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91वें के हुए आडवाणी, इन्हीं के दम पर BJP ने पहली बार चखा था सत्ता का स्वाद (जन्मदिन विशेष)

राजू झा, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| नवंबर 8 , 2018 , 15:36 IST

भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी (Lal Krishna Advani) का आज जन्मदिन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने बृहस्पतिवार को भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद लालकृष्ण आडवाणी को उनके 91वें जन्मदिन के अवसर पर घर जाकर शुभकामनाएं देते हुए कहा कि राष्ट्र निर्माण में उनका बहुत बड़ा योगदान है। पीएम मोदी ने टि्वटर पर लिखा, ‘भारत के विकास में आडवाणी जी का योगदान बहुत बड़ा है। मंत्री के तौर पर उनके कार्यकाल की प्रशंसा भविष्योन्मुखी निर्णय लेने और जनपक्षधर नीतियों के लिए की जाती है। उनकी विद्वता की प्रशंसा सभी राजनीतिज्ञ करते हैं।' बता दें कि खुद पीएम मोदी लालकृष्ण आडवाणी से मिलने उनके आवास पर भी गए हैं, जहां उन्होंने बधाई विश किया।

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इससे पहले पीएम मोदी ने एक अन्य ट्वीट में कहा, ‘पार्टी के वरिष्ठ नेता का भारतीय राजनीति पर अमिट प्रभाव पड़ा है। उन्होंने नि:स्वार्थ भावना और सतत परिश्रम से भाजपा को खड़ा किया और आश्चर्यजनक रूप से कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया।'

बता दें कि लालकृष्ण आडवाणी का जन्म कराची ( पाकिस्तान) में 1927 को हुआ था। वह भारतीय राजनीति में कद्दावर नेता माने जाते हैं। उनका सफर आरएसएस के सदस्य से लेकर से कंद्रीय मंत्री तक रहा है।

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आडवाणी ऐसे नेताओं में से एक है जिन्होंने पक्ष-विपक्ष दोनो को अपने परिवार की तरह समझा है। तभी तो वो हमेशा सोनिया गांधी का खड़े होकर स्वागत करते नजर आए थे।

आडवाणी का कार्यकाल

बीजेपी के संस्थापकों में से एक आडवाणी को देश के दिग्गज नेताओं में शुमार किया जाता है। इससे पहले वे लोकसभा के 10 वीं और 14 वीं कार्यकाल में विपक्ष के नेता भी रह चुके हैं। 1998 से लेकर 2004 तक एनडीए के शासनकाल में वो देश के गृह मंत्री और उप-प्रधानमंत्री भी रहे हैं। पाकिस्तान के करांची में 9 नवंबर 1927 को जन्में लाल कृष्ण आडवाणी ने अपने राजनितिक सफर की शुरुआत आरएसएस से की थी। बंटवारे के पहले 1947 में वे संघ के कराची शाखा के सचिव भी थें।

साल 1951 में वे भारतीय जन संघ के सदस्य बनें। साल 1970 से 1976 तक वे दिल्ली से राज्यसभा के सदस्य रहें। 1973 में आडवाणी भारतीय जन संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बनें। साल 1977 जनसंघ के जनता पार्टी में विलय के बाद वो मोरारजी देसाई सरकार में मंत्री भी रहें थें। वहीं बीजेपी के गठन के बाद 1980 से लेकर 1986 तक राष्ट्रीय महासचिव भी रहें। फिलहाल वो गुजरात के गांधीनगर से सांसद और भाजपा के मार्गदर्शन मंडल में शामिल हैं।

...जब केन्द्र में जनता पार्टी की संयुक्त सरकार

आडवाणी ने ना सिर्फ पार्टी के चुनाव चिन्ह की कल्पना की थी बल्कि ये बात भी कम हो लोगों को पता होगी कि आपातकाल के बाद जब केन्द्र में जनता पार्टी की संयुक्त सरकार बनी थी उस वक्त उसमें जनसंघ के प्रतिनिधि के रुप में अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल थे।आडवाणी को तभी ये बात महसूस होने लगी थी कि जनता पार्टी के कई नेताओं ने दिल से जनसंघ को स्वीकार नहीं किया था। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी से भी अपनी आशंका जाहिर की और नई पार्टी बनाने का आग्रह किया। जाहिर तौर पर पूरी जिम्मेदारी आडवाणी पर आयी। फिर चुनाव चिह्न की बात आई और आडवाणी ने ही कमल का फूल चुना।

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जब जनसंघ अध्यक्ष के तौर पर पहली बार आडवाणी ने की कार्रवाई

