ओपिनियन

उन्नाव और कठुआ के अनर्थ

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| अप्रैल 13 , 2018 , 20:13 IST

जिनसे उम्मीद थी वही आरोपियों के साथ खड़े हो गए और समाज भी बंट गया

उन्नाव और कठुआ। देश के दो अलग-अलग हिस्सों के दो बिल्कुल छोटे-छोटे-से इलाके। लेकिन इन दो इलाकों ने देश को नींद से झकझोर कर जगा दिया है। सिर्फ इसलिए नहीं कि दोनों ही जगह बेटियों पर जुल्म की इंतेहा हुई है, बल्कि उससे भी ज्यादा इसलिए कि आरोपियों के बचाव में वो लोग पुरजोर तरीके से खड़े हो गए, जिन पर या तो दोषियों को सजा दिलाने की जिम्मेदारी थी या कम-से-कम उनके खिलाफ खड़े होने की। देश के जेहन में एक ही सवाल है कि फिर इसके बाद उम्मीद किससे करें? कहां जाएं? शुक्र है- लंबे इंतजार के बाद शुक्रवार की शाम प्रधानमंत्री का भरोसा आया कि- “हर बेटी को न्याय मिलेगा और हर अपराधी को सजा मिलेगी।”

गुस्सा निकालने का सेफ्टी वॉल्व : इंडिया गेट

राहुल गांधी ने  दिल्ली वालों को उन्नाव और कठुआ की बेटी के लिए इंडिया गेट पर बुला लिया। लोग हजारों की संख्या में आधी रात को पहुंच भी गए। क्यों ? क्योंकि उनका दिल उन्हें सोने नहीं दे रहा था। कभी उन्नाव को याद कर कभी कठुआ की बेटी के बारे में सोचकर। हर घर को डर है कि उन्नाव या कठुआ जैसी दस्तक कल उसके चौखट पर भी तो कोई नहीं दे देगा? ये हजारों लोग शायद सिर्फ राहुल गांधी का समर्थन करने नहीं आए थे। समाज और सिस्टम को आधी रात को जगाने आए थे। अपनी बेचैनी बाहर छोड़ने आए थे।

सब एक-दूसरे से असहमत-से क्यों हैं?

कठुआ की बेटी 8 साल की थी। उससे रेप होता रहा। आखिरकार उसकी हत्या कर दी गई। वारदात और उसके बाद की गई लीपापोती के दाग तमाम सफेदपोशों पर हैं। रक्षा राज्यमंत्री वी के सिंह कहते हैं- “इंसान होने पर शर्म आती है। इससे तो बेहतर जानवर ही हैं।” फिर भी राजनीति से लेकर आम लोगों का एक हिस्सा तक एक-दूसरे से असहमत है। न्याय की मंजिल के सबसे बड़े सारथी- वकील तक आरोपियों के साथ खड़े हो गए। समाज की घटनाएं राजनीति से प्रभावित हो रही हैं। हमारे विचारों पर राजनीति की लेप चढ़ी हुई बिल्कुल साफ दिखती है। राजनीति बुरी नहीं है। लेकिन हर बात पर असहमति वाली राजनीति त्रासद है।

अब मत रोना मीडिया और न्यायपालिका की सक्रियता का रोना

बार-बार आरोप लगते हैं। खूब लगते हैं। कि मीडिया ट्रायल हो रहा है। ज्यूडिशियल एक्टिविज्म है। अब और कोई ऐसे आरोप न लगाए। आरोप लगाने की इच्छा हो, तो ये चंद सवाल खुद से कर ले। क्या मीडिया 24X7 उन्नाव के पीछे नहीं पड़ता तो सेंगर का बाल भी बांका होता? गुरुवार की शाम इलाहाबाद हाईकोर्ट ये नहीं पूछता कि बताओ सेंगर को कब गिरफ्तार करोगे, तो शुक्रवार अल सुबह आरोपी को डिटेन किया जाता?

