'आप' की 'उधार' की बुराइयां!

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| जनवरी 6 , 2018 , 17:38 IST

नारायण दास गुप्ता और सुशील गुप्ता। आम आदमी पार्टी के सौजन्य से ये गुप्ता द्वय देश के उच्च सदन में सुशोभित होंगे। दोनों ने 'चुपके-से' (संजय सिंह जुलूस के साथ गए थे) नामांकन भी भर दिया है। नियमों की कहीं कोई अनदेखी नहीं है। एक पार्टी को हक है कि वह जिसे चाहे, अपने विधायकों का वोट दिलवाए और राज्यसभा में भेजे। आम आदमी पार्टी ने यही किया है। बाकी पार्टियां यही सबकुछ हमेशा करती रही हैं। आम आदमी पार्टी ने भी किया है। लेकिन इसी के बाद एक सवाल है कि 'आप' ने कहा क्या था?

इसके लिए एक बार आम आदमी पार्टी के संविधान पर गौर करें। 'आप' का संविधान कहता है कि- "पार्टी किसी विशेष विचारधारा द्वारा निर्देशित नहीं है। हमने व्यवस्था बदलने के लिए राजनीति में एंट्री ली है। हम आम आदमी हैं। अगर वामपंथी विचारधारा में हमारे समाधान मिल जाएं तो हम वहां से विचार उधार में ले लेंगे और अगर दक्षिणपंथी विचारधारा में हमारे समाधान मिल जाएं, तो हम वहां से भी विचार उधार लेने में खुश हैं।" लेकिन 26 नवंबर 2012 में वजूद में आने से अब तक केजरीवाल की पार्टी ने 'उधार' लेने की आदत का विस्तार कहां तक कर लिया ये गौर करने लायक है।

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ये समझने के लिए सबसे पहले पार्टी के उस विरोधाभास पर नजर डालते हैं, जो पिछले कुछ दिनों में नजर आया। राज्यसभा उम्मीदवार तय करने के लिए PAC की बैठक के बाद मनीष सिसोदिया का दावा आया कि पार्टी के अंदर बात कर सबकी सहमति से फैसला लिया गया। लेकिन तब सवाल ये है कि अगर फैसला बुधवार को PAC की बैठक में ही हुआ, तो तीन दिन पहले से एनडी गुप्ता और सुशील गुप्ता का नाम कैसे तय माना जा रहा था? साफ है कि तय बाहर ही हो गया था। अंदर मुहर लगवाई गई। वैसे ही, जैसे देश की बाकी पार्टियों में फैसले होते हैं। शायद केजरीवाल की पार्टी ने यहां एक और गलत परंपरा को दूसरी पार्टियों से 'उधार' में ले लिया।

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एनडी गुप्ता और सुशील गुप्ता कौन हैं? एनडी गुप्ता पेशे से चार्टेड अकाउंटेंट हैं। इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टेड अकाउंटेंस्ट्स ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष भी हैं। अमेरिकन एक्सप्रेस बैंक के साथ भी काम कर चुके हैं। संसदीय समिति का भी अनुभव है। आम आदमी पार्टी ने अपने दूसरे सुशील गुप्ता का परिचय देते हुए कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में इनके काम महान हैं। इन्होंने 15 हजार बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था कर रखी है। लेकिन ये नहीं बताया कि कहां और कैसे? ये भी नहीं बताया कि इन्हीं सुशील गुप्ता ने केजरीवाल से जनता के 854 करोड़ रुपये का हिसाब भी मांगा था। वो भी इसी दिल्ली की सड़कों पर होर्डिंग लगाकर। ऐसे में 2013 में कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ने और हारने वाले सुशील गुप्ता की असल खासियत क्या है, ये सवाल भी पूछे जाने लगे और ये भी कि 'आप'ने 'उधार' में दूसरी पार्टियों से क्या-क्या नहीं लिया?

