39 अपनों की ‘दूसरी मौत’

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| मार्च 23 , 2018 , 15:16 IST

एक मौत होती है। और दूसरी जिंदगी। किसी भी इंसान के लिए इनके बीच कोई तीसरी स्थिति नहीं होती है। लेकिन यहां तीसरी स्थिति थी। मौत तो हो चुकी थी, लेकिन परिजनों ने न उन मौत की आहट सुनी न जिंदगी ने बने रहने की तसल्ली दी। पौने चार साल अजीब कश्मकश में बीते। जब भी जिंदगी ने हार मानने की कोशिश की, तो जिंदगी का भरोसा लेकर देश की सरकार सामने खड़ी हो गई। लेकिन जब सच सामने आया, तो पता चला कि जिस भरोसे में 39 परिवारों ने इतना लंबा वक्त गुजार दिया, वो बेमानी था। नियम कहता है कि जब तक मौत की तस्दीक न हो जाए, हम किसी को जिंदा ही मानते हैं। यही इंसानियत का तकाजा है। हमारी सरकार इसी तकाजे से बंधी रही और जब तस्दीक हो गई, तो सदन के जरिये बता दिया कि- ‘’हमारे 39 अपने अब हमारे बीच नहीं हैं।” और इसके साथ हो गई 39 अपनों की ‘दूसरी मौत’।

25 जुलाई 2014 से जुलाई 2017 के बीच विदेश मंत्री ने कम से कम पांच बार एक ही जैसे बयान दिए। जिनका सार ये था कि- “39 भारतीयों की मौत की कोई पुष्टि नहीं हुई है। लिहाजा हम उन्हें मृत नहीं मान सकते। रही बात जिंदा होने की उम्मीदों की, तो हमारे कई भरोसे के सूत्र बता रहे हैं कि हमारे वो 39 अपने महफूज हैं। हम उन तक देर-सबेर पहुंच जाएंगे।” जिन सूत्रों की बात सुषमा जी ने की उनकी संख्या करीब 8 तक बताई गई। इसके बाद बहुत ही गंभीर चिंता पूरे देश के जेहन में उठ सकती है कि अगर हमारे विदेश मंत्रालय के 8 सूत्र एक साथ गलत हो सकते हैं, तो क्या ये हालात बाकी किसी मामले में भी देश की परेशानी का सबब नहीं बन सकते?

भूल नहीं सकते हम सुषमा की छवि

विदेश मंत्री के तौर पर सुषमा स्वराज की छवि मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं को समझने वाली शख्सियत की बनी है। कुछ समय पहले एक ट्विटर यूजर ने सुषमा और इसरो को ट्वीट किया था कि- “मैं मंगल ग्रह पर फंस गया हूं. 987 दिन पहले मंगलयान से जो खाना भेजा गया था वह खत्म हो गया है। आप दूसरा मंगलयान कब भेजेंगी?” इस पर विदेश मंत्री स्वराज ने जवाब दिया था कि- “अगर आप मंगल ग्रह पर भी फंस जाओगे, तो भी भारतीय उच्चायोग वहां आपकी मदद जरूर करेगा।” सुषमा का ये ट्वीट न सिर्फ वायरल हुआ था बल्कि इस पर लोगों ने दिल खोलकर सुषमा स्वराज की तारीफ की थी। इस तारीफ के पीछे वजह भी थी। पिछले करीब 4 साल में विदेश मंत्री की पहल से मुश्किल में फंसे भारतीयों को राहत मिलने की खबरों की बड़ी लंबी फेहरिस्त है।