1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आरएसएस के साथ मिलकर जिस राजनीतिक पार्टी भारतीय जनसंघ की स्थापना की गई थी उसमें आडवाणी सदस्य के तौर पर जुड़ गए। उन्हें राजस्थान में जनसंघ के जनरल सेक्रेटरी एस.एस. भंडारी का सचिव बनाया गया। उसके बाद वह 1957 में दिल्ली आ गए और जल्द ही जनसंघ की दिल्ली इकाई के जनरल सेक्रेटरी और बाद प्रेसिडेंट बन गए। जनसंघ में विभिन्न पदों पर काम करने के बाद लालकृष्ण आडवाणी को कानपुर सेशन के दौरान पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में अध्यक्ष बनाया गया।

अध्यक्ष के तौर पर आडवाणी ने पहली बार कार्रवाई करते हुए जनसंघ के वरिष्ठ नेता और संस्थापक सदस्य बलराज मधोक पर पार्टी हितों के खिलाफ काम करने के आरोप में कार्रवाई करते हुए उन्हें निलंबित कर दिया था।

1976 से 1982 तक गुजरात से राज्यसभा के सदस्य

आडवाणी 1976 से लेकर 1982 तक गुजरात से राज्यसभा के सदस्य रहे। इंदिरा गांधी की तरफ से देश में लगाए गए आपातकाल के बाद जनसंघ और कई अन्य विपक्षी दलों का जनता पार्टी के तौर पर उभार हुआ। आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी 1977 में लोकसभा का चुनाव लड़े और जनता पार्टी का सदस्य बने। इंदिरा गांधी की तरफ से लगाए गए आपातकाल के विरोध में खड़े हुए कई राजनेताओं और अन्य दलों के कार्यकर्ताओं ने मिलकर जनता पार्टी का गठन किया।

1977 में हुए चुनाव के बाद केन्द्र में कांग्रेस (ओ), स्वत्रंता पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, जनसंघ और लोकदल की मदद से सरकार बनी। आपातकाल से बौखलाए लोगों ने इंदिरा के खिलाफ वोट किया और केन्द्र में मोरारजी देसाई की सरकार बनी। इस सरकार में लालकृष्ण आडवाणी सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने जबकि आडवाणी को विदेश मंत्री बनाया गया था। हालांकि, ये सरकार ज्यादा दिनों तक नहीं चली। उधर, जनसंघ के सदस्यों ने जनता पार्टी को छोड़कर एक नई भारतीय जनता पार्टी का गठन किया।
आडवाणी और रथ यात्रा

हिन्दुत्व के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी को 2 सीटों से 182 सीटों तक पहुंचाने में लालकृष्ण आडवाणी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। वर्ष 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद से 1986 तक लालकृष्ण आडवाणी पार्टी के महासचिव रहे। इसके बाद 1986 से 1991 तक पार्टी के अध्यक्ष पद का उत्तरदायित्व भी उन्होंने संभाला। इसी दौरान वर्ष 1990 में राम मंदिर आंदोलन के दौरान उन्होंने सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथयात्रा निकाली। हालांकि आडवाणी को बीच में ही गिरफ़्तार कर लिया गया पर इस यात्रा के बाद आडवाणी का राजनीतिक कद और बड़ा हो गया। 1990 की रथयात्रा ने लालकृष्ण आडवाणी की लोकप्रियता को चरम पर पहुंचा दिया था। वर्ष 1992 में ढांचा विध्वंस के बाद जिन लोगों को अभियुक्त बनाया गया है उनमें आडवाणी का नाम भी शामिल है।

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आडवाणी ने कभी दामन पर नहीं लगने दिया दाग

राम मंदिर आंदोलन के दौरान देश में सबसे ज़्यादा लोकप्रिय नेता होने और संघ परिवार का पूरा आशीर्वाद होने के बावजूद आडवाणी ने 1995 में वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार ऐलान करके सबको हैरानी में डाल दिया था। उस वक़्त आडवाणी खुद प्रधानमंत्री बन सकते थे, लेकिन आडवाणी ने कहा कि भाजपा में वाजपेयी से बड़ा नेता कोई नहीं हैं। पचास साल तक वे वाजपेयी के साथ नंबर दो बने रहे। पचास साल से ज़्यादा के राजनीतिक जीवन के बावजूद आडवाणी पर कोई दाग नहीं रहा और जब 1996 के चुनावों से पहले कांग्रेस के नरसिंह राव ने विपक्ष के बड़े नेताओं को हवाला कांड में फंसाने की कोशिश की थी। उस समय आडवाणी ने सबसे पहले इस्तीफ़ा देकर कहा कि वे इस मामले में बेदाग़ निकलने से पहले चुनाव नहीं लड़ेंगे और 1996 के चुनाव के बाद वे मामले में बरी हो गए।


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