श्रीदेवी पर 'मीडिया मातम'

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| मार्च 1 , 2018 , 13:06 IST

भारतीय मीडिया मातम मना रहा है। श्रीदेवी की मौत का नहीं। श्रीदेवी की मौत पर अपने नैतिक पतन का मातम। ये वही मीडिया है, जो सुविधा के हिसाब से आरोपी को दोषी बता देता है और दोषी को साजिश का शिकार। आज वही मीडिया श्रीदेवी की मौत की कवरेज करते हुए हुई गड़बड़ी पर आत्म मंथन करते हुए आत्म ग्लानि से भरा है। ये वही मीडिया है, जो गद्दार का खिताब बांटता है। किसी को देशद्रोही तो किसी को देशभक्त का तमगा पहना देता है। थोथी देशभक्ति पर गाल बजाते हुए अपने कर्तव्यों से विमुख होकर भी दंभ के साथ कहता है कि सिर्फ हम जो कह रहे हैं वही सही है। ये वही मीडिया है, जो देश के ज्वलंत मुद्दों पर रोज शाम अलग-अलग राय समझने के नाम पर चर्चाएं आयोजित करता है। लेकिन मेहमान अगर राय रखे, तो उसे बेदर्दी से चुप करा देता है। चुप होने से मना करे, तो बदतमीजी करता है। ‘स्मृति लोप’ का शिकार वही मीडिया अगर मंथन कर रहा है, तो जश्न मनाइए।

फ्लैशबैक :

शनिवार की रात दुबई के जुमैरा अमीरात टावर नाम के होटल के उस कमरे में क्या हुआ तब किसी को पता नहीं था। उस कमरे में दो ही लोग थे। बोनी कपूर और श्रीदेवी। बोनी कपूर श्रीदेवी को सरप्राइज देना चाहते थे। श्रीदेवी ने करोड़ों फैंस को सरप्राइज दे दिया। लेकिन इसके बाद सरप्राइज करने की बारी थी भारतीय मीडिया की। समाचार चैनल्स पर रविवार का ‘मॉर्निंग शो’ श्रीदेवी पर फिल्माए गीतों और डायलॉग्स के नाम रहा। लेकिन रविवार को ही खबरों के मैटनी शो में मसाले आने लगे। क्यों और कैसे जैसे सवाल स्क्रीन पर जगह बनाने लगे। इवनिंग और नाइट शो में ऐसे सवाल गंभीर होते गए। ऊंगलियां बोनी कपूर की तरफ थीं। फिर आई सोमवार की सुबह। सीधे कहा तो नहीं गया, लेकिन टीवी मीडिया के बड़े हिस्से का हाथ बोनी की गिरेबान तक पहुंचता हुआ साफ दिख रहा था। पूरा सोमवार और आधा मंगलवार इसी तरह चला।

बाथटब की गहराई माप ली गई। उसमें डूबने की आशंकाएं तलाश ली गईं। श्रीदेवी की मेडिकल हिस्ट्री निकाल ली गई। और इन सारे टोटकों को आजमाते हुए सामान्य बताई जा रही मौत को संदिग्ध की श्रेणी में डाल दिया गया। और संदिग्ध को धीरे से असामान्य बना दिया गया।

ये तो रही वो बातें, जो कुछ भारतीय मीडिया के एक हिस्से ने दुबई पुलिस की जांच रिपोर्ट आने से पहले कीं। मंगलवार दोपहर अचानक रिपोर्ट आई। मौत सामान्य बताई गई। भारतीय मीडिया ने बगैर देर किए सारे कयास वापस ले लिए। उतनी ही जोर-शोर से ये खबर भी दिखाई गई कि शक-शुबहे जैसी कोई बात नहीं। श्रीदेवी की मौत सामान्य मौत थी। तो सवाल है कि क्या मीडिया से बड़ी गलती हो गई? हमने सीमाएं लांघी? हम कयास लगाते हुए उस हद तक चले गए, जहां हमने ये ख्याल भी नहीं रखा कि एक पति पर क्या गुजर रही होगी? उनके परिवार को ऐसी बातें सुनकर कैसा लग रहा होगा?

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मीडिया को बरी करने या दोषी ठहराने से पहले तीन बातों पर गौर करने की जरूरत है-  

पहली : श्रीदेवी की मौत के बाद दुबई पुलिस की कार्रवाई।

दूसरी : श्रीदेवी की मौत के वक्त के हालात।

और...

