ओपिनियन

दिल्ली का 'दंतेवाड़ा' हो जाना

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| फरवरी 22 , 2018 , 21:42 IST

सोमवार आधी रात को दिल्ली के मुख्यमंत्री आवास में एक ऐसी घटना घटी, जो आजाद भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं हुई। दिल्ली के चीफ सेक्रेटरी की सत्ताधारी पार्टी के विधायकों ने पिटाई की। उन्हें थप्पड़ मारे। मुख्य सचिव का चश्मा जमीन पर गिर गया और इसके साथ लोकतंत्र भी कुछ पायदान नीचे गिरा। इससे पहले भी अफसरों को अगवा करने, बंधक बनाने और परेशान करने की घटनाएं कई बार सामने आती रही हैं। लेकिन किसी मुख्यमंत्री आवास से नहीं। दिल्ली में नहीं। बल्कि नक्सली इलाकों से। कह सकते हैं कि दिल्ली दंतेवाड़ा बन गया। संयोग ये कि दिल्ली बीजेपी के चीफ मनोज तिवारी ने केजरीवाल को ‘शहरी नक्सली’ भी कहा।

लेकिन ये एक पक्ष की रिपोर्ट है। और ये पक्ष चीफ सेक्रेटरी और बीजेपी का है। मंगलवार सुबह बीजेपी के लोगों ने कहा कि मुख्य सचिव को केजरीवाल के लोगों (विधायकों) ने पीटा। दोपहर बाद आप के कुछ विधायकों ने कहा कि उन्हें बीजेपी समर्थकों ने सचिवालय में पीटा। इसी बीच आप के विधायकों ने ये भी कहा कि मेरी जाति का नाम लेकर गालियां दी गईं। ये गालियां दिल्ली के चीफ सेक्रेटरी अंशु प्रकाश ने दीं।

अब तीन स्थितियां बनती हैं।

1- तीनों घटनाएं सही हो सकती हैं।

2- तीनों ही झूठी हो सकती हैं।

3- इनमें कुछ सच के साथ कुछ झूठ की मिलावट हो सकती है।

सबसे प्रबल आसार तीसरी स्थिति के हैं। क्योंकि राजनीति का चरित्र इसी तीसरे विकल्प को मानने के लिए विवश कर रहा है। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि जो कुछ हुआ अगर उन सबको एक साथ सच मान लिया जाए, तो सबसे ज्यादा नुकसान किसका हुआ है? चीफ सेक्रेटरी का? आम आदमी पार्टी के विधायकों का? केजरीवाल का? या बीजेपी का?

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पहले से ही दो सरकारों के बीच पिसती दिल्ली के अफसरों ने अगर काम बंद कर दिया, तो किसका काम बंद हुआ? किसे नुकसान हुआ? आरोपी विधायक अमानतुल्लाह ने तो सरेंडर के लिए जाते हुए भी अपने जलवे दिखाकर राजनीति कर ली। बीजेपी ने केजरीवाल को ‘शहरी नक्सली’ और ‘उग्रवादी’ बताकर राजनीति कर ली। आम आदमी पार्टी ने बीजेपी वालों को ‘गुंडों की पार्टी’ बताकर राजनीति कर ली।

घटना के बाद देश के गृहमंत्री का पहला बयान आया कि जो कुछ चीफ सेक्रेटरी के साथ हुआ उसका उन्हें बहुत दुख है। अगले दिन जांच और मेडिकल रिपोर्ट के नतीजे भी इसी लाइन पर आए। इस लिहाज से बुधवार को आई रिपोर्ट पर शक की वजह बनती दिखी। लेकिन गुरुवार को यानी 3 दिन बाद केजरीवाल के सलाहकार वी के जैन ने कहा- “मैं 11.30 बजे अपने घर महारानी बाग से निकला। मीटिंग रूम में पहले से सीएम और डिप्टी सीएम थे। अमानतुल्लाह और प्रकाश जारवाल ने चीफ सेक्रेटरी को बीच में बैठाया। मैं बाथरूम गया था। आया तो देखा कि मुख्य सचिव के साथ हाथापाई की गई थी। सीएस साहब अपना चश्मा ढूंढ रहे थे।”

केजरीवाल और उनके साथी इसके बाद वी के जैन के दबाव में होने की बात कहने लगे। लेकिन एक साथ कितनी और कितनों की बातों को आप झुठलाया सकते हैं? अगर यही काम केजरीवाल के लोगों ने 3-4 साल पहले किया होता, तो ब्यूरोक्रेसी और राजनेताओं से झल्लाया और उनमें (केजरीवाल में) उम्मीदें देख रहा देश शायद उनके साथ खड़ा भी दिखता। लेकिन अब केजरीवाल भी कहीं-न-कहीं उसी जमात में हैं, जिनके कहे की विश्वसनीयता सौ बार परखने की चीज होती है। और दिल्ली वालों ने नगर निगम चुनावों में केजरीवाल को ये मैसेज दे भी दिया है।

