राजनीति

उपचुनावों में राजनीति ने ली अंगड़ाई !

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| मार्च 14 , 2018 , 21:16 IST

अति दुर्लभ संयोग दिखा। हाथी वाले नीले झंडे और साइकिल के निशान वाले लाल झंडे एक साथ हो गए। इन झंडों को थामे लोग गले मिलते नजर आए। गालों पर लाल और नीले रंग के गुलाल एक-दूसरे से घुलते-मिलते नजर आए। राजनीति में घालमेल होते ही रहते हैं, लेकिन इतने बड़े कम ही होते हैं। चुनाव से पहले बहन मायावती ने साफ-साफ कहा था कि- “कयास न लगाए जाएं। ये सहयोग गोरखपुर और फूलपुर तक ही है। 2019 के लिए गठबंधन की कोई बात नहीं हुई है।” लेकिन दोनों पार्टियों के जमीनी कार्यकर्ताओं ने ऐसे जश्न मनाया और गले मिले कि जैसे हमेशा के लिए एक हो गए हों। और इस मौके पर एक नारे ने जन्म लिया- “बुआ-भतीजे में दम...जीतेंगे हम।” फिर देर शाम जब अखिलेश यादव पहल करते हुए मायावती के घर पहुंचे तो दोनों के बीच 40 मिनट की लंबी बातचीत चली।

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एक राजनीतिक संदेह और सवाल को बिहार ने नकार दिया था कि क्या जेडीयू और आरजेडी के वोटर साथ-साथ आ पाएंगे? फिर भी यही सवाल यूपी में था कि क्या एसपी और बीएसपी के वोटर एकजुट होंगे? शायद जवाब यूपी से भी आ गया। बीजेपी के मुकाबले जो दो स्थानीय क्षत्रप पिछले ही साल अपने तंबू तक नहीं बचा पाए थे उनके गठजोड़ की कोई काट बीजेपी के पास नहीं दिखी। बीजेपी कह सकती है कि फूलपुर तो कभी उनका गढ़ रहा ही नहीं। लेकिन तब इस बहाने की हवा गोरखपुर में निकल जा रही है। मुख्मंत्री योगी ने काफी कुछ साफगोई दिखाई और नतीजों को बीजेपी के अति आत्मविश्वास का नतीजा भी कह दिया और सबक लेने की सलाह भी दे दी। लेकिन अखिलेश ने उनके दो बयानों को पकड़ा और जीत के बाद एकजुट हुए समाजवादियों और बसपाइयों को आगे की लड़ाई के लिए साफ संदेश देने की कोशिश की। योगी के सांप-छुछुंदर वाले बयान के हवाले से अखिलेश ने दलितों-पिछड़ों को सांप-छछूंदर कहने का आरोप लगा दिया। तो विधानसभा में योगी के ईद न मनाने के बयान को देश और सदन की भावना का अपमान करार किया।

लेकिन अब इसके बाद सवाल रह गए कि यहां से आगे क्या? 2019 के लिहाज से यूपी की इन दो सीटों के नतीजे क्या कहते हैं ? इनके संकेत और संदेश क्या हैं?

तो जो 10 संदेश बिल्कुल साफ दिख रहे हैं वो गौर करने लायक हैं :

1. SP-BSP गठबंधन BJP पर भारी

अगर योगी के गोरखपुर में ये गठबंधन BJP को बेदखल कर सकता है, तो राज्य की बाकी सीटों पर बीजेपी के लिए चुनौती समझी जा सकती है। इस सीट पर बीजेपी 1989 के बाद से नहीं हारी थी। इस उपचुनाव ने जाहिर किया कि मायावती और अखिलेश के कैडर और वोटर साथ आने के लिए तैयार हैं।

2. UP में अखिलेश विपक्ष को लीड करेंगे

नतीजों के बाद सवाल है कि यूपी में महागठबंधन को लीड कौन करेगा? यहां स्थिति थोड़ी फंस सकती है। क्योंकि विधानसभा चुनाव के नतीजों को आधार बनाएं या फिर इस उपचुनाव को। लीड करने का जनादेश

अखिलेश के पास ही है। ऐसे में देखना होगा कि मायावती किस हद तक और किन शर्तों के साथ अखिलेश के नेतृत्व को कबूल करती हैं? हालांकि नतीजों के बाद अखिलेश ने जिस तरीके से मायावती के लिए बार-बार कृतज्ञता का भाव जाहिर किया है, उससे इनके लिए आगे की राह आसान बनती जरूर दिख रही है।

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3. UP में कांग्रेस की स्थिति और कमजोर हो सकती है