तीसरी : खुद श्रीदेवी को करीब से जानने वालों के कुछ बयान।

पहले बात दुबई पुलिस की जांच की करें, तो उन्होंने श्रीदेवी के पार्थिव शरीर का पोस्टमार्टम किया। बोनी कपूर से घंटों पूछताछ भी हुई। इनके अलावा तमाम दूसरी जांच चलती रही। इन सबमें करीब ढाई दिन लग गए। सवाल है कि दुबई पुलिस क्या खंगाल रही थी? यही न कि कहीं श्रीदेवी की मौत असामान्य तो नहीं है?  फिर दिक्कत कहां है अगर पुलिस मौत में किसी संभावित ‘असामान्य’ को ढूंढ रही थी, और उसी वक्त भारतीय मीडिया उन्हीं संभावित असामान्य घटनाओं की लिस्ट बना रहा था ! होड़ में कदम आगे जरूर निकले, लेकिन इतने भर को मीडिया का गुनाह कहने के खतरे भी हो सकते हैं।

रही बात मौत के वक्त हालात की, तो होटल के कमरे में दो ही लोग थे। श्रीदेवी और बोनी कपूर। चंद मिनट पहले पूरी तरह स्वस्थ 54 साल की श्रीदेवी बाथरूम में मृत पाई गई। मौत बाथटब में डूबने से हुई। जांच के बाद सबकुछ भले ही साफ हो गया हो, लेकिन जांच से पहले अगर ऐसे हालात पर मीडिया ने कुछ सवाल उठाए, तो ये उसकी जल्दबाजी हो सकती है लेकिन इसके लिए अपराध बोध में डूब जाने की जरूरत भी नहीं लगती। क्योंकि सारे हालात चौंका तो रहे ही थे।

तीसरी चीज, जिसे याद करने की जरूरत है वो है श्रीदेवी को करीब से जानने वालों के कुछ बयान। आंसुओं में डूबे ठाकुर अमर सिंह ने कहा- वो तो शराब को हाथ तक नहीं लगाती थीं। बाथटब में डूबने की थ्योरी नशे की हालत को जोड़कर मजबूत हो रही थी। लेकिन इसे अमर सिंह के बयान ने कमजोर कर दिया। तब मीडिया ने स्वाभाविक सवाल उठाया कि दिल का दौरा भी नहीं पड़ा। मरने वाला इंसान नशे में सुध-बुध खोया हुआ भी नहीं था। तो फिर टब में डूबकर मौत कैसे हुई? हालांकि बाद में दुबई पुलिस की जांच ने मीडिया के इन सारे कयासों को खत्म कर दिया।

एक और बयान रामगोपाल वर्मा का आया। रामू ने कहा कि श्रीदेवी की निजी जिंदगी बाहर से जितनी अच्छी और ग्लैमरस दिखती थी, वैसी बिल्कुल नहीं थी। बल्कि इसके ठीक उलट थी। इसके बाद ही मीडिया ने सवाल उठाया कि क्या श्रीदेवी पारिवारिक वजहों से परेशान थीं? और मीडिया का ये कयास भी उस हद तक गया कि कहीं श्रीदेवी की मौत और उनकी जिंदगी के कथित कष्ट के बीच कोई रिश्ता तो नहीं?

भूलना नहीं होगा कि दुबई पुलिस और प्रशासन की अंतिम रिपोर्ट आने तक शायद ही किसी ने कहा कि भारतीय मीडिया गलत कह और कर रहा है। लेकिन रिपोर्ट आते ही मीडिया के खिलाफ माहौल बन गया। हम अपरिपक्व, तथ्यों कि बिना कन्क्लूजन पर कूदने वाले और गैरजिम्मेदार ठहरा दिए गए। तो क्या मीडिया को श्रीदेवी की मौत की रिपोर्टिंग में पूरी तरह से बेगुनाह मान लिया जाए? शायद नहीं। दरअसल, श्रीदेवी की मौत की रिपोर्टिंग करते हुए गुनाह हुआ हो या नहीं, अपने तमाम दूसरे गुनाहों की वजह से हमने अपने लिए जो स्थिति हासिल कर ली है, उसी का नतीजा है कि बात-बात पर हम पर सवाल उठते हैं। हमारा माखौल बनता है। और उसी ‘विश्वसनीयता ह्रास’ का नतीजा है कि श्रीदेवी की मौत पर दुबई पुलिस ने जैसे ही रिजल्ट आउट किया कुछ लोग इस नतीजे पर पहुंच गए कि भारतीय मीडिया ने हद कर दी। हद तो हम रोज करते हैं। फर्क इतना रहा कि इस बार मामला करोड़ों फैंस की मालकिन श्रीदेवी की मौत का था, इसलिए हमें हद तोड़ते हुए पहले के मुकाबले बहुत ज्यादा लोगों ने देख लिया। और पहले श्रीदेवी की मौत और फिर हमारी रिपोर्टिंग की वजह से करोड़ों दिलों के टूटने पर जो आह निकली, वो हम मीडिया को लग गई।