के एड्स से पीड़ित होने  के मामलों में तीन गुना इजाफा हुआ है। यह दावा यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट में किया गया है, जो की चिंता का विषय है। एड्स से पीड़ित दस लाख से अधिक किशोर सिर्फ छह देशों में ही रह रहे हैं, इनमे दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, केन्या, भारत, मोंजाबिक और तंजानिया हैं। मां से नवजात को होने वाले एचआईवी संक्रमण से मुक्त पहला देश क्यूबा बन गया है।

लोगो को एड्स के प्रति जागरूक करने के मकसद से 1988 से हर वर्ष एक दिसम्बर को विश्व एड्स मनाया जाता है।   एड्स को तमाम जागरूकता, अभियानों के बावजूद अब भी एक संक्रमण नहीं, बल्कि सामाजिक कलंक के रूप में देखा जाता है। घर-परिवार और समाज से लेकर कामकाज की जगहों तक में एचआईवी/ एड्‌स से ग्रस्त लोग अपमान, प्रताड़ना और भेदभाव के शिकार हो रहे हैं।

स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से करवाए गए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2015-16 के मुताबिक, 15 से 49 साल की अविवाहित महिलाएं जो सेक्शुअली एक्टिव हैं उनके बीच पिछले 10 सालों में कॉन्डम का इस्तेमाल 2 प्रतिशत से बढ़कर 12 प्रतिशत हो गया है।

इस रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 8 में 3 पुरुषों का मानना है कि गर्भनिरोध महिलाओं की जिम्मेदारी है और इससे पुरुषों का कोई लेना देना नहीं है।

सर्वे के मुताबिक 20 से 24 साल के बीच की सेक्शुअली ऐक्टिव अविवाहित लड़कियों के बीच कॉन्डम का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है।

पंजाब में सबसे ज्यादा है जागरुकता-

गर्भनिरोधक के इस्तेमाल में सबसे आगे पंजाब है। यहां 76 प्रतिशत लोग गर्भनिरोधक विधियों का इस्तेमाल करते हैं। यहां 99 प्रतिशत विवाहित महिला और पुरुष एक न एक गर्भनिरोधक विधि के बारे में जरूर जानते हैं। 15-49 साल की अविवाहित महिलाओं में से 34 प्रतिशत महिलाएं गर्भनिरोधक विधि का इस्तेमाल करती हैं। यहां तक कि इनमें से 32 प्रतिशत महिलाएं मॉर्डन तरीके अपनाती हैं। देश में मणिपुर और बिहार राज्यों में गर्भनिरोधक को लेकर सबसे कम जागरुकता है। यहां महज 24 प्रतिशत लोग इसका इस्तेमाल करते हैं।

हालांकि, महिलाओं की बड़ी संख्या अभी भी परंपरागत गर्भनिरोधक विधियों का सहारा लेती है। लेकिन सेक्सुअली एक्टिव अविवाहित महिलाएं मॉर्डन कॉन्ट्रासेप्टिव मेथड का सहारा लेती हैं। इनमें- कॉन्डम, नसबंदी, इमरजेंसी पिल्स, डायफ्राम्स और आईयूडी जैसे तरीके अपनाती हैं।

कब हुई थी क़डोम की शुरुआत -

क़डोम के बारे में हम सब जानते हैं। लेकिन कभी सोचा है कि इसकी शुरुआत कब हुई। और आज जो हम कंडोम देखते हैं वो पहले मिलने वाले कंडोम से कितने अलग हैं। कंडोम की खोज से ले कर आज तक के सफ़र पर आज एक नज़र डालते हैं और आपको बताते हैं कि कैसे हमारे पूर्वजो ने इसकी ख़ोज की थी।

1564 में पहली बार इटली के डॉक्टर Gabriel Fallopio ने एक ऐसी चीज़ बनाइ थी जो सुरक्षित सेक्स को बढ़ावा देती थी। लेकिन उस वक़्त लोगों को Gabriel Fallopio की ये खोज़ बेवकूफ़ी भरी लगी थी।

1600 में पहली बार कंडोम का आकार सबके सामने आया। इसे जानवरों की खाल से बनाया जाता था। लेकिन इसकी कीमत इतनी ज़्यादा थी कि इसे आम लोग इस्तेमाल नहीं कर सकते थे।

1605 में कैथलिक गुरू Leonardus Lessius ने कंडोम के इस्तेमाल को अधर्मी बताया था। उनके हिसाब से सेक्स के बीच किसी भी रूकावट को भगवान के खिलाफ़ माना जाता था।

1839 में पहली बार Charles Goodyear ने रबर कंडोम की खोज की, जिसकी कीमत जानवरों की खाल से बने कंडोम से कहीं कम थी।

1919 में पहली बार ऐसा कंडोम बना जो आज के कंडोम से काफ़ी हद तक मिलता-जुलता था। और पहली बार ये कंडोम आम लोगों के लिए मार्केट में उतारा गया था।

1931 में कंडोम को अमेरिकी आर्मी के लिए ज़रूरी वस्तु बना दिया गया। इस साल के बाद से ही आर्मी के जवानों को कंडोमे फ्री बांटे जाने लगे थे।

1957 में Durex ने दुनिया का पहला lubricated कंडोम बाज़ार में उतारा था।

 


कमेंट करें