एक दिन...नारी के नाम !

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| मार्च 8 , 2018 , 20:44 IST

महिला दिवस। महिलाओं के अचीवमेंट के चर्चे हुए। महिलाओं की त्रासदियों का लेखा-जोखा निकाला और पेश किया गया। महिलाओं का कुछ अचीव कर लेना बड़ी खबर बनी। तमाम ऐसी महिलाओं के किस्से और कहानियां बताई गईं। अखबारों से लेकर टीवी चैनल्स पर। क्यों? क्या इसलिए कि महिलाओं का कुछ अचीव करना उतना सामान्य नहीं है, जितना कि पुरुषों का है? अगर सोच ये है, तो इस सोच पर सवाल क्यों नहीं है? महिलाओं की समस्याओं की भी चर्चा अलग से होती है। कोई दिक्कत नहीं है। महिलाओं के लिए योजनाएं अलग से बनती हैं। अच्छी बात है। लेकिन ऐसा करते हुए महिलाओं को अबला और दया की पात्र बना देना, उन्हें कमजोर समझकर ‘एक्स्ट्रा केयर’ की हकदार कह देना? ऐसा कर अगर हम महिलाओं को हथियार डालने के लिए प्रेरित करते हैं, तो आपत्ति है। क्योंकि इसके बाद एक भाव आता है कि- “मैं तो लड़की हूं।” और इन्हीं चार शब्दों से बना ये जो एक वाक्य है वो आधी आबादी को खुद की नजरों में हताश करता है और समाज का नजरिया भी नहीं बदलने देता।

बहरहाल, इस एक दिन के लिए सोशल मीडिया का मिजाज अचानक बदल गया है। महिलाओं के त्याग की बातें होती रहीं। उनकी कुर्बानियां याद की जाती रहीं। मुश्किल हालात में परिवार के लिए किए उनके काम याद आने लगे। लेकिन बाकी रह गया कि अगर मां का दर्जा सबसे ऊपर और ममता की मूर्ति के रूप में है और बहन की छवि परिवार के सबसे केयरिंग इंसान की है, तो इसी सोशल मीडिया पर वही बहन और मां पत्नी की शक्ल में विलेन और क्रूरता की प्रतीक क्यों बनाई जा रही है? इसका जवाब कोई नहीं देगा क्योंकि महिलाओं के खिलाफ इस ‘अघोषित षड्यंत्र’ में बाजार से लेकर समाज का प्रभावशाली हिस्सा भी शामिल है।

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देश में ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान चल रहा है। बड़ी अच्छी बात है। लेकिन 14 से 18 साल की 32% बेटियां अगर अब भी बीच में ही स्कूल छोड़ दे रही हैं, तो नीतियों पर गंभीर सवाल हैं। अगर इस वक्त चल रही अलग-अलग बोर्ड्स की दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं में करीब 55 से 60 प्रतिशत लड़के और 40 से 45 प्रतिशत ही लड़कियां शामिल हो रही हैं, तो सवाल जरूर है। अगर एक समान काम के लिए महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले 20 प्रतिशत तक कम वेतन मिलता है, तो सवाल गंभीर है। ऐसे उदाहरणों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि पूरी किताब लिख जाए।

महिला दिवस की पूर्व संध्या पर दुनिया के सबसे धनी क्रिकेट बोर्ड बीसीसीआई ने खिलाड़ियों (महिला और पुरुष) की कॉन्ट्रैक्ट लिस्ट जारी की। पुरुषों के वर्ग में टॉप ग्रेड वाले खिलाड़ियों को 7 करोड़ सालाना मिलेंगे। जबकि महिलाओं में टॉप ग्रेड की खिलाड़ियों को सिर्फ 50 लाख रुपये सालाना। ये वही बीसीसीआई है जिनकी खामियों में डूबी व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट ने करीब दो साल पहले पटरी पर लाने की कोशिश की थी। सही है कि महिला क्रिकेट से बीसीसीआई उतने पैसे जेनरेट नहीं कर पाता, जितना कि पुरुष टीम से होता है। लेकिन अगर बाजार का सिद्धांत और अर्थशास्त्र बेटियों का मनोबल तोड़े, तो लानत है ऐसी व्यवस्था पर। वैसे भी याद रहे- बीसीसीआई के खजाने में अकूत दौलत जमा है।