आम आदमी पार्टी के को-फाउंडर कुमार विश्वास दुखी हैं। दुखड़ा रो रहे हैं कि सखा केजरीवाल ने उनके साथ कितना बड़ा जुल्म किया है! ये भी बता रहे हैं कि अब तो आम आदमी पार्टी यानी केजरीवाल और केजरीवाल यानी आम आदमी पार्टी। विश्वास के पास मुद्दों की फेहरिस्त है, जिनपर उनके और केजरीवाल के बीच अविश्वास रहा। और दावा है कि अविश्वास के उसी घुन ने उनके रिश्तों की बुनियाद कमजोर कर दी। विश्वास को अब केजरीवाल की धमकियां भी याद आ रही हैं। कि कैसे उन्हें कहा गया था कि मारेंगे भी और शहीद भी नहीं होने देंगे। ये बातें विश्वास ने राज्यसभा के टिकट की घोषणा होने तक दिल में दबाए रखीं। बात जुबां पर तभी आई, जब पार्टी ने एनडी और सुशील नाम के गुप्ता द्वय के नाम का ऐलान कर दिया। दिल्ली सरकार के खिलाफ साजिश रचने के आरोपी कुमार को अब कडप्पा, माहिष्मती से लेकर किम जोंग याद आ रहे हैं। केजरीवाल की पार्टी के अंदर का ये सब ड्रामा भी 'उधार' का वही शगल दिखता है, जो बाकी पार्टियों में अब तक हम बार-बार देखते आए हैं।

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तमाम दूसरी पार्टियों पर आरोप लगते रहे हैं कि वो 'दूसरे प्रभावों' की वजह से राज्यसभा टिकट बांटती रही हैं। ऊपरी सदन में पहुंचने के लिए पैसों का खेल कई बार उजागर भी हुआ। ये कहना ठीक नहीं होगा कि केजरीवाल ने ऐसा ही कुछ किया है। लेकिन ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि आम आदमी पार्टी चीफ ने विरोधियों को ये आरोप लगाने का मौका जरूर दिया है। यानी 'आप' भी अपने जन्म के छठे साल में उन्हीं आरोपों से घिरी है, जो रोग दूसरी पार्टियों में वक्त के साथ पनपा। यानी केजरीवाल ने ये एक और बीमारी भी 'उधार' में ले ली।

2011 का वो साल देश के लिए ऐतिहासिक माना गया था। दिल्ली के आंदोलन को देश ऐसे देख रहा था कि जैसे सबकुछ बदलने ही वाला हो। अन्ना एक उम्मीद थे। तो केजरीवाल सरीखे लोग उन उम्मीदों को पंख लगाने वाले योद्धा। दिल्ली में बुराइयों से मुक्त देश की बुनियाद रखी जा रही थी। किरण बेदी, वी के सिंह, संतोष हेगड़े, अंजलि दमानिया, योगेंद्र यादव, आनंद कुमार जैसे चेहरे अलग-अलग रोल में, अलग-अलग समय में देश के भविष्य की शक्ल में देखे जाते रहे। अन्ना रालेगण चले गए। उनके सिपहसलारों ने राजनीति के अलग-अलग ठियों को पकड़ लिया। सीएम से लेकर मंत्री से लेकर उप राज्यपाल तक। जिनके हिस्से कुछ नहीं आया वो या तो मोहभंग के शिकार होकर घर लौट गए या फिर बागी तेवरों के साथ वक्त-बेवक्त 'पुराने अपनों' को चुनौती देते रहे। अपनी खीझ उतारते रहे।

जेपी आंदोलन के तमाम योद्धाओं का हस्र भी देश ने देखा था। अन्ना आंदोलनों के योद्धाओं का भी देख लिया। देश का आंदोलनों से भरोसा टूटा। न केजरीवाल से शिकायत है, न उनके राजनीतिक तौर-तरीकों से। शिकायत है तो बस उस दावे से, जो आम आदमी पार्टी को बनाते समय किए गए थे कि पार्टी अलग होगी। आम आदमी की होगी। आम लोगों की तरह होगी। और इस मायने में दूसरों से अलग होगी। अपने संविधान को फिर से याद कर लीजिए। वैसे आपने ठीक ही कहा था कि जिस विचारधारा में आपको समाधान मिलेगा, उसे उधार में ले लेंगे। देश को पता नहीं था कि दूसरी पार्टियों की बुराइयां 'उधार' लेने में ही 'आप'का 'समाधान' है।