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बहरहाल, अगर मान लिया जाए कि आरोपों के मुताबिक ही घटनाएं घटी हैं। और सारे पक्ष अपनी-अपनी जगह पूरी तरह सही हैं, तो इनका दंड दिल्ली और देश के लोकतंत्र को क्यों?  क्योंकि अगर चीफ सेक्रेटरी की पिटाई हुई है, तो भी पिटा लोकतंत्र ही है। चीफ सेक्रेटरी ने अगर जातियों का नाम लेकर विधायकों को गालियां दीं, तो भी लोकतंत्र पिटा है। अगर चीफ सेक्रेटरी पर आम आदमी पार्टी के विधायकों ने मनगढ़ंत आरोप लगाए हैं, तो भी लोकतंत्र पर से ही भरोसा घटने वाली बात है। और अगर दिल्ली सचिवालय में मंत्री इमरान हुसैन और आशीष खेतान की पिटाई हुई है, तो भी पिटा लोकतंत्र ही है। और हां, याद IAS अफसरों को भी रखना होगा कि वे जनता की सैलरी पर काम करते हैं। सरकारों के झगड़े में फैसला कर लिया कि वो जनता के काम नहीं करेंगे। इस फैसले से लोक और लोकतंत्र एक बार फिर पिटा। माफ कीजिएगा। राजनेताओं के हाथों अफसरों की जलालत का लंबा इतिहास है। कई बार तो अफसरों को हंसते-हंसते ये जलालत स्वीकार्य भी रही है। अब अचानक जमीर जागा है, तो कुछ सवाल तो उठेंगे ही।

दिल्ली न आम आदमी पार्टी की है, न बीजेपी की और न ही कांग्रेस की। दिल्ली, दिल्ली वालों की है। लेकिन राजतनीतिक पार्टियां अगर दिल्ली को अपनी जागीर बनाने की कोशिश करती हैं, तो लोकतंत्र की ये एक और नाकामी है। केजरीवाल सरकार की अपनी अच्छाइयां या बुराइयां हो सकती हैं। 2020 में जनता फैसला करेगी। लेकिन अगर बार-बार दिल्ली सरकार को अस्थिर करने की कोशिश होती है, तो ये लोकतंत्र के अपमान के साथ लोकतंत्र की हार भी है।

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लेकिन खुद के तौर-तरीकों पर गौर आप को भी करना है। सही है कि केजरीवाल को दिल्ली वालों ने लुटाकर वोट दिए। लेकिन अगर इसके बाद केजरीवाल या उनके लोग खुद को सिस्टम से ऊपर मान बैठें, तो वो उसी लोकतंत्र की जड़ में मट्ठा डाल रहे हैं, जिसकी साख पकड़कर उन्होंने दिल्ली का सत्ता शीर्ष हासिल किया। दंतेवाड़ा के नियम दिल्ली में नहीं चल सकते। दिल्ली की जिम्मेदारी ‘दंतेवाड़ा के कानून’ को खत्म करने की है। दिल्ली को दंतेवाड़ा बनाया तो फिर सबसे पहले ‘आपकी’ जरूरत पर ही सवाल उठेंगे।

कमाल है। दिल्ली की राजनीति के तीनों खेमे सड़कों पर हैं। सब अपने-अपने लिए न्याय मांग रहे हैं। चीफ सेक्रेटरी के साथ क्या हुआ और क्या नहीं, इस पर बहस चल रही है। लेकिन उस रात CM और CS की मीटिंग का एजेंडा सिरे से गुम हो गया है। एजेंडा था कि दिल्ली के करीब 2 लाख जरूरतमंदों को समय पर राशन कैसे मिले? याद रहे जरूरतमंदों की जरूरतें नजरअंदाज होने से ही ‘दंतेवाड़ा’ बनने की आशंका पैदा होती है।

ध्यान रहे : ‘दंतेवाड़ा’ का इस्तेमाल सिर्फ नक्सल इलाके के प्रतीक के रूप में किया गया है। हमारा इरादा दंतेवाड़ा पर सवाल उठाने का नहीं है। हम दंतेवाड़ा का उतना ही सम्मान करते हैं, जितना कि देश के किसी भी अन्य हिस्से का।


Pankaj Pushkar

संतुलित विश्लेषण। लेकिन दन्तेवाड़ा शिकायत कर रहा है कि उसे जीवित यथार्थ से एक रूपक में बदल दिया गया है। काश, दन्देवाड़ा की हालत केवल उतनी ही खराब होती जितनी दिल्ली की हो गई है।