3 इडियट्स या 3 गुनहगार?

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| मार्च 29 , 2018 , 20:44 IST

स्टीवन स्मिथ और डेविड वॉर्नर :पहली सजा – क्रमश: कप्तानी और उपकप्तानी से छुट्टी

                                          दूसरी सजा – एक साल तक देश के लिए खेलने पर बैन

                                          तीसरी सजा – IPL से आउट

ये 3 सजाएं स्मिथ और वॉर्नर को मिली हैं। ये सजाएं आईसीसी की उस सजा से अलग और उसके बाद मिली हैं, जिसमें दोनों को एक-एक मैच के लिए बैन कर दिया गया था और इनकी पूरी मैच फीस काट ली गई थी। यानी इन ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को एक ही जुर्म के लिए तीन ‘अदालतों’ (ICC, CA और BCCI/IPL) ने सजा दी और इन्हें तीनों ही सजाएं काटनी हैं। वॉर्नर साजिश रचने के दोषी ठहराए गए, स्मिथ साजिश को सहमति देने के, तो उनके जूनियर बेनक्रॉफ्ट अपराध को अंजाम देने के। लिहाजा बेनक्रॉफ्ट को भी सजा मिली। 9 महीने देश के लिए नहीं खेलने की सजा। वैसे तो आईसीसी से मिली पहली सजा (1 मैच का बैन और जुर्माना) इनसे अलग है, लेकिन क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया से पूरे साल की पाबंदी के बाद ये ‘चौथी सजा’ बेमानी हो गई है।

रुसवा होकर स्वदेश लौटे स्टीव स्मिथ की आंखों से आंसुओं की धार बह रही थी। मीडिया के हुजूम के बीच स्टीव ने कहा-

सॉरी...

मैंने जो कुछ किया, उसका मुझे सारी जिंदगी अफसोस रहेगा।

मैं कोशिश करुंगा कि अपना और देश का सम्मान फिर से हासिल करुं।

मैं कहना चाहता हूं कि मुझे माफ कर दो।

मैं बहुत शर्मिंदा हूं, मुझे अपनी हरकत पर शर्मिंदगी है और खेद है।

मैं अपने देश के लिए योगदान करने की भरसक कोशिश करुंगा।

मैंने झूठ बोला।

मैं उस वक्त घबरा गया था, मैंने देश को शर्मिंदा किया।

इससे पहले इंग्लैंड के कप्तान जो रूट ने फरमाया था कि- “मैं खुश हूं कि हमारे खिलाड़ी ऐसे नहीं हैं। क्योंकि बतौर इंटरनेशनल खिलाड़ी आपको नियमों की जानकारी होनी चाहिए।” ये आदर्शवादी बातें करते हुए जो रूट शायद भूल गए कि 1994 में उन्हीं के ‘संस्कारी देश’ के कप्तान माइक अर्थरटन बॉल टैंपरिंग में पकड़े गए थे और उन पर 2 हजार पाउंड का जुर्माना भी हुआ था। सचिन तेंदुलकर 2001 में बॉल टैंपरिंग के आरोपों में घिरे, जांच में बेदाग निकल गए, मगर इसी मामले में सहवाग को दोषी ठहराया गया और एक मैच का बैन भी लगा। 2004 में राहुल द्रविड़ भी टैंपरिंग के दोषी करार दिए गए और मैच फीस का 50 प्रतिशत गंवाया। पाकिस्तान के वकार यूनुस 2001 में और शाहिद अफरीदी 2010 में बॉल टेंपरिंग के दोषी निकले और क्रमश: एक और 2 मैच के निलंबन का दंड झेला।

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ये सब उदाहरण इसलिए, जिससे कि स्मिथ और वॉर्नर पर हुई कार्रवाई के औचित्य और कठोरता को समझा जा सके। क्योंकि इन उदाहरणों के बाद किसी के भी जेहन में ये सवाल जरूर होगा कि अगर इतने सारे खिलाड़ी मामूली मैच फीस या फिर अधिकतम 2 मैच से निलंबन की सजा पाकर बच निकले, तो फिर स्मिथ, वॉर्नर और बेनक्रॉफ्ट पर ये अतिरिक्त सख्ती क्यों? उसी अपराध के लिए स्मिथ और वॉर्नर पर 12 टेस्ट, 26 वनडे और 10 टी-20 (इन एक साल में कैलेंडर के मुताबिक ऑस्ट्रेलियाई टीम को इतने ही मैच खेलने हैं) की पाबंदी क्यों?

