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करवाचौथ के दिन बन रहा बेहद खास संयोग, जाने क्या है पूजन मुहूर्त

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अक्टूबर 27 , 2018 , 07:46 IST

सुहाग, सौभाग्य और समृद्धि का त्योहार करवाचौथ सभी सुहागिनों के लिए सबसे खास होता है। महिलाएं दिन भर भूखी-प्यासी रहकर अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं । यही नहीं कुंवारी लड़कियां मनचाहा वर पाने के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। सुहागनें इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले सरगी खाकर व्रत शुरू करती हैं और रात में चंद्रमा को छलनी से देखकर पति का आशीर्वाद लेकर व्रत खोलती हैं।

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इस बीच धार्मिक मान्यताओं की माने यह त्योहार हर साल कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। वहीं पूजन मुहूर्त पर नजर डालें तो शनिवार को दिन भर तृतीया और शाम के वक्त चतुर्थी तिथि का योग बन रहा है ऐसे में शाम 5 बजकर 36 मिनट से 6 बजकर 53 यानी सवा घंटे तक पूजन मुहूर्त है। जबकि चंद्रोदय यानी चांद दिखाई देने को समय रात 7 बजकर 58 मिनट पर है। ऐसे में सुहागिनें इसके बाद ही चांद को अर्घ्य देकर व्रत खोलें।

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वहीं ज्योतिष गणना के मुताबिक इस बार का करवाचौथ के दिन बेहद ही खास संयोग बन रहा है। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग के साथ साथ अमृत सिद्धि योग भी बन रहा है। यही नहीं इस दिन चंद्रमा शुक्र की राशि वृष में रहेगा और चंद्रमा पर गुरु की दृष्टि होगी।

इस दिन गेहूं या फिर चावल के दानें हाथ में लेकर कथा सुननी चाहिए। बालू, सफेद मिट्टी की वेदी पर शिव परिवार के साथ साथ चंद्रमा की मूर्तियों की स्थापना करें। यदि मूर्ति ना हो तो सुपारी पर धागा बांध कर उसकी पूजा की जाती है। इसके बाद अखंड सौभाग्य की कामना करते हुए देवी देवताओं का स्मरण करें और करवे सहित बायने पर जल, चावल और गुड़ चढ़ायें। और फिर रात में चंद्रमा दिखाई देने पर छलनी से चंद्रमा का दर्शन करके अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलना शुभ रहता है।

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वहीं इस दिन व्रत रखने वाली महिला को काले और सफेद कपड़ा भूलकर भी नहीं पहनना चाहिए। इस दिन लाल और पीले रंग के कपड़े पहनना विशेष शुभ माना गया है। साथ ही पूजन से पहले महिलाओं को पूर्ण श्रृंगार यानी 16 श्रृंगार करना चाहिए। 16 श्रृंगार में सबसे अधिक महत्व मेहंदी का माना गया है। करवाचौथ के दिन व्रत पूजन से पति की लंबी उम्र, निरोगी जीवन के साथ साथ संतान सुख की भी प्राप्ति होती है।

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मान्यताओं के अनुसार, सबसे पहले मां पार्वती ने यह व्रत शिवजी के लिए रखा था। इसके बाद ही उन्हें अखंड सौभाग्य प्राप्त किया था। इसलिए इस व्रत में भगवान शिव एवं माता पार्वती की पूजा की जाती है। वहीं महाभारत में पांडवों की विजय के लिए द्रौपदी ने ये व्रत रखा था।


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