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एक भारतीय सैनिक जो शहीद होने के बाद भी करता है सरहद की रखवाली, जानें अद्भुत कहानी

icon अमितेष युवराज सिंह | 1
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| अगस्त 15 , 2018 , 19:27 IST

मौत के 50 साल बाद भी सिपाही हरभजन सिंह सिक्किम सीमा पर हमारे देश की सुरक्षा कर रहे हैं। सैनिक 'बाबा हरभजन सिंह' को 'नाथूला का हीरो' भी कहा जाता है। क्या मौत के बाद भी कोई निगहबानी कर सकता है? क्या मौत के बाद भी कोई आपकी सुरक्षा के लिए खड़ा रह सकता है? ये प्रश्न कितने अजीब लग रहे हैं, पर इन प्रश्नों के पीछे छिपा है एक ऐसा रहस्य जिसे कम ही लोग जानते हैं।

यही कारण है कि आज भी भारतीय सेना उनके मंदिर का रखरखाव कर रही है और मंदिर में पूजा-पाठ की जिम्मेदारी भी सेना के जिम्मे में है। जानकारों के मुताबिक पंजाब रेजिमेंट के जवान हरभजन सिंह की आत्मा पिछले 50 सालों से लगातार देश की सीमा की रक्षा कर रही है।

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बाबा हरभजन सिंह मंदिर के बारे में वहां तैनात सैनिकों का कहना है कि हरभजन सिंह की आत्मा, चीन की तरफ से आने वाले किसी भी खतरे को पहले ही बता देती है। इसके अलावा यदि भारतीय सैनिकों को चीन के सैनिकों का कोई भी मूवमेंट पसंद नहीं आता तो वो चीनी सैनिकों को भी पहले ही बता देते हैं।

आप चाहे इस पर भरोसा करें या नहीं, चीनी सैनिकों को भी बाबा हरभजन सिंह पर पूरा भरोसा है। इसलिए भारत और चीन के बीच होने वाली हर फ्लैग मीटिंग में बाबा हरभजन सिंह के नाम की खाली कुर्सी लगाई जाती है, ताकि वो मीटिंग अटेंड कर सकें।

सैनिकों का कहना है कि हरभजन सिंह की आत्मा, चीन की तरफ से होने वाले खतरे के बारे में पहले से ही उन्हें बता देती है। और यदि भारतीय सैनिको को चीन के सैनिकों का कोई भी मूवमेंट पसंद नहीं आता है तो उसके बारे में वो चीन के सैनिको को भी पहले ही बता देते है ताकि बात ज्यादा नहीं बिगड़े और मिल जुल कर बातचीत से उसका हल निकाल लिया जाए। 

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कौन है हरभजन सिंह

हरभजन सिंह का जन्म 30 अगस्त 1946 को, जिला गुजरावाला जो कि वर्तमान में पाकिस्तान में है, हुआ था । हरभजन सिंह 24 पंजाब रेजिमेंट के जवान थे जो कि 1966 में आर्मी में भर्ती हुए थे। पर मात्र 2 साल की नौकरी करके 1968 में, सिक्किम में, एक दुर्घटना में मारे गए। हुआ यूं कि एक दिन जब वो खच्चर पर बैठ कर नदी पार कर रहे थे तो खच्चर सहित नदी में बह गए। नदी में बह कर उनका शव काफी आगे निकल गया। दो दिन की तलाशी के बाद भी जब उनका शव नहीं मिला तो उन्होंने खुद अपने एक साथी सैनिक के सपने में आकर अपनी शव की जगह बताई।

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सवेरे सैनिकों ने बताई गई जगह से हरभजन का शव बरामद अंतिम संस्कार किया। हरभजन सिंह के इस चमत्कार के बाद साथी सैनिकों की उनमे आस्था बढ़ गई और उन्होंने उनके बंकर को एक मंदिर का रूप दे दिया। हालांकि जब बाद में उनके चमत्कार बढ़ने लगे और वो विशाल जन समूह की आस्था का केंद्र हो गए तो उनके लिए एक नए मंदिर का निर्माण किया गया जो की ‘बाबा हरभजन सिंह मंदिर’ के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर गंगटोक में जेलेप्ला दर्रे और नाथुला दर्रे के बीच, 13000 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है। पुराना बंकर वाला मंदिर इससे 1000 फ़ीट ज्यादा ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर के अंदर बाबा हरभजन सिंह की एक फोटो और उनका सामान रखा है।