इसे समझने के लिए घटना के बाद से मीडिया में आई कुछ सुर्खियों पर गौर कीजिए।

‘डेली टेलीग्राफ’ ने कहा- शर्मनाक।

‘द सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड’ ने कहा- स्मिथ ने देश का नाम डुबोया है।

‘द ऑस्ट्रेलियन’ ने पहले पन्ने का शीर्षक दिया- शर्मनाक स्मिथ।

संडे टाइम्स ने कहा- रंगे हाथ पकड़े गए ऑस्ट्रेलिया के ढोंगी और बेईमान क्रिकेटर।

ब्रिटिश मीडिया ने इन्हें ‘चीटर’ कहा और भारतीय मीडिया ने भी।

घटना के बाद ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री मैलकम टर्नबुल के शुरुआती बयान में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे ये लगे कि इन खिलाड़ियों पर इतनी सख्ती हो सकती है। टर्नबुल का पहला बयान था कि- “विश्वास नहीं हो रहा कि एक आदर्श क्रिकेट टीम इस तरह धोखाधड़ी में शामिल है। मैं हैरान हूं।” मगर इसके बाद हर नए दिन के साथ उत्तेजना और असंतोष में बढ़ोतरी होती रही और ऑस्ट्रेलियाइयों को अहसास करा दिया गया कि उनके खिलाड़ियों ने क्रिकेट के साथ कितना बड़ा धोखा किया है और ऐसा करते हुए उन्होंने अपने देश का नाम मिट्टी में मिला दिया है।

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तीनों खिलाड़ियों को लेकर हुई आक्रामक रिपोर्टिंग ने दुनिया भर के क्रिकेट फैंस के जेहन में इस निराशा के भाव को पैदा किया कि इन ‘3 इडियट्स’ ने अच्छे-भले गेम का कबाड़ा कर दिया। खिलाड़ियों के खिलाफ बनते माहौल के बीच उन पर सख्ती बढ़ती गई और आखिरकार आया 1-1 साल बैन का फैसला। खिलाड़ियों के खिलाफ माहौल बनाने में अगर बड़ी भूमिका मीडिया की रही, तो एक सवाल यहां ये बनता है कि क्या स्मिथ और उनके साथी ‘इंटरनेशनल मीडिया ट्रायल’ के शिकार हो गए? मीडिया को क्या पूर्व की ऐसी घटनाओं और उन पर आईसीसी के फैसलों को ध्यान में रखकर रिपोर्टिंग नहीं करनी चाहिए थी? क्या बताना नहीं चाहिए था कि अफरीदी, वकार, अर्थरटन या सहवाग-द्रविड़ के केस में क्या हुआ था?

स्लेजिंग के लिए खिलाड़ियों की पीठ पर हाथ रखने वाले ऑस्ट्रेलियाई या फिर कई और देशों के क्रिकेट प्रबंधक और प्रशासक भूल गए कि उन्होंने क्रिकेट में किस कल्चर को हवा दी है। सौरव गांगुली कहते हैं कि- ऐसे वाकये इसलिए होते हैं क्योंकि ऑस्ट्रेलियाई टीम का लक्ष्य हमेशा किसी भी हालत में जीत हासिल करने का होता है, जो सही नहीं है। गांगुली से बेहतर ऑस्ट्रेलियाइयों का आकलन कम ही लोग कर सकते हैं। और गांगुली का आकलन कहीं न कहीं बता रहा है कि स्मिथ, वॉर्नर और बेनक्रॉफ्ट जिस सोच के तहत ‘अपराधी’ बने वो सोच उन्हें तो विरासत में मिली है। तो क्या अपने तीन खिलाड़ियों को पूरे साल घर बिठाने की सजा देना वाला क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया’ अपने उस कल्चर को बदलेगा, जो ‘गलत’ के लिए प्रेरित करता है?  टैंपरिंग केस पर क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया और आईसीसी को फाफ डु प्लेसिस की बातों पर गौर करना चाहिए- जिसमें साउथ अफ्रीकी कप्तान कहते हैं कि- “क्रिकेट के नियमों के बीच काफी ग्रे एरियाज हैं। पता ही नहीं चलता कि आपको क्या करना है और क्या नहीं? इस हिसाब से जो सजा स्मिथ को मिली है, वो बहुत ज्यादा है।”

तो फिर आईसीसी के पास सजा का अधिकार ही क्यों?

