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भक्तों के जयघोष से गूंजा बद्रीनाथ धाम, खोले गए श्रद्धालुओं के लिए कपाट

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अप्रैल 30 , 2018 , 11:26 IST

उत्तराखंड में स्थित भगवान बद्रीनाथ धाम के कपाट ब्रह्म मुहूर्त में सुबह साढ़े चार बजे मंत्रोच्चारण के बाद खोले गए। कपाट खुलने के बाद उपस्थित भक्तों के जयकारों के साथ भगवान के दर्शन करने का सिलसिला शुरू हो गया। अलकनंदा नदी के किनारे बसा यह भगवान विष्णु का मंदिर चारधाम की यात्रा में काफी प्रसिद्ध है। यह मंदिर हिन्दुओं की आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है।

छह महीने के लिए ही खुलते हैं कपाट -:

बद्रीनाथ मंदिर के कपाट भी बाबा केदारनाथ की तरह ही साल में सिर्फ छह महीने के खुलते हैं जो अप्रैल के अंत या मई के प्रथम पखवाड़े में दर्शन के लिए खोल दिए जाते हैं। लगभग 6 महीने तक पूजा-अर्चना चलने के बाद नवंबर के दूसरे सप्ताह में मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। बदरीनाथ मंदिर के पास एक कुंड है, जिसे तप्त कुंड कहा जाता है, जिसमें से गर्म पानी निकलता है। इस कुंडों में स्नान का धार्मिक महत्व तो है ही साथ ही इससे स्वास्थ्य लाभ भी मिलता है।

समय: कब क्या हुआ-:

3.15 बजे मंदिर के कर्मचारी एवं पुलिस-प्रशासन के लोग ड्यूटी पर तैनात किए गए।
3.30 बजे भगवान कुबेर जी दक्षिण द्वार से बामणी गांव के वृत्तिदारों के साथ परिक्रमा परिसर में प्रवेश किया।
3.40 बजे विशिष्ट अतिथि बीआईपी गेट से परिक्रमा परिसर में प्रवेश किया।
3.50 बजे बंदे रावल जी धर्नाधिकारी, वेदपाठी, डिमरी समुदाय के पुजारीगण, टिहरी राज परिवार के पुरोहितों ने उत्तर द्वार से प्रवेश किया।
4.00 बजे बदरीनाथ मंदिर के भीतर पूजन शुरू हो गया, अंदर सभी धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए गए।
4.30 बजे सबसे पहले विशिष्ट अतिथि, अधिकारी एवं मंदिर के जुड़े लोग दर्शन किए। इसके साथ ही आम श्रद्धालुओं के लिए मुख्य कपाट खोल दिए गए।

पर्वतों के बीच बसा है बदरीनाथ धाम-:

बद्रीनाथ धाम दो पर्वतों के बीच बसा है। इसे नर नारायण पर्वत कहा जाता है। कहते हैं यहां पर भगवान विष्णु के अंश नर और नारायण ने तपस्या की थी। नर अगले जन्म में अर्जुन और नारायण श्री कृष्ण हुए। बद्रीनाथ के पुजारी शंकराचार्य के वंशज होते हैं जो रावल कहलाते हैं। बद्रीनाथ धाम के महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्वयं भगवान विष्णु ने कहा है की कलियुग में वे अपने भक्तों को बद्रीनाथ में मिलेंगे।

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पुराणों में बद्रीनाथ धाम को पृथ्वी पर बैकुंठ की उपमा दी गई है क्योंकि यहां साक्षात् भगवान विष्णु विराजमान हैं। इस धाम की विशेषता यह है कि इसे सतयुग में मुक्तिप्रदा, त्रेता में योग सिद्धिदा, द्वापर में विशाला ओर कलियुग मे बदरीकाश्रम नाम से पहचान मिली है।

धाम में प्रवेश के लिए तीर्थयात्रियों को पंजीकरण व्यवस्था-:

श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति ने इस बार मंदिर में प्रवेश के लिए कम्प्यूटरीकृत टोकन सिस्टम की व्यवस्था फिर से शुरू करने की योजना बनायी है। मंदिर के पीआरओ डा. हरीश गौड़ ने बताया 'इस बार बद्रीनाथ धाम में प्रवेश के लिए तीर्थयात्रियों को पंजीकरण कराना होगा। पंजीकरण करते समय तीर्थयात्रियों को प्रवेश के लिए टोकन दिया जाएगा, जिसमें प्रवेश के लिए गेट पर पहुंचने का समय निर्धारित होगा। इससे तीर्थयात्री लाइन में खड़े रहनेवाले समय का उपयोग बद्रीनाथ धाम के अन्य स्थलों के दर्शन के लिए भी कर सकेंगे।'


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