गोरी, गजनवी, औरंगजेब के भूत कब तक जीते रहेंगे?

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| अक्टूबर 24 , 2017 , 16:11 IST

गजनवी, गोरी, औरंगजेब और जिन्ना के भूत जब तक जीते रहेंगे, हिन्दुओं का हृदय साफ नहीं होगा। जब तक हम इतिहास के दग्ध अंश को नहीं भूलते, हम मुसलमानों को सहज दृष्टि से देखने में असमर्थ रहेंगे“ बयान की शक्ल में आप इसे पढ़ें तो लगेगा कि अभी ताजा ताजमहल विवाद के बाद किसी संतुलित शख्स का बयान है। संगीत सोम के सुलगाने वाले बयान के बाद किसी सुलझाने वाले का जवाब है। जी नहीं, ये रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां हैं और उस किताब का हिस्सा हैं, जिसका पाठ हर दौर में जरूरी है। इस दौर में भी, जब चुनावी रणभेरियों के बीच हिन्दू - मुसलमान को खांचे में बांटों और राज करो की सियासत परवान चढ़ रही है। इस मंशा के सियासतदां इधर भी हैं, उधर भी हैं।

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भय के इस माहौल में दिनकर को याद करना प्रासंगिक

आज से क़रीब साठ साल पहले 1956 में रामधारी सिंह दिनकर का लिखा संस्कृति के चार अध्याय पढ़ रहा हूँ। छह दशक पहले लिखी गई इस किताब को पढ़ते समय ऐसा लग रहा है, जैसे इसके ज़्यादातर हिस्से अभी कुछ दिनों पहले लिखे गए हों। जब देश में, समाज में, मीडिया में, गली -मोहल्लों में, गाँव -शहरों में जहाँ भी देखिए-सुनिए हर तरफ़ हिन्दू -मुसलमान, हिन्दू -मुसलमान हो रहा हो तब दिनकर रचित संस्कृति के चार अध्याय का पुनर्पाठ हम सबको करना चाहिए।

दिनकर ने सांप्रदायिक कट्टरवाद पर किया था चोट

'कट्टर सोच' पर चोट करते हुए उदारता, एकता और समग्रता की जो बात तब दिनकर ने कही थी, वो आज भी मौजूं है। ऐसे समय में जब बाबर का बदला जुम्मन से लेने की बात होने लगती है, ऐसे समय में जब ताज को नफरत और कलंक की इमारत बताकर एक पूरी कौम को नीचा दिखाने की राजनीति होने लगती है, ऐसे समय में जब हिन्दू और मुसलमानों के बीच की खाई के चौड़ीकरण में ध्रुवीकरण का फायदा देख सोम, साक्षी, ओवैसी, आजम जैसे नेताओं का गेम प्लान तय होने लगता है तो दिनकर देश को राह दिखाते नजर आते हैं। ये राह न तो कोई नई राह है, न ऐसी राह, जिसके बारे में सियासी दलों को पता न हो लेकिन ध्रुवीकरण और तुष्टीकरण की सियासत करते करते सभी दलों ने अपने -अपने हितों के लिए दोनों का इस्तेमाल ही किया है। खाई बने रहने और चौड़ी होते रहने में दलों का फायदा है, खाई पटने में देश का फायदा है। यही कहने की कोशिश की थी दिनकर ने संस्कृति के चार अध्याय में। क़रीब सवा सात सौ पन्ने के इस ग्रंथ के कुछ हिस्से अलग -अलग अध्याय से उठाकर यहाँ रख रहा हूं। आज के परिदृश्य में इन शब्दों -वाक्यों -कथ्यों और भावनाओं को परखिए.. समझिए।

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'संस्कृति के अध्याय' के बरअक्स देश का राजनीतिक और सामाजिक तानाबाना

