ओपिनियन

‘पद्मावत’ पर ‘जौहर’ का नाटक!

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| जनवरी 23 , 2018 , 22:01 IST

प्रधानमंत्री मोदी दावोस में थे। मंत्रियों की पूरी टीम उनके साथ थी। विश्व बिरादरी में भारत के चर्चे थे। जिधर देखो उधर भारत और भारतीय कंपनियों के होर्डिंग दिख रहे थे। डंका बज रहा था। अपने देश के खाने-पीने के स्टॉल लगे थे। हर कहीं देश का जायका बिखरा था। वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम की बैठक का उद्घाटन करते हुए हमारे प्रधानमंत्री ने सिलसिलेवार बताया कि देश में काम करने की स्थितियां कितनी सुगम हुई हैं। कैसे उन्होंने देश में लालफीताशाही को खत्म कर दिया है?

लेकिन देश में उसी वक्त क्या हो रहा है? एक करणी सेना है। कल तक इन्हें ज्यादा लोग नहीं जानते थे। आज पूरे देश को पता है कि लोकेंद्र सिंह कालवी क्या बला हैं। कालवी के आगे देश की चार राज्य सरकारें पूरी तरह नतमस्तक हैं, जबकि कई और सरकारें नजदीक आती 25 जनवरी की तारीख को लेकर सांसत में हैं। क्योंकि इस दिन एक पीरियड फिल्म रिलीज हो रही है।

जिसका नाम अब ‘पद्मावत’ है। ये राज्य सरकारें और उनकी पुलिस उतनी सक्रिय नहीं हैं, जितने कि उपद्रवी। क्योंकि ये सरकारें उपद्रव नहीं रोकना चाहतीं, बल्कि अब भी एक फिल्म को रोक देना चाहती हैं। भले ही इस रूप में किसी के संविधान से मिले अधिकार ही क्यों न नकार दिए जाएं।अब इसके बाद अगर ये कहा जाए कि प्रधानमंत्री दावोस में जो कोशिशें कर रहे थे, उसमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और गुजरात सरीखी सरकारें पलीता लगा रही हैं, तो क्या ये गलत होगा?

‘पद्मावती’। नाम पर किसी की कोई कॉपीराइट नहीं है। फिर भी संजय लीला भंसाली को कहा गया कि आप अपनी फिल्म का नाम बदल लें। उन्होंने ‘पद्मावती’ को ‘पद्मावत’ कर दिया। मरता क्या न करता। कई कट लगे। दीपिका पादुकोण की देह के एक खास हिस्से को एक गाने में से हटा दिया गया। इसके बाद भी संजय लीला भंसाली फिल्म में माफी मांग रहे हैं (जिसे सभ्य भाषा में डिस्क्लेमर कहा जाता है।) इसके बाद भी विरोध का ‘जौहर’ बदस्तूर जारी है। क्योंकि  कुछ लोगों का कहना है कि भंसाली समाज के एक हिस्से की भावनाओं को आहत करने के ‘गुनहगार’ हैं।

इतिहास से छेड़छाड़ के ‘गुनहगार’ हैं। और इस लिहाज से देश के ‘गुनहगार’ हैं। और सबसे खास बात ये है कि इन ‘कुछ लोगों’ के तर्कों को हमारी ‘कुछ सरकारें’ भी मानती हैं। पिछले दिनों दो फिल्में बड़ी हिट रही थीं। ‘दंगल’ और ‘सुल्तान’। ‘दंगल’ में गीता फोगाट, उनके पिता महावीर फोगाट और कोच के बीच जिस तरह के समीकरण दिखाए गए थे, कहते हैं कि वैसा कुछ भी नहीं था। क्या इससे फोगाट फेमिली या देश का मान खराब हो गया? कि हम तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करते हैं? ‘सुल्तान’ में पता नहीं सलमान खान कितने इंटरनेशनल लेवल के मुकाबलों में मेडल जीतते नजर आए।

क्या इसके लिए देश की खिल्ली उड़ाई गई? ऐसा कुछ नहीं होता। क्योंकि सबको पता होता है कि पर्दे पर सिर्फ सपने बेचे जाते हैं। लेकिन ‘पद्मावत’ के विरोधियों को ऐसी बातों से क्या मतलब? वो तो जानकर भी अनजान हैं। क्योंकि इसी में उनका फायदा है। भले ही इसकी एवज में फिल्मकार से लेकर सरकार और आम लोगों को कितना भी नुकसान हो रहा हो। रिलीज के बावजूद उपद्रव और हिंसा के डर से अगर दर्शक सिनेमाघरों तक कम पहुंचते हैं, तो फिल्म से जुड़े सैंकड़ों लोगों को नुकसान तय है।

