कोहली जी! पत्रकार ने नहीं, देश ने पूछा था

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| जनवरी 18 , 2018 , 18:46 IST

'आप ही मुझे बता दीजिए कि सर्वश्रेष्ठ प्लेइंग इलेवन क्या होती है? हम उसी इलेवन के साथ खेलने के लिए तैयार हैं"

                                                          विराट कोहली, कप्तान, भारतीय क्रिकेट टीम

प्रिय विराट कोहली जी,

सेंचुरियन की हार के बाद दिलों पर चोट करने वाले इस जवाब के साथ आप जिन मीडियाकर्मियों से मुखातिब थे वो दस, बीस या पचास पत्रकार भर नहीं थे। वे देश के करोड़ों उन लोगों के प्रतिनिधि थे, जिनकी बदौलत आपकी टीम और आप 'विराट' का दर्जा पाते हैं। इस मायने में उनके सवाल देश के सवाल थे। ऐसे में ये सवाल पूछना कि- "क्या आपकी टीम का प्लेइंग इलेवन दुरुस्त था?"- कोई गुस्ताखी नहीं, उनके सवाल पूछने के अधिकारों में शुमार था। आप ये कह सकते थे कि नहीं, टीम कॉम्बिनेशन में कोई चूक नहीं थी। सच ये है कि जब एक खिलाड़ी से रन नहीं बनता है या विकेट नहीं ले पाता है, तो जेहन में (खासतौर से फैंस के) ये सवाल आते ही हैं कि उसकी जगह फलां टीम में होता, तो क्या बेहतर नहीं होता?

लेकिन इसकी जगह आपने वहां मौजूद जरिया मात्र पत्रकारों के हवाले से देश को संदेश दिया कि आप ही आखिरी हैं। सवालों से परे हैं। आप पर सवाल आपको मंजूर नहीं हैं। आपको शायद इस बात का गुस्सा रहा होगा होगा कि जीत के लालची ये पत्रकार (वास्तव में देश) भूल गए कि आपने देश को लगातार 9 सीरीज में जीत दिलाई है और अब ये आपका अर्जित अधिकार है कि आपकी टीम हारे, तो भी कोई उस पर सवाल न उठाए। जबकि गुस्ताख पत्रकारों ने इसकी जुर्रत की। अहसान फरामोसों ने सवाल कर आपके 'विराट क्रिकेटिंग ब्रेन' को चैलेंज किया। दो ही मैच में पूछ बैठे कि ये हार क्यों?

सेंचुरियन में आपके रिकॉर्डधारी बल्लेबाजों से रन बनाते नहीं बने। केपटाउन में आपके शूरमाओं से 208 रनों का टारगेट अचीव नहीं हो पाया था। सेंचुरियन में 287 रन नहीं बन पाए। ये सही है कि हार जीत खेल का हिस्सा है। ऐसे में आपकी शिकायत हो सकती है कि खबरिया चैनल वालों ने जिस तरह से देश पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ने का माहौल बनाया वो ठीक नहीं। ऐसा नहीं है कि सबकुछ लुट गया हो। हम भी मानते हैं कि रनों का उत्पादन कम होने से देश की GDP नहीं गिर गई। लेकिन अगर आप प्रतिभाशाली युवाओं की मौजूदगी में रिटायरमेंट को प्राप्त हो रहे ईशांत और पार्थिव पटेल को रोजगार के मौके उपलब्ध कराएंगे तो सवाल भी पूछे जाएंगे। और अब तो आपने 7 साल से 'आउट ऑफ स्टॉक' हो चुके दिनेश कार्तिक को भी अगले मैच में देश के लिए ड्यूटी पर लगाने का पूरा मौका बना दिया है।

सुनील गावस्कर कहते हैं कि काश आज महेंद्र सिंह धोनी ड्रेसिंग रूम में होते। आप कह सकते हैं कि गुजरे जमाने में जीना इन पुराने लोगों की फितरत होती है। लेकिन कुछ सवाल जरूर रहेंगे। क्या साहा में धोनी का विकल्प बनने की क्षमता है? क्या धोनी की जगह पार्थिव और दिनेश कार्तिक भर सकते हैं? हम नहीं कह रहे कि आपने धोनी को टीम से निकाल दिया। बस ये पूछ रहे हैं कि क्या टीम में ऐसे हालात नहीं बन गए थे कि धोनी पहले कप्तानी छोड़ने और फिर टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेने पर मजबूर हो गए? क्या आपको नहीं पता कि किन वजहों से उन्होंने भारी मन के साथ खुद को वनडे क्रिकेट तक सीमित कर लिया?  पिछले दिनों बीसीसीआई के मुख्य चयनकर्ता, आपके फेवरेट कोच रवि शास्त्री और खुद आपने उन्हें मौजूदा समय में भी देश का सबसे बेहतरीन विकेट कीपर बताया। आपलोगों ने उन्हें 2019 विश्व कप तक टीम में रखने का जीवनदान भी दिया। आप सबकी इस महान उदारता के लिए देश कृतज्ञ हुआ। लेकिन कृतज्ञता से जीत नहीं मिलती।