2017 विधानसभा चुनाव में एसपी-कांग्रेस का विफल प्रयोग आजमाया जा चुका है। ऐसे में न समाजवादी और न ही बहुजन समाज पार्टी कांग्रेस को ज्यादा तवज्जो देना चाहेगी। फिर भी कांग्रेस समझौते पर मजबूर हो सकती है। क्योंकि यूपी में उन्हें अपनी क्षमताओं का बखूबी अहसास है।

4. ध्रुवीकरण की कोशिश हो सकती है

एसपी-बीएसपी और कांग्रेस के अभेद्य जातीय समीकरण की काट के लिए बीजेपी वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश कर सकती है। इसका ट्रेलर पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने दिखाया भी था। लिहाजा आने वाले दिनों में मंदिर समेत ध्रुवीकरण करने वाले मुद्दे गरमा सकते हैं।

5. BJP बदल सकती है अपनी रणनीति

यूपी में योगी सरकार के सिर्फ एक साल हुए हैं। ऐसे में इस नतीजे को योगी सरकार के प्रदर्शन के साथ साथ केंद्र के काम पर दिए गए फैसले के तौर पर भी देखा जा सकता है। ऐसे में सिर्फ पीएम मोदी के चेहरे के बूते टिकी बीजेपी को यूपी में 2014 दोहराने के लिए अपनी रणनीति में बड़े बदलाव लाने पड़ सकते हैं।

6. दूसरे राज्यों में मजबूत होंगे बीजेपी विरोधी

देश के सबसे बड़े राज्य का सैंपल सर्वे तमाम दूसरे राज्यों में बीजेपी विरोधी मोर्चे को मजबूत करेगा। साथ ही तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, झारखंड और कर्नाटक सरीखे राज्यों में कांग्रेस के लिए बीजेपी के मुकाबले पुराने सहयोगियों को सहेजे रहना और नए सहयोगी तलाशना आसान हो जाएगा।

7. थर्ड फ्रंट की गुंजाइश मजबूत होगी

यूपी के नतीजों ने साफ कर दिया है कि राज्य में एसपी-बीएसपी गठबंधन की सूरत में कांग्रेस की ज्यादा जरूरत उन्हें नहीं है। यानी 80 सीटों वाले यूपी से एक संदेश ये भी निकल सकता है कि देश में गैर बीजेपी गैर कांग्रेस गठबंधन के लिए धरती तैयार है। खास ये है कि के.चंद्रशेखर राव सरीखे नेता इसकी पहल कर भी चुके हैं।

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8. नीतीश पर दबाव बढ़ेगा

यूपी से पहले ऐसा ही प्रयोग बिहार में हुआ था। और वहां भी बीजेपी विरोधी खेमे को कामयाबी मिली थी। लेकिन अचानक नीतीश का हृदय परिवर्तन हो गया और गठबंधन के साथ सारी सीटों पर चुनाव लड़कर तीसरे नंबर पर रही बीजेपी सत्ता में साझीदार हो गई। नीतीश पर जनादेश के अपमान का आरोप लगा। लालू के भ्रष्टाचार की आड़ में नीतीश अपने फैसले को सही बताते रहे। लेकिन अब इस मिनी जनादेश के बाद वही सवाल दोबारा नीतीश का पीछा करेंगे।

9. एनडीए के सहयोगी बीजेपी पर दबाव बढ़ाएंगे

टीडीपी की नाराजगी देश ने अभी-अभी देखी है। बीजेपी के खिलाफ शिवसेना की कसक पुरानी और शाश्वत है। अकाली भी कुछ खास खुश नहीं बताए जाते। अगर ऐसे नतीजों से- “बीजेपी मतलब जीत है” का भ्रम टूटेगा और सहयोगी बीजेपी पर दबाव बढ़ाने से परहेज नहीं करेंगे।

10. बीजेपी विरोधियों में उत्साह बढ़ेगा

नॉर्थ-ईस्ट में फतह के बाद बीजेपी के उत्साह के आगे विपक्ष का आत्मविश्वास टूटता हुआ साफ दिखा था। उपचुनाव के नतीजे बीजेपी विरोधी पार्टियों को उस सदमे से निकालने वाले जरूर दिख रहे हैं।

और इन 10 अनुमानों और संभावनाओं से अलहदा सबसे बड़ा संकेत और संदेश शायद ये कि 2019 में भी ‘बुआ’ और ‘बबुआ’ साथ हैं। क्योंकि जीत की शाम दोनों की मुलाकात 40 मिनट लंबी चली है।


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