आज भी देते हैं ड्यूटी

बाबा हरभजन सिंह अपनी मृत्यु के बाद से लगातार अपनी ड्यूटी देते आ रहे हैं। इनके लिए उन्हें बाकायदा तनख्वाह भी दी जाती है, उनकी सेना में एक रैंक है, नियमानुसार उनका प्रमोशन भी किया जाता है। यहां तक की उन्हें कुछ साल पहले तक 2 महीने की छुट्टी पर गाँव भी भेजा जाता था। इसके लिए ट्रेन में सीट रिज़र्व की जाती थी, तीन सैनिको के साथ उनका सारा सामान उनके गाँव भेजा जाता था तथा दो महीने पूरे होने पर फिर वापस सिक्किम लाया जाता था। जिन दो महीने बाबा छुट्टी पर रहते थे उस दरमियान पूरा बॉर्डर हाई अलर्ट पर रहता था क्योकि उस वक़्त सैनिको को बाबा की मदद नहीं मिल पाती थी।

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लेकिन बाबा का सिक्किम से जाना और वापस आना एक धार्मिक आयोजन का रूप लेता जा रहा था जिसमें बड़ी संख्या में जनता इकठ्ठी होने लगी थी। कुछ लोग इस आयोजान को अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला मानते थे इसलिए उन्होंने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया क्योंकि सेना में किसी भी प्रकार के अंधविश्वास की मनाही होती है। लिहाज़ा सेना ने बाबा को छुट्टी पर भेजना बंद कर दिया। अब बाबा साल के बारह महीने ड्यूटी पर रहते हैं। मंदिर में बाबा का एक कमरा भी है जिसमें प्रतिदिन सफाई करके बिस्तर लगाए जाते हैं। बाबा की सेना की वर्दी और जुते रखे जाते है। कहते है कि रोज़ पुनः सफाई करने पर उनके जूतों में कीचड़ और चद्दर पर सलवटे पाई जाती हैं।

लोगों की आस्था का केंद्र है मंदिर

बाबा हरभजन सिंह का मंदिर सैनिकों और लोगों दोनों की ही आस्थाओ का केंद्र है। इस इलाके में आने वाला हर नया सैनिक सबसे पहले बाबा को देखने आता है। इस मंदिर को लेकर यहाँ के लोगो में एक अजीब सी मान्यता यह है कि यदि इस मंदिर में बोतल में भरकर पानी को तीन दिन के लिए रख दिया जाए तो उस पानी में चमत्कारिक औषधीय गुण आ जाते है। इस पानी को पीने से लोगो के रोग मिट जाते है। इसलिए इस मंदिर में नाम लिखी हुई बोतलों का अम्बार लगा रहता है। यह पानी 21 दिन के अंदर प्रयोग में लाया जाता है और इस दौरान मांसाहार और शराब कआ सेवन निषेध होता है।

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बाबा का बंकर, जो कि नए मंदिर से 1000 फ़ीट की ऊंचाई पर है, लाल और पीले रंगो से सज़ा है। सीढ़िया लाल रंग की और पिलर पीले रंग के। सीढ़ियों के दोनों साइड रेलिंग पर नीचे से ऊपर तक घंटिया बंधी है। बाबा के बंकर में कॉपिया राखी है। इन कॉपियों में लोग अपनी मुरादे लिखते है ऐसा माना जाता है की इनमे लिखी गई हर मुराद पूरी होती है। इसी तरह में बंकर में एक ऐसी जगह है जहाँ लोग सिक्के गिराते है यदि वो सिक्का उन्हें वापस मिला जाता है तो वो भाग्यशाली माने जाते है। फिर उसे हमेशा के लिए अपने पर्स या तिजोरी में रखने की सलाह दी जाती है। दोनों जगहों का सम्पूर्ण संचालन आर्मी के द्वारा ही किया जाता है।


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अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं

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