"अच्छे -अच्छे हिन्दू को यदि वर्षों तक समझाया जाए कि मुसलमान तुमसे घृणा करते हैं, तो इस ज़हरीले आघात से वो अविचलित नहीं रह सकता। हिन्दुओं में सांम्पदायिकता की वृद्धि इसी प्रकार हुई है और जब हिन्दुओं में सांप्रदायिकता दिखाई पड़ी तो मुसलमानों की सांप्रदायिकता और भी बढ गई और दोनों धर्मों के बहुत से लोग परस्पर शत्रु हो उठे।

“हिन्दू - मुस्लिम समस्या का समाधान ये है कि मुसलमानों के भीतर इस भाव को पुष्ट करना कि भारत उनका देश है और भारत के लिए उन्हें उसी प्रकार जीना और मरना चाहिए जिस प्रकार अन्य देशों के लोग अपने देश के लिए जीने और मरने में आगा -पीछा नहीं करते हैं। यह समाधान है मुसलमानों के हृदय की उस शंका को निर्मूल कर देना, जिससे वो हिन्दुओं के बहुमत से भय खाते हैं। 

“इस समाधान का स्वभावत: ही एक दूसरा पक्ष भी है, जिसका संबंध हिन्दुओं से है। जब तक हम इतिहास के दग्ध अंश को नहीं भूलते, हम मुसलमानों को सहज दृष्टि से देखने में असमर्थ रहेंगे। गजनवी, गोरी, औरंगजेब और जिन्ना के भूत जब तक जीते रहेंगे, हिन्दुओं का हृदय साफ नहीं होगा। गजनवी, गोरी, औरंगजेब और जिन्ना ही नहीं, अकबर, दाराशिकोह, बहादुरशाह, अजमल खां, अनसारी और आजाद भी मुसलमान ही थे।

“जब चिराग की लौ पतली हो तब जोर की हवा नहीं चलनी चाहिए। अनसारी और आजाद की विजय बहुमत की सहिष्णुता से होगी, हिन्दुओं की उदारता और संपूर्ण न्याय-बुद्धि से होगी। भारत की धार्मिक और प्रजातीय एकता की समस्या ऐसी नहीं है, जिसका समाधान वीरता, जोश और निर्भयता से ढूंढा जा सके। यह बड़ा ही नाजुक काम है. इसमें मौन हमारी जितनी सहायता करेगा, उतनी मुखरता नहीं।

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खुसरो-जायसी मुसलमान थे औऱ भारतभक्त भी

“धीरज और शांति से देश का जितना भला होगा, उतना आवेश और अशांति से नहीं। कोई एक निर्णय करके उस पर अड़ जाने से एकता का प्रश्न हल नहीं होगा। हमे कदम -कदम पर समझौते और सामंजस्य की खोज करनी है और यह काम आनन -फानन भी नहीं होगा। पीढी -दर-पीढी हमें अभी बहुत दिनों तक शांति बरतनी है, सदभाव निभाना है। अमृत बोते जाना है, जिससे हिन्दू और मुसलमान पारस्परिक भिन्नता को भूलकर एक हो जाए। “ऐसी स्थिति में कौन वह राह है जिस पर चलकर हिन्दू -मुसलमान के और मुसलमान हिन्दू के अधिक समीप पहुंच सकता है? हिन्दुओं की कठिनाई यह है कि इस्लाम का अत्याचार उन्हें भुलाए नहीं भूलता और मुसलमान यह सोचकर पस्त हैं कि जिस देश पर उनकी कभी हुकूमत चलती थी, उसी देश में उन्हें अल्पसंख्यक बनकर जीना पड़ रहा है। ऐसे तरीके तो प्रत्येक शासन पद्धति में पाए जा सकते हैं, जिससे अल्पसंख्यकों की हर जायज शिकायत दूर की जा सके। किन्तु यह तभी संभव है जब अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक समुदाय एक -दूसरे का विश्वास करें।
मुसलमानों को यह समझना है कि आदमी की धर्म -भक्ति और उनके स्वेदश प्रेम में विरोध नहीं है। अमीर खुसरो , जायसी , अकबर , रहीम और दाराशिकोह मुसलमान भी थे और भारत भक्त भी।