पिछले दिनों सरकार मुस्लिम महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए बड़ी सक्रिय थी। बड़ी अच्छी बात है अगर तीन तलाक से उन्हें मुक्ति मिल जाए। लेकिन तलाक न देते हुए भी अगर देश में 33 प्रतिशत यानी हर तीसरी महिला सेक्सुअल या फिर शारीरिक हिंसा की शिकार होती है, तो अब तक की सभी सरकारों, देश के पूरे सिस्टम के साथ-साथ पूरे समाज पर गंभीर सवाल है।

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सरकार और समाज तो फिर भी ‘बाहर वाले’ हैं। घर में ही स्थिति कितनी बदली है? बेटी को लेकर क्यों ये अहसास है कि उस पर जो कुछ निवेश किया जाएगा वो दूसरे परिवार के लिए है? थ्योरी दी जाती है- बेटी का केयर नहीं करोगे, तो केयरिंग बहू कहां से लाओगे? लेकिन थ्योरी और सिद्धांत अपनी जगह रहते हैं। प्रैक्टिकल सोच कितनी बदली है, हम सबको पता है। एक कानून है। बेटी को पिता की संपत्ति में बराबरी का हक। आदेश सुप्रीम कोर्ट का है। न बेटी मांगती है, न पिता देता है। और तो और, मां के एजेंडे में भी बेटे ही होते हैं। ध्यान रहे। यहां बात समाज के बड़े वर्ग की हो रही है। बेटे-बेटियों में समानता रखने वालों से माफी। और उन्हें सैल्यूट भी। महिला दिवस मनाने वाला समाज न दहेज की बुराई को दूर कर सका और न ही बेटी की हिस्सेदारी को सुनिश्चित कर सका।

उलाहना कह लें या महिला अधिकारों के प्रति खुद को जागरूक दिखाने की ललक। एक जुमला अकसर दोहराया जाता है। चूल्हा-चाकी और बच्चे ही करोगी या जिंदगी में कुछ और भी करने का इरादा है? ऐसा कहकर घर के अपने ही काम को निम्न दर्जा क्यों दिया जाता है? घर से बाहर निकलकर जॉब करने वाले कितने प्रतिशत पुरुष देश और समाज के काम आ रहे हैं? अगर आप अपने परिवार को अच्छे से चलाने के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने का जरिया बनते हैं, तो ये अच्छी बात है। लेकिन तब सवाल ये भी है कि अगर आप इससे आगे देश और समाज के लिए कुछ कंट्रीब्यूट नहीं कर रहे हैं, तो फिर आपका काम और अर्थ अर्जन, एक महिला के घर को संभालने से ज्यादा बड़ा अचीवमेंट कैसे हो सकता है?

एक पुरानी कहावत है- “बेटा पढ़ता है, तो एक इंसान पढ़ता है। बेटी पढ़ती है, तो पूरा परिवार शिक्षित होता है।” पुरखों ने ये बातें क्यों कहीं? इसीलिए न कि शिक्षित बेटी अगली पीढ़ी का मार्गदर्शन करेगी ! उनमें भी संस्कार भरेगी। लेकिन जब एक मां बनकर वो अपनी ये ड्यूटी पूरी करने लगती है, तो उसे ‘हाउस वाइफ’ कहते हैं। और इस देश में ‘हाउस वाइफ’ होने को मजबूरी का दर्जा मिलता है। जबकि कमाऊ पिता समाज में थोथी महानता का लबादा ओढ़े रहता है।

ऐसी सोच वाले समाज में महिलाओं के लिए ‘एक दिन’ ही आएगा। उसका नाम होगा ‘महिला दिवस’। उसकी तारीख होगी 8 मार्च। कई कार्यक्रम होंगे। काफी सारी घोषणाएं भी होंगी। कार्यक्रम आयोजित करने वालों और घोषणाएं करने वालों को धन्यवाद और सफलता के लिए शुभकामनाएं। लेकिन इसी के साथ कुछ आखिरी सवाल भी। महिला दिवस ही क्यों? महिलाओं का पूरा साल और वक्त क्यों नहीं? महिलाओं के लिए कुछ भी अलग से क्यों? क्योंकि वो कमजोर हैं? उनके काम कमतर हैं? नहीं। उनके काम कई मायनों में पुरुषों से अव्वल, अहम और श्रेष्ठ हैं। समाज की स्वीकार्यता और वाहवाही मिले, तो काम आसान हो जाता है। घर की चारदीवारी के अंदर बगैर कुछ कहे और अपने लिए बगैर कुछ मांगे अपनी जिम्दारियां निभाते जाना महान काम है। इंतजार उस 8 मार्च का है, जिस दिन हम महिला दिवस नहीं मना रहे होंगे।