चाहे इराक में फंसी 46 भारतीय नर्सों का मामला हो या फिर केन्या से बचाई गई 3 भारतीय लड़कियों का। और कौन भूल सकता है 2015 में यमन से 4 हजार से अधिक भारतीयों और विदेशी नागरिकों को निकालने के लिए ‘ऑपरेशन राहत’ के नाम से चलाया गया अभियान। 11 दिनों तक चले इस ऑपरेशन में प्रधानमंत्री के सउदी के शाह को फोन के साथ-साथ विदेश मंत्री की सूझबूझ ही काम आई थी। मातम की घड़ी में यहां इन उपलब्धियों की चर्चा इसलिए क्योंकि ऐसा न हो कि 39 अपनों की दुखद मौत के भावावेश में हम अपने विदेश मंत्रालय की 4 साल की इसी तरह की कामयाबियों को भुला बैठें। क्योंकि इसे भुलाने से सिर्फ विदेश मंत्री के साथ अन्याय नहीं होगा, बल्कि उस भरोसे की बुनियाद भी हिलेगी, जिसके बूते दुनिया के किसी भी कोने में रह रहे हमारे अपने खुद के महफूज होने का अहसास करते हैं और आखिरकार इससे देश में देशवासियों का भरोसा बढ़ता है।

अपने ही ट्रैक रिकॉर्ड के दबाव में थीं सुषमा ?

तो क्या सुषमा इसलिए ज्यादा सवालों में हैं क्योंकि उनका ट्रैक रिकॉर्ड ऐसे मामलों में अव्वल रहा है? क्या मोसुल में हुई मौतों के मामले को हैंडल करने में विदेश मंत्री पर उठ रहे सवाल बेवजह हैं? नहीं। बेवजह भी नहीं हैं। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों को छोड़ दीजिए। तमाम परिजनों का आरोप है कि उन्हें अंधेरे में रखा गया। सरकार 39 भारतीयों की जान बचाने की मुहिम में नहीं जुटी थी। ये शायद संभव भी नहीं था। सरकार को सिर्फ इतना बताना था कि उनके अपने जिंदा हैं या नहीं? ये बताने में हमारी सरकार ने पौने चार साल लगा दिए। जो भी गुस्सा है, वो इसी बात पर है।

हरजीत मसीह को हैंडल करने में गलती हुई?

शायद एक गलती हरजीत मसीह को लेकर भी हुई। अकेला बचकर आया ये शख्स झूठा हो सकता है। लेकिन उन 39 भारतीयों का अकेला चश्मदीद भी था। उसने कहा कि 39 सभी भारतीय मारे जा चुके हैं। हमारे विदेश मंत्रालय के 8 सूत्रों ने कहा कि नहीं उनके मारे जाने के कोई पक्के प्रमाण नहीं हैं। अलबत्ता उनके सुरक्षित और जिंदा होने के हमारे पास जानकारी है। तथ्यों पर जाएं, तो 20 मार्च 2018 को हरजीत मसीह की बातें सच साबित हुईं और हमारे 8 सूत्रों की गलत। इसके बाद परिजनों की नाराजगी को हम यूं ही नहीं कह सकते। हरजीत मसीह को लेकर सरकार और एजेंसियां गलत न भी थीं, तो कम-से-कम उसे हैंडल करने में हुई चूक तो दिख ही रही है।

संसद में मौत की पुष्टि करतीं विदेश मंत्री का जोर इस बुरी खबर की जानकारी देने के साथ-साथ हरजीत मसीह को फिर से झूठा बताने पर भी रहा। वो भी इतना ज्यादा कि एकबारगी यही लगा कि अब इन बातों से क्या फायदा? सदन में विदेश मंत्री के बयान के दौरान विदेश राज्यमंत्री वी के सिंह के ग्राउंड जीरो पर जाकर चलाए गए खोजने के मिशन की तारीफ की गई। इसमें भी कोई परेशानी नहीं थी। लेकिन इस तारीफ पर कुछ सदस्यों का मेजें थपथपाना अखर गया।

इतने संवेदनशील मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप क्यों?