तथ्य फिर भी जिंदा रहेंगे

उन्नाव के विधायक कुलदीप सेंगर कल को बाइज्जत बरी हो सकते हैं। वो वाकई बेगुनाह हो सकते हैं या अदालत में सबूत कम पड़ सकते हैं। फिर उनके पक्ष में खड़ी जमात कह सकती है कि देख लिया न ! इतनी हाय-तौबा से क्या निकला? हम तो कह ही रहे थे कि सेंगर को फंसाया जा रहा है। सेंगर तो फिर भी बच जाएंगे। लेकिन सिस्टम पर पुती कालिख साफ नहीं होगी। सबूत नाकाफी हो सकते हैं। अदालतों की मजबूरी हो सकती है। लेकिन सच बयां करने के लिए मौजूद तथ्य न अब मजबूर या नाकाफी हैं और न तब रहेंगे। तब भी ये तथ्य जिंदा रहेगा कि एक शख्स की पिटाई के बाद मौत हुई है। तब भी ये तथ्य जिंदा रहेगा कि मुख्य आरोपी को अंतिम दम तक बचाने की कोशिश हुई। तब भी ये तथ्य जिंदा रहेगा कि शाम के वक्त अदालत में सरकार कहती है कि आरोपी के खिलाफ कोई गिरफ्तारी लायक सबूत नहीं है और रात में देश की सर्वोच्च एजेंसी सेंगर को डिटेन कर लेती है।

ये हैं कौन कुलदीप सेंगर साहब?

वही जिनपर एक लड़की के साथ गैंगरेप का आरोप है? वही जिनकी उन्नाव के एक इलाके में तूती बोलती है? जिनके खिलाफ कोई गवाह नहीं खड़ा हो सकता? जिन पर अपने ही इलाके की एक लड़की रेप का आरोप लगाती है, उसके पिता की पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है ! फिर भी कुलदीप सेंगर नाम के आरोपी के खिलाफ कोई एक लफ्ज नहीं निकालता ! उल्टे समाज सवाल लड़की के चरित्र पर करता है। कैमरे पर आकर लड़की के लिए न ऐसे बयान देने वाले की विश्वसनीयता पर समाज सवाल करता है। न ही राष्ट्रीय मीडिया में इन्हें जगह देने वालों पर सवाल उठते हैं। 

उन्नाव वाली लड़की !

ये लड़की थी ही ऐसी ! किसी के साथ भाग गई थी ! ऐसी बातों (इसे न लांछन कहना चाहिए और न आरोप, क्योंकि इन दो शब्दों में किए गए कृत्य पर उपहास या उसमें कुछ गलत होने का बोध होता है) को साबित करने के लिए किसी के पास कुछ भी नहीं है। सिर्फ गाल बजाने के अलावा। चलो। मान लेते हैं। हां, भाग गई थी। तो? उसके भी तो अपने फैसले हो सकते हैं। वाह! एक ही वाकये को ये सभ्य समाज कभी प्यार तो कभी भाग जाना कहता है। सहूलियत के हिसाब से परिभाषाएं बदलने वाले हमारे समाज पर बड़ा सवाल है।

सेंगर के साथ दिखने के फायदे !

कुलदीप सेंगर। लोकतंत्र के मंदिर के जनप्रतिनिधि हैं? पीड़ित लड़की के चाचा और कुलदीप सेंगर के बीच बातचीत का एक ऑडियो मीडिया में है। इसमें लड़की का चाचा विधायक सेंगर से कहता है कि हम आपके लिए हमेशा एक पैर पर खड़े रहे। आपने जो भी सही-गलत कहा हमने वो किया। सवाल इस परिवार से (पीड़ित पक्ष) भी है। आप क्यों कुलदीप सेंगर को समर्पित हो गए? सही है कि एक जनप्रतिनिधि के पास कई सारे काम होते हैं। इनके लिए उसे तमाम लोगों को साथ जोड़ने की जरूरत भी पड़ती है। लेकिन ऐसी अंधभक्ति भी क्यों कि हम विधायक के सही के साथ उसके गलत में भी शरीक हो जाएं? हम क्यों नहीं सोचते कि जो गलत वो दूसरों के साथ कई बार कर रहा है, वैसा ही या कोई और गलत वो मेरे साथ भी कर सकता है?