फिल्म रिलीज में देरी और रिलीज को लेकर कई सिनेमाघरों की आनाकानी से अगर नुकसान होता है, तो एक इंश्योरेंस कंपनी को निर्माताओं को 80  करोड़ रुपये भरने पड़ सकते हैं। सेट पर तोड़फोड़ और आग लगाने की घटना के बाद इंश्योरेंस कंपनी पहले ही 3 करोड़ भर चुकी है।इतिहास से जुड़ी शख्सियतें किसी परिवार, समाज, जाति या धर्म की बपौती नहीं होतीं। उन पर गौरव सारा देश करता है। गांधी जी को सिर्फ बनिया समाज के लोग ‘बापू’ नहीं कहते।

पंडित नेहरू को सिर्फ ब्राह्मण ही ‘चाचा’ नहीं कहते। वल्लभ भाई पटेल को सिर्फ गुजरात के पाटीदार ‘सरदार’ नहीं कहते। सुभाष चंद्र बोस को सिर्फ बंगाली लोग ही ‘नेताजी’ नहीं कहते। भीम राव अंबेडकर को सिर्फ दलित समाज के लोग ही ‘बाबा साहेब’ नहीं कहते। ये सारे और ऐसे तमाम हीरो पूरे देश के आइकन हैं और रहेंगे। सच तो ये है कि पद्मावती को एक समुदाय से जोड़ना उनके शौर्य का अपमान है। न कि उन पर फिल्म बनाना।

अब इसके बाद कोई हंगामा कर रहे करणी सेना से पूछे कि रावल रतन सिंह और पद्मावती की वीरता पर क्या बाकी देश को गौरव नहीं है? क्या बाकी देश को इनकी मान और मर्यादा की फिक्र नहीं है? बिल्कुल है। तभी तो लाखों फैंस भंसाली की फिल्म का इंतजार कर करे हैं। और ये दर्शक खिलजी की वीरता पर ताली बजाने सिनेमाघरों में नहीं जाएंगे। बल्कि राजा रतन सिंह और पद्मावती के शौर्य की जो पराकाष्ठा थी उसे देखने और सराहने सिनेमाघरों में जाएंगे।

देश की सर्वोच्च अदालत ने अगर एक बार ये कह दिया कि गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और हरियाणा की सरकारें फिल्म की रिलीज सुनिश्चित करें। तो फिर कम से कम इसके बाद इन राज्य सरकारों की सोच बदलनी चाहिए थी। नहीं बदली। उल्टे, दूसरे रास्ते तलाशे जाने लगे। गुजरात के थियेटर मालिक कह रहे हैं (या कहलवाया गया?) कि उन्हें सुरक्षा को लेकर डर है। लिहाजा ‘पद्मावत’ रिलीज नहीं करेंगे।

इसके बाद या तो रूपानी सरकार के यश और दबदबे पर सवाल है या फिर पर्दे के पीछे सरकार की मंशा ठीक नहीं है। चुनावी राज्यों राजस्थान और मध्य प्रदेश की सरकारें तो पुनर्विचार याचिका लेकर सुप्रीम कोर्ट ही पहुंच गईं। इन्हें ये कहते हुए भी शर्मिंदगी नहीं हुई कि कानून-व्यवस्था बिगड़ने का डर है। शुक्र है, सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ इनकी याचिका नकार दी, बल्कि उनके लिजलिजेपन के लिए खबर भी ली।

राजस्थान में हर साल 2.5 लाख से ज्यादा लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ अपराध के केस सामने आते हैं। देश भर में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के मामलों में करीब 13 प्रतिशत अकेले मध्य प्रदेश में होते है। ‘मामा’ शिवराज का राज महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में देश में शीर्ष पर है। मनोहर लाल खट्टर साहब के राज में हरियाणा महिलाओं-बेटियों के खिलाफ अपराध के मामले में हर रोज सुर्खियों में है।