राज्यसभा में बयान देने के बाद सुषमा जी को लोकसभा में भी बयान देना था। लेकिन हंगामे की वजह से विदेश मंत्री वहां नहीं बोल पाईं। इसी के बाद उन्होंने मीडिया के सामने आने का फैसला किया। वो आईं और इतने संजीदा मुद्दे पर न बोल पाने की तकलीफ भी बयां की। लेकिन इस दौरान भी सुषमा ने विपक्ष को भला-बुरा कहने में (लोकसभा में किए गए हंगामे के लिए) बहुत वक्त लगाया। ये भी गैरजरूरी लगा। यही नहीं, मीडिया के सामने मोसुल की घटनाओं की जानकारी देते हुए विदेश मंत्री ने न सिर्फ आतंकियों की शक्ल में मौजूद भेड़ियों की भयावहता का जिक्र किया, बल्कि उनके चंगुल से अपनों को निकाल कर ला पाने में कहीं-न-कहीं अपनी (हमारे देश की) असमर्थता भी जाहिर की। क्या इसकी जरूरत थी? अगर हमारी जगह अमेरिका सरीखा देश होता तो क्या कहता? शायद यही कि हमारे लोगों की जान लेने वालों को हम सबक सिखाएंगे। IS को सबक सिखाने की बात नहीं भी, तो हम इतना तो कह ही सकते थे कि आतंकवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई पुरानी है और हम विश्व बिरादरी को अब और बढ़-चढ़कर इसमें सहयोग देंगे। लेकिन हम ऐसा कहने की जगह असहाय-से नजर आए। जबकि आज का भारत न असहाय हो सकता है और न ही ऐसा दिखने का जोखिम उठा सकता है।

बहरहाल, करीब एक साल पहले ही पंजाब में चुनाव संपन्न हुए हैं। सवाल उठ सकते हैं कि अगर उससे पहले 39 भारतीयों समेत पंजाब के 27 लोगों को न बचा पाने की खबर देश में आती, तो उस राज्य (पंजाब) में क्या माहौल बनता? यकीनन इस खबर का राजनीतिक इस्तेमाल गलत होता, लेकिन राजनीति के मौजूदा दौर में इसकी आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे तमाम कयास मौत की पुष्टि में देरी के पीछे लगाए जा सकते हैं। लेकिन जो दो सत्य साफ दिख रहा है, वो ये कि हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज शायद अपने ही बेहतरीन ट्रैक रिकॉर्ड के दबाव में आ गईं और दूसरा ये कि हमारा देश 39 जिंदा भारतीयों से ज्यादा उनकी मौत के पक्के सबूत को ढूंढ रहा था। और उनके डीएनए की शक्ल में आखिरकार हमें ये हासिल भी हुआ। इस पक्के सबूत के मिलने से पहले उनकी मौत की तरफ किए किसी भी इशारे के बाद एक बड़े दबाव की आशंका थी। और ये दबाव होता कि हमारे अपनों के अवशेष कहां हैं?  20 मार्च 2018 को सरकार बुरी खबर सुनाने की स्थिति में थी। क्योंकि डीएनए मैच होने की शक्ल में उसके पास सबसे बड़ा प्रमाण भी था और उस सामूहिक कब्रगाह का पता भी, जिसमें हमारे 39 अपने कभी दफन कर दिए गए थे।

वक्त इमोशनल राजनीति का नहीं एक्शन का

विपक्ष के आरोप वही हैं, जो पीड़ितों के हैं। यही कि सरकार ने परिजनों को अंधेरे में रखा। कांग्रेस अब सुषमा स्वराज के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने की बात कह रही है। ये उनका अधिकार है। लेकिन सवाल है कि क्या सुषमा को कोई सजा देकर पीड़ित परिवार के घाव भर जाएंगे। दिल्ली में बीजेपी की सरकार है। पंजाब (यहां के सबसे ज्यादा 27 लोग मारे गए हैं) में कांग्रेस की सरकार है। बिहार में बीजेपी-नीतीश के गठबंधन की सरकार है। सबके पास मौके हैं और उन पर जिम्मेदारी भी है कि पीड़ित परिवारों के लिए अपने-अपने हिस्से से ये क्या कर पाते हैं? जो नहीं रहे वो मेहनत-मजदूरी करने वाले थे। उनके परिवारों की उनकी बड़ी जरूरत थी। वक्त उन जरूरतों को पूरा करने का है। सरकारें इमोशन से नहीं चलतीं। सरकारें एक्शन से चलती हैं। मोसुल को अगर इमोशन से हैंडल करने की गलती हुई भी है, तो अब मोसुल के बाद के हालात को एक्शन से हैंडल कर भरपाई संभव है।