ख़ास रिपोर्ट

हमेशा किसानों को ठगती रही सरकारें, कभी लागू नहीं हुई स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशें

सतीश वर्मा, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| अक्टूबर 2 , 2018 , 15:02 IST

जब-जब किसी राज्य में किसान आंदोलन होता है, तब-तब स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों का मुद्दा चर्चा में आता है। किसान संगठन लंबे समय से स्वामीनाथ कमेटी की सिफारिशों को लागू किए जाने की मांग करते रहे हैं। दरअसल इस कमेटी की रिपोर्ट में किसानों की स्थिति सुधारने के लिए कई तरह के सुधारों की सिफारिश की गई थी। पिछले एक डेढ़ साल के दरम्यान देश में अभूतपूर्व किसान एकजुटता देखने को मिली है। दिल्ली के जंतरमंतर पर तमिलनाडु के किसानों का धरना प्रदर्शन हो, या मध्यप्रदेश के मंदसौर में किसानों का आंदोलन और उन पर हुई गोलीबारी, राजस्थान के किसानों का उग्र प्रदर्शन हो या महाराष्ट्र के किसानों का लॉन्ग मार्च- किसान संघर्ष के ऐसे निराले दृश्य इससे पहले इतने बड़े पैमाने पर आजाद भारत में नहीं दिखे थे।

क्यों किसान उतर रहे हैं सड़क पर, क्यों कर रहे हैं दिल्ली कूच

आखिर कोई तो वजह होगी कि किसान अब सड़कों पर उतर रहे हैं, मुखर हो रहे हैं, अपने अधिकारों के प्रति सजग और लड़ाई के लिए प्रतिबद्ध नजर आ रहे हैं। हालांकि इस आंदोलनधर्मिता के साए में नहीं भूलना चाहिए कि किसानों की मौतों की दुखद दास्तानें भी हैं, चाहे वो पुलिस की हिंसा हो या भीषण विवशता में फांसी लगा लेने या जहर खा लेने या कुएं में गिर कर जान दे देने जैसी दिल दहलाने वाली घटनाएं।

किसानों की आत्महत्या में हुआ है 40 फीसदी का इजाफा

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2014 से 2015 के बीच किसानों की आत्महत्या के मामले 40 फीसदी बढ़ गए। 2014 में 5650 तो 2015 में ये आंकड़ा 8000 को पार कर गया. सबसे ज्यादा मौतें क्रमशः महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और मध्यप्रदेश में दर्ज की गईं। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा इलाके की दास्तान तो हिला देने वाली है, जहां 2016 में पहले चार महीनों में ही 400 से ज्यादा किसानों ने फसल की बरबादी, सूखे और कर्ज की बेइंताही में मौत को गले लगा लिया। 80 फीसदी आत्महत्या के मामले कर्जे न चुका पाने से जुड़े थे। ज़्यादातर किसान बैंकों के कर्जदार थे। और ये सिलसिला पिछले दो या तीन साल का नहीं है।

2012 में 13,754, 2011 में 14,207 और 2010 में 15,963 किसानों ने आत्महत्याएं की। 1993 से 2013 की अवधि में करीब तीन लाख किसानों ने अपनी जान ली। रही हिंसा की बात, तो इन्हीं दिनों पिछले साल मध्य प्रदेश के मंदसौर में छह किसान पुलिस गोलीबारी में मारे गए थे।

स्वामीनाथन आयोग लागू करने में सभी राजनीतिक दल फिसड्डी

किसान संगठनों का कहना है कि सरकार ने स्वामीनाथन आयोग रिपोर्ट को अभी तक लागू नहीं किया है। यहां जानिए स्वामीनाथन कमेटी और उसके दवारा की गई सिफारिशों के बारे में

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किसानों की आर्थिक हालत को बेहतर करने के उद्देश्य से 18 नवंबर 2004 को केंद्र सरकार ने एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन किया गया था। प्रोफेसर एमएस स्वामीनाथन को अपने देश में हरित क्रांति का जनक कहा जाता है। स्वामीनाथन जेनेटिक वैज्ञानिक हैं। इस आयोग ने दिसंबर 2004 से अक्टूबर 2006 के बीच सरकार को पांच रिपोर्ट सौंपी थीं।

नेता लोग सिर्फ भाषण में किसान बोलते हैं

75 वर्षीय सीताराम धुले भूमिहीन किसान हैं और खेती में बढ़ते संकट की वजह से सात लोगों के परिवार का पालन पोषण अब मुश्किल हो गया है। सीताराम ने बताया, ‘हमारे पास इतनी ही ज़मीन है कि दो से तीन कमरों का मकान बन सकता है। हम भूमिहीन किसान है और हमारी समस्या भूमि वाले किसानों से ज्यादा दयनीय है, लेकिन सरकार कुछ नहीं सोच रही है। मेरा बेटा भी किसान है और उसके दो बच्चे हैं। खेतिहर मजदूरी करके पालन पोषण नमुमकिन है।

किसान अपनी मांगों को लेकर कई बार और कई सरकारों के सामने जाता है, लेकिन उसे सिर्फ आश्वासन मिलता है। नेता लोग भाषण में किसान बोलते हैं और ज़मीन पर हिंदू-मुसलमान करते हैं। हमें तो ऐसा लगता है इस सरकार ने हमें ठग लिया है। हमें उचित फसलों की कीमत, स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाएं चाहिए, लेकिन ये सिर्फ महज चुनावी नारा साबित हो जाता है।

 


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