काश, ये सरकारें ‘पद्मावती’ की चिंता करने से पहले इन बेटियों की चिंता कर ली होतीं। वैसे भी पद्मावती जैसी वीरांगना के मान-सम्मान की रक्षा ये सरकारें क्या कर पाएंगी, जो मुट्ठी भर उपद्रवियों के आगे कमजोर पड़ गईं। प्रधानमंत्री कहते हैं कि लंबी अवधि के फायदे के लिए वो वोट बैंक की राजनीति को तिलांजलि देने का माद्दा रखते हैं। ऐसा ही माद्दा बीजेपी शासित इन राज्यों को दिखाना होगा। फिल्में आती और जाती रहेंगी।

सरकार और सिस्टम का यश चला गया, तो नुकसान सबसे ज्यादा उसी लोकतंत्र का होगा, जिसकी छाया में इनके जलवे हैं। बड़ा सवाल मंशा को लेकर भी है। जो लोग क्षत्रिय मान-सम्मान का झंडा लेकर चल रहे हैं, उनमें सबसे मुखर लोकेंद्र सिंह कालवी के इतिहास को देखना भी जरूरी है। कभी लिटरेचर फेस्टिवल का विरोध, तो कभी फिल्मों का। कभी आरक्षण की मांग, तो कभी चुनाव जीतकर खुद को लोकतंत्र की मुख्य धारा से जोड़ने की बेचैनी।

कालवी ने करना तो बहुत कुछ चाहा, लेकिन कामयाबी कम ही मिली। हां, इस दौरान कालवी ने लोकतंत्र की आड़ में लाठीतंत्र का नुस्खा जरूर ढूंढ लिया। करीब 15 साल पहले बीजेपी के बागी नेता देवी सिंह भाटी के साथ मिलकर सामाजिक न्‍याय मंच बनाया। 2003 का विधानसभा चुनाव लड़ा। कालवी के सारे सिपहसलार मैदान में वैसे ही ढेर हो गए जैसे इतिहास में दर्ज वीरों के आगे दोयम दर्दे की फिसड्डी सेनाएं मुंह की खाती थीं।

कालवी ने 2006 में राजपूत करणी सेना बनाई। लेकिन राजपूत नेताओं में बिखराव के चलते फिर से फ्लॉप हो गए। तीसरा जोर कालवी ने 2008 में लगाया। विधानसभा चुनावों से ऐन पहले कांग्रेस की शरण में चले गए। इस आस में कि विधानसभा चुनाव में या बाद में लोकसभा का टिकट मिल जाएगा। लेकिन कांग्रेस ने उन्‍हें उम्‍मीदवार तक नहीं बनाया। साल 2014 में कालवी ने चौथी बार जोर लगाया। लोकसभा चुनावों से ऐन पहले बीएसपी के साथ हो लिए।

बाड़मेर-जैसलमेर सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन फिर से पिट गए।  रही बात करणी सेना के उपद्रवी इतिहास की, तो इन्होंने 2008 में भी आशुतोष गोवारिकर की फिल्‍म जोधा अकबर के खिलाफ विरोध का झंडा उठाया था। तब विरोध के चलते जोधा-अकबर फिल्म राजस्‍थान में रिलीज भी नहीं हो पाई थी। अपनी पहचान बनाने के लिए अकसर छटपटाहट में दिखने वाले कालवी ने करणी सेना बनाई तो थी राजपूत बिरादरी के लिए आरक्षण की मांग को लेकर, लेकिन बाद में उसने संगठन के 11 उद्देश्य तय कर लिए और इन उद्देश्यों में इतिहास से छेड़छाड़ का विरोध भी है। और इसी ‘महान कार्य’ को अंजाम देने में इन दिनों कालवी और उनके लोग लगे हैं।

लोकेंद्र सिंह कालवी की दुकान की सांसें फिर से चल पड़ी है। टाइमिंग भी अच्छी है। इसी साल राजस्थान में चुनाव है। करणी सेना और उनके कथित समर्थक राजनीतिक पार्टियों को वोट बैंक नजर आ सकते हैं। मोलभाव होगा। कुछ सीटें हासिल करने के मौके बनेंगे। टिकट देने वाले को भी राज्य के करीब 9 प्रतिशत राजपूत वोटों से सहानुभूति की कामना रहेगी। सब फायदे में हैं। लेकिन याद रहे देश की इमेज को फायदा नहीं हुआ है।


Ayuj Aryan

Very good article