राजनीति का ठेका सिद्धांत

राजनीति को जनसेवा के लिए समर्पित होना था। राजनीति और राजनेता स्वयंसिद्धि के लिए एक-दूसरे को समर्पित हो गए। जो जितने वोट दिलाए उतना वो कानून से ऊपर। वोट दिलाने के मामले में भी खुली छूट। अपनी लोकप्रियता से दिला दे। या फिर अपनी दबंगई से। गांव-कसबों में वोट के उठने वाले इस ठेके के ठेकेदारों ने अपनी अलग दुनिया बसा ली। लखनऊ से एक सत्ता चलती है, तो उन्नाव की छोटी सत्ता सेंगरों की सरपरस्ती में। दोनों एक-दूसरे की ऐसी जरूरत बन गए कि कानून की कोई जरूरत ही नहीं रह गई। राजनीति के इस ठेका प्रथा से यूपी ही नहीं, देश के तमाम राज्य संक्रमित हैं। कम या ज्यादा।

नौकरशाही की बेबसी और बेचारगी

कहते हैं कि आईएएस और आईपीएस देश चलाता है। सच भी है। लेकिन सेवा ज्वाइन करते हुए और जीवन के 50वें 55वें साल को पार करते हुए उसके अनुभवों और चेहरे की भाव-भंगिमा में आए फर्क को आप महसूस कर सकते हैं। आईएएस या आईपीएस अकादमियों से निकलते वक्त उसका दमकता चेहरा भरोसे की गारंटी देता हुआ दिखता है कि ये बंदा देश के लिए कुछ जरूर करेगा। प्रधान गृह सचिव और डीजीपी साहब रेप के आरोपी के लिए कहते हैं - माननीय विधायक जी। और ऐसा कहते हुए उनके चेहरे के पीछे से राजनीतिक दबाव के आगे मिली हार का अहसास साफ-साफ झांक रहा होता है।

राजनीति नियंत्रित पुलिस

देश चलाने का पूरा कानून किताबों में लिखा है। पुलिस और प्रशासन को इसकी पूरी जानकारी भी होती है। उन्हें अपनी तरफ से कुछ नहीं करना होता है। बस बने-बनाए कानून को लागू करना होता है। लेकिन अपनी पुलिस की आस्था कानून की किताबों में कम ही होती है। हर पांच साल बाद पुलिस को ‘अपनी पार्टी’ बदलनी होती है। कई बार मजबूरी में, तो कई बार श्रद्धा भाव के साथ। फिर इसी के नतीजे में दिखता है उन्नाव और कठुआ का कानून। जहां भय सिर्फ सत्ता का रह जाता है, कानून का नहीं।

उन्नाव और कठुआ का मनोविज्ञान समझिए

क्राइम करने वालों की तीन संभावित बेसिक साइकोलॉजी बताई गई है। एक वो क्राइम करने वाले जो आदतन अपराधी होते हैं। दूसरे वो जो आदतन तो अपराधी नहीं होते, लेकिन अपराध करने का जोखिम ये सोचकर उठाते हैं कि बच जाएंगे। जबकि अपराधियों की तीसरी कटेगरी उनकी है, जो समाज में ताकतवर होते हैं। यही तीसरी कटेगरी उन्नाव में नजर आ रही है और कठुआ में भी।

हम समाज के ‘सभ्य’ लोग

अब तक की सोच और सिद्धांत कहता है कि शुद्धिकरण ऊपर से ही करना होगा। यानी शासन चलाने वाली राजनीति स्वच्छ होगी। फिर राजनेता स्वच्छ होंगे। फिर उनका सिस्टम (पुलिस-प्रशासन) स्वच्छ होगा। फिर समाज में स्वच्छता आएगी। लेकिन वक्त इस सोच को बदलने का भी है। हम सेंगरों से पंगे न लेने की हालत में हो सकते हैं। कठुआ के गुनहगारों के खिलाफ खड़े होने का हमारे पास वक्त नहीं हो सकता है। लेकिन हम इनसे दूरी बनाने की हालत में हमेशा होते हैं।

हम ऐसे लोगों का बायकाट भी कर सकते हैं। ये हमारा अधिकार भी है। और सबल हथियार भी। संभव है कि ऐसा कर हम कुछ क्षणिक फायदों से वंचित रह जाएं। लेकिन कोई भी समझ सकता है कि समाधान इसी में है। सोच बदलकर हम कठुआ और उन्नाव के गुनहगारों को अपने घर के दरवाजे तक पैर पसारने से रोक सकते हैं।