दिनकर ने जब संस्कृति के चार अध्याय लिखना शुरु किया था, तब देश ताज़ा -ताज़ा आज़ाद हुआ था। मुस्लिम लीग की कौमी सियासत, जिन्ना की साज़िश के साथ -साथ बँटवारे और दंगे का दंश झेलकर देश खड़ा होने की कोशिश कर रहा था। आज हम वहाँ से सत्तर साल आगे आ चुके हैं। देश चौदह प्रधानमंत्री और सोलह लोकसभा चुनाव देख चुका है। हालात बदले. देश बदला, परिवेश बदला,समाज बदला। फिर भी हम सबके भीतर का हिन्दू -मुसलमान जब -तब बाहर आता है और गंगा -जमुनी तहज़ीब के चीथड़े उड़ाने लगता है। कभी कोई नेता, कभी कोई सियासी दल, कभी कोई मुद्दा तो कभी कोई चुनाव हिन्दू -मुसलमान के बीच की खाई के चौड़ीकरण का ही काम करता है। उकसाने और पलीता लगाने में सबको फायदा दिखता है।

 

पिछले साल ही बिहार चुनाव से पहले दिनकर की साहित्यिक रचनाओं के पचास साल होने पर दिल्ली में एक भव्य समारोह का आयोजन किया गया था. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उस आयोजन में दिनकर पर लंबा आख्यान दिया था और कहा था कि दिनकर के भीतर एक आग और बेचैनी थी. पीएम मोदी ने दिनकर सांस्कृतिक राष्टवाद का प्रवर्तक कवि बताते हुए कहा था कि दिनकर के जरिए हम भारत को समझने की खिड़की खोल सकते हैं. भाषण हुआ. तालियां बजी. फिर चुनाव हुए. बात खत्म.

बात तो तब होती जब दिनकर की लिखी रचनाओं में से सुविधाजनक पंक्तियों का पाठ करके उसका सियासी इस्तेमाल करने की बजाय दिनकर के लिखे का मुकम्मल पाठ हो. दिनकर ने अपनी इस किताब में मुस्लिम आक्रांताओं और उनके हमलों की विस्तार से व्याख्या की है. उनकी नियत और नियति को भी समझाया है लेकिन अंतिम निचोड़ यही है कि चाहे उग्र हिन्दुत्व हो या कट्टर इस्लाम, दोनों देश हित में नहीं. तभी तो उन्होंने अपनी किताब की भूमिका में ही इस ग्रंथ को भारती एकता का सैनिक कहा है.

आपसी भाईचारा के छीजते चादर को टाँकने के तरीक़े मिलते हैं. सियासी आँच पर खदकते-खौलते हिन्दू जनमानस को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोने की कोशिशें करने की नसीहतें मिलती है. काश कि पीएम मोदी ये किताब खुद भी पढ़ते और अपने ही पार्टी के तमाम नेताओं, सांसदों, विधायकों और नीति नियंताओं को दिनकर की ये किताब पढ़ने और कुछ समझने की नसीहत भी देते।


अजय वशिस्ठ

जनाब आपका लेख में हिन्दू - मुश्लिम दोनों के लिये एक अच्छा सन्देश है ! मेरी नजर में गलती इन दोनों की नही वरन हमारे राजनेताओं की है जिन्होंने सत्तर साल तक देश मे सिर्फ जाति और हिन्दू - मुश्लिम की राजनीति कर सत्ता हांसिल कि हे ! पर आपके लेख में कहीं भी पिछली सरकारों का या सत्तर सालों का वर्णन नही है अच्छा लेख है , लिखिए हम आपकी लेखनी के कायल है आपका अनुज अजय वशिस्ठ