टेस्ट के स्पेशलिस्ट बल्लेबाज अजिंक्य रहाणे के लिए आपके इलेवन में कोई जगह नहीं है। वनडे के स्टार रोहित शर्मा को टेस्ट में और टेस्ट के स्टार रहाणे को टीम से आउट करने की दूरदृष्टि के पीछे आपकी कोई 'विराट रणनीति' हो सकती है। केपटाउन टेस्ट के पहले दिन के पहले 15-20 मिनटों में तीन अफ्रीकियों को पैवेलियन भेजने वाले भुवनेश्वर दूसरे टेस्ट से आउट हो गए, तो इसके पीछे भी आपकी कोई 'विराट रणनीति' हो सकती है। साहा के रिप्लेसमेंट के तौर पर दिनेश कार्तिक को बुलाने के पीछे भी आपका 'कोई और कौशल' हो सकता है। ऋषभ पंत बच्चा हो सकता है। उसे अभी घर में (घरेलु क्रिकेट में) खेलने-कूदने दीजिए। लेकिन पार्थिव और डीके को लेकर अपने फैसलों के पीछे कोई उचित लॉजिक तो दे दीजिए।

दुनिया के टॉप तीन स्पिनरों में शुमार रविचंद्रन अश्विन और रविंद्र जडेजा को आपने टेस्ट मैचों तक सीमित कर दिया। किसी ने कुछ नहीं कहा। विदेशी पिचों पर तो अब जडेजा के लिए तीनों में से किसी फॉरमेट में कहीं भी जगह नहीं दिख रही है। बल्ले से मजबूत, कमाल की फिल्डिंग और मैदान में ऊर्जा से भरपूर रहने वाले जडेजा सिर्फ ड्रेसिंग रूम की शोभा हैं। ये फैसला आपका है। समर्थन मुख्य कोच रवि शास्त्री का है। आपके लिए 'यस बॉस' की भूमिका में चयनकर्ताओं (जिन्हें कभी मोहिंदर अमरनाथ ने जोकर कहा था) की टोली है।

आपने जो कहा BCCI ने वही किया। खुद फिसड्डी टाइप क्रिकेटर रहे चयनकर्ता आपके विराट व्यक्तित्व के आगे बौने हो गए। आपकी और शास्त्री की जोड़ी ने सैलरी के मुद्दे को उठाया, उस पर भी बोर्ड आपको ना नहीं कह सका। आपने कुंबले को बे-आबरू कर बाहर का रास्ता दिखलवाया। चेहेते शास्त्री की री-एंट्री कराई। क्रिकेट के कर्ताधर्ताओं ने आपके आगे घुटने नहीं टेके। असल में वो आपके पीछे खड़े करोड़ों फैंस की भावनाओं के आगे नतमस्तक हो गए।

क्रिकेट और राजनीति में एक बड़ा फर्क होता है। राजनीति में वन मैन शो चल जाता है, क्योंकि उस वन मैन से 'हजारों मैन/पर्सन' के स्वार्थ जुड़े होते हैं। ज्यादा कुछ किए बिना भी उस वन मैन के बूते बहुत कुछ हासिल होने की संभावना और उम्मीद होती है। क्रिकेट जैसे टीम गेम में वन मैन शो नहीं चलता, क्योंकि आपकी जगह सिर्फ आपके प्रदर्शन से तय होती है। और सभी ग्यारह खिलाड़ियों के अच्छे प्रदर्शन से ही एक जीतने वाली टीम खड़ी होती है।

याद रखिएगा टीम पूरे देश की है। लेकिन तभी तक, जब तक आप कुछ तय नियमों, मानकों और तर्कसंकत फैसलों पर चलकर जीतेंगे या हारेंगे। वर्ना सिर माथे पर चढ़ाने वाला देश ये भी कहने में देर नहीं लगाएगा कि ये हमारी टीम नहीं है। ये देश की टीम नहीं है। ये बीसीसीआई के गैरक्रिकेटीय बैक ग्राउंड वाले बुद्धिमानों प्रशासकों की टीम है। ये बीसीसीआई के बनाए फिसड्डी चयनकर्ताओं की टीम है। ये एक महान क्रिकेटर विराट कोहली के गलत आकलन से बनी टीम है। हम इस टीम को अपना नहीं मानते। पत्रकारों से आप नाराज हो सकते हैं। लेकिन पत्रकारों की उन भावनाओं से आप नाराज नहीं हो सकते, जो इस वक्त देश की भावना है।

आप जब रन बनाते हैं और जीत दिलाते हैं, तो देश आपका आभारी होता है। कल फिर होगा। लेकिन आज सवाल उठाना देश का हक है। क्योंकि देश और क्रिकेट के करोड़ों फैंस ही आपके खेल को जुनून में तब्दील करते हैं। और वही जुनून बीसीसीआई को दुनिया का सबसे अमीर बोर्ड बनाता है। और उसी अमीर बोर्ड के बूते आप पर दौलत और शोहरत की बरसात होती है।

राजनीति, फिल्म और क्रिकेट। यही तीन वो इलाके हैं जिनकी चर्चा देश सबसे ज्यादा करता है। लेकिन आप क्रिकेटर इन तीनों में एक मायने में सबसे लकी हैं। आप पर देश को सबसे ज्यादा यकीं है। हर जगह स्थायी पसंद और नापसंद। क्रिकेटरों को लेकर कोई स्थायी नापसंदगी नहीं होती। जो जिस दिन देश का नाम ऊंचा करे वो हीरो है। जिन पत्रकारों पर आपने अपनी खीझ उतारी है वो भी इस समय यही सोच रहे होंगे कि किसी तरह तीसरे टेस्ट में आपकी टीम जीते और वो देश के साथ आपके जयकारे लगाएं। आइंदा इस रिश्ते का सम्मान कीजिएगा।