आईसीसी क्या है? अगर हम इसे क्रिकेट की सर्वोच्च अदालत कहें, तो शायद गलती नहीं होगी। लेकिन पूरे मामले में आईसीसी की बेचारगी भी गौर करने लायक है। आईसीसी का नियम कहता है कि स्मिथ और वॉर्नर एक-एक मैच के बैन के हकदार हैं (उन्हीं के दिए फैसले के आधार पर)। लेकिन एक बोर्ड को उसका फैसला मान्य नहीं है। क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया अपनी अदालत में सजा सुनाता है और आईसीसी उसे मानने पर मजबूर है। आईपीएल प्रबंधन स्मिथ और वॉर्नर को लीग में बनाए रखने के लिए कुछ नहीं करता, उल्टे उनकी 2018 आईपीएल से विदाई का रास्ता बना देता है। और इस पर आईसीसी एक बार फिर मौन रह जाता है। न्याय के इन सिद्धांतों में बड़ी अंधेरगर्दी दिखती है।

आशीष नेहरा कहते हैं कि- “जो हो गया वो हो गया, अब हमें आगे बढ़ना चाहिए। क्रिकेट या किसी दूसरे खेल में अच्छी और बुरी चीजें होती रहती हैं। इन चीजों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ना होता है।” लेकिन ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट बोर्ड सजा देते हुए इतना आगे बढ़ गया कि दुनिया के सबसे होनहार खिलाड़ियों में शुमार दो क्रिकेटरों के भविष्य पर सवाल है। 28 साल के स्टीव स्मिथ और 31 साल का डेविड वॉर्नर जब सजा भुगतकर मैदान पर उतरेंगे, तो उस वक्त विश्व कप सिर्फ महीने भर दूर होगा। तब ये तीन खिलाड़ी अपने और अपने देश के सम्मान के लिए लड़ने लायक रहें हम इसकी दुआ भर कर सकते हैं।

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क्रिकेट को नुकसान :

8 साल के टेस्ट करियर में 61.38 की औसत से रन बना रहे स्टीवन स्मिथ की तुलना डॉन ब्रेडमैन से हो रही थी। अब स्मिथ ‘बैडमैन’ हैं। स्मिथ अपने फॉर्म के शिखर पर थे। साल भर के अज्ञातवास के बाद जब स्टीवन वापसी करेंगे, तब तक क्रिकेट की मैली गंगा में कितना ही पानी बह चुका होगा। लिहाजा इस बात की भी आशंका रहेगी कि कहीं हमने क्रिकेट की एक धरोहर की धार को अपने अतिवादी फैसले से असमय कुंद तो नहीं कर दिया?

हर खेल में सैकड़ों खिलाड़ी होते हैं, दस-बीस सितारे और दो-चार सुपर सितारे। स्टीव सुपर सितारे थे और वॉर्नर सितारों में शुमार। खिलाड़ी खेल के चलते रहने के लिए जरूरी होते हैं। सितारे और सुपर सितारे खेल को ऊंचाइयों तक ले जाकर उसमें ग्लैमर का रंग भरते हैं। कोई भी खेल ग्लैमर हासिल करने के बाद ही वो सबकुछ हासिल करता है, जिसकी मांग मौजूदा बाजार को होती है। बाजार का यही दबाव कुछ मौकों पर खिलाड़ियों से गलतियां भी करवा बैठता है। स्मिथ, वॉर्नर और बैनक्रॉफ्ट को जो सजा मिलनी थी वो तो मिल गई। लेकिन उनके साथ क्रिकेट फैंस भी सजा भुगतेंगे और क्रिकेट भी भुगतेगा। सवाल फिर से वही रहेगा कि एक गुनाह की 3 सजा क्यों? एक गुनाह पर तीन-तीन ‘अदालतों’ का फैसला क्यों? कहीं ‘3 इडियट्स’ को हमने 3 गुनहगार बनाने की भूल तो नहीं कर दी? वैसे सोचना तो क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया को है, लेकिन अगर बीसीसीआई कुछ मध्यस्थता की कोशिश करे, तो क्रिकेट पर उसकी ये बड़ी मेहरबानी होगी।