इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि पर फिरोज की बात...क्यों ज़िंदगी से हताश थे फिरोज?

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| अक्टूबर 30 , 2017 , 20:00 IST

एक गांधी तो वो भी था। सांसद था। देश के प्रधानमंत्री का दामाद था। देश की होने वाली प्रधानमंत्री का पति का था। सत्ता के शीर्ष पर बैठे सबसे ताकतवर नेता जवाहरलाल नेहरु की लाडली बेटी इंदिरा प्रियदर्शिनी का पति था। फिर भी वो जिंदगी से परेशान था। संसद के मुखर वक्ता के तौर उसके साथी सासंद उसकी तारीफ करते थे। बड़े-बड़े लोग उसकी संगति चाहते थे। फिर भी वो नाखुश था। खुद से, सियासत से, रिश्तों से, अपने ससुर प्रधानमंत्री से, कांग्रेस अध्यक्ष पत्नी इंदिरा से, आप समझ ही चुके होंगे कि उस शख्स का नाम फिरोज गांधी था। तब नेहरु देश की बागडोर संभाल रहे थे। इंदिरा उनकी विरासत के दावेदार के तौर पर तेजी से आगे बढ़ रही थी। फिरोज पीछे छूट रहे थे। उनके भीतर हताशा भर रही थी। इस कदर हताशा कि वो कहने लगे थे जिंदगी का अब कोई उद्देश्य ही नहीं है तो जीने का क्या फायदा?

उन दिनों इंदिरा गांधी अपने प्रधानमंत्री पिता नेहरु के साथ तीन मूर्ति भवन में रहती थी. फिरोज सांसद कोटे से आवंटित 18 राजेन्द्र प्रसाद रोड के बंगले में. संसद पर सरकार के खिलाफ दो-तीन बार बोल चुके फिरोज गांधी को नेहरु कई वजहों से भीतर ही भीतर नापसंद करने लगे थे. इंदिरा के साथ भी रिश्तों में खटास आ चुकी थी.

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फिरोज भी नेहरु के दामाद के रुप में जाने -पहचाने की बजाय अपनी अलग छवि बनाने के लिए संघर्ष करते-करते अकेले पड़ चुके थे. बाहरी दुनिया में ही भले लाल बहादुर शास्त्री, गोविंद बल्लभ पंत, केडी मालवीय, देवराज बरुआ से लेकर बलिराम भगत, मीनू मसानी, सुभद्रा जोशी, इंदर मल्होत्रा और ऐसे ही बहुत से नामचीन हस्तियां फिरोज गांधी के दोस्त थे, भीतरी दुनिया में वो अकेले पड़ते जा रहे थे. दोस्तों ने सिगरेट और शराब पीने की आदत छुड़ाने की कोशिशें की. फिरोज अपने हिसाब से जीते -परेशान होते रहे. उम्र इतनी नहीं थी कि दिल का दौरा पड़े. 46 साल की उम्र में उन्हें दिल का दौरा पड़ा. 23 सिंतबर 1958 का वो साल था. उस दौरे को तो फिरोज झेल गए. दो साल बाद फिर उन्हें ऐसा झटका लगा कि 48 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह गए.

फिरोज गांधी के दोस्तों ने बहुत कोशिश की कि वो हताशा से उबरें. दिल का दौरा पड़ने के बाद सिगरेट छोड़ दें. वो सबकी सलाह को मजाक में उड़ा देते थे. एक बार लखनऊ कॉफी हाउस में उस समय के युवा नेता चंद्रशेखर (जो बाद में पीएम बने) से कुछ लोगों ने वहां मौजूद फिरोज गांधी का परिचय कराया. उसी समय फिरोज गांधी को लगातार सिगरेट पीते देख उनके एक परिचित ने उनकी खराब सेहत का हवाला देकर टोका तो फिरोज गांधी ने कहा- “जिंदगी में जीने के लिए रखा क्या है? जिंदगी तो वैसे भी अस्थाई है. मेरे पास करने के लिए कुछ खास बचा भी नहीं है. तो जितने दिन भी हैं, मुझे अपने हिसाब से जीना है“.

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फिरोज का ये कहना उस वक्त चंन्द्रशेखर समेत वहां मौजूद सबको चौंका गया था. चंन्द्रशेखर ने फिरोज गांधी के इस बयान का जिक्र फिरोज गांधी पर किताब लिखने वाले विदेशी लेखक BERTIL FALK से किया था. मैं इन दिनों यही किताब पढ़ रहा हूं. हाल के वर्षों में फिरोज पर लिखी गई सबसे दिलचस्प किताब है. पिछले साल ही छपी है लेकिन इसके BERTIL FALK लेखक कई दशकों भारत आते रहे हैं. इंदिरा गांधी के जमाने में भी . बतौर पीएम और बतौर नेता विपक्ष उन्होंने इंदिरा गांधी से लंबी बात भी की थी. फिरोज गांधी की जिंदगी के कई दिलचस्प पहलुओं को उभारती इस किताब से कुछ और जानकारियां जल्द ही शेयर करुंगा

आखिर क्या वजह थी कि फिरोज गांधी इंदिरा गांधी से अलग हुए? दोनों के रिश्तों में क्यों गांठ पड़ी? प्यार में दरार कैसे पड़ी? फिरोज अपने ही ससुर और पीएम नेहरु की सरकार के खिलाफ भी संसद में मुखर होने से क्यों नहीं चूकते थे? सांसद होकर भी क्यों इतने हताश रहते थे फिरोज गांधी?

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इंदिरा गांधी से अलग क्यों रहने लगे फिरोज गांधी? नेहरु के दामाद होकर भी दामाद कहने से क्यों चिढ़ जाते थे फिरोज गांधी? संजय और राजीव से कैसे थे फिरोज के रिश्ते? क्या फिरोज गांधी की मौत एकाकीपन और लापरवाही से हुई? आजादी के बाद के राजनीतिक इतिहास में कई दिलचस्प किरदार हैं. फिरोज गांधी भी उनमें से एक हैं. कल इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि है. इंदिरा के जन्मदिन और पुण्यतिथि पर उनकी बातें तो दशकों से हो रही है. इस बार कुछ बातें फिरोज गांधी के बारे में.