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जयंती विशेष: किशन महाराज के तबले की थाप सुनकर हर कोई हो जाता था नि:शब्द

icon अमितेष युवराज सिंह | 0
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| सितंबर 3 , 2018 , 07:35 IST

संत कबीरदास की कर्मस्थली कबीरचौरा में श्रीकृष्ण जन्माष्मी के दिन जन्मे किशन महाराज भगवान श्रीकृष्ण की तरह कई कलाओं में निपुण तो मिजाज कबीर जैसा ही मिला। इनका जन्म 3 सितंबर 1923 को हुआ। माटी की तासीर का ही असर कहेंगे कि उनके स्वभाव में सहजता के साथ ही फक्कड़पन और अक्खड़पन भी समाया। पिता पं. हरि महाराज और ताऊ पं. कंठे महाराज ने तबले पर थाप देना सिखाया तो विरासत में मिली कला साधना से शीर्ष को छूते हुए पद्मविभूषण पाने वाले देश के पहले तबला वादक बने।

संगीत-कला की नगरी के हर रंग को सहेजा-संजोया, जिया और विराट व्यक्तित्व का निर्माण किया। देश का कौन शीर्ष कलाकार न रहा जिसके साथ उन्होंने मंच साझा नहीं किया लेकिन, जहां कुछ खला, उससे समझौता नहीं किया।

न तालसाजी का जोड़, न गहरेबाजी का तोड़

गोडंती गोड़ाय, बेरूआ ठिलाय

लै कनैती सनकाय, चरपनी अरसेठ

हाथ लउजर ढेकनियन के

केतनन के रेख गई, नखरे देखाय

ठोलियो होय जाय, पर बनी रहे बालिका

इनके देख के खेउरियाए में भलाई यार

बेरूई बजार से बचावे माई कालिका

यह कोई शब्द पहेली नहीं एक हिस्सा है ख्यात तबला सम्राट पंडित किशन महाराज की उन्मुक्त बैठकी की बतकही का जिसमें वह वारवनिताओं के बाजार से खबरदार कर रहे हैं अपने यारों दिलदारों को। पंडित जी के साथ पिपलानी कटरा पर अक्सर ही अड़ी जमाने वाले पं. श्रीनारायण मिश्र बताते हैं कि ताल साधना के साथ ही 'किशन चच्चा' अन्य विषयों पर भी नित नए अनुसंधान किया करते थे। यह टुकड़ा भी काशी में भारतेंदु पूर्व की हिंदी पर उनके विशेष शोध की एक कड़ी ही है।

कुश्ती और गहरेबाजी के भी थे शौकीन

शौकीन इतने थे कि कुश्ती में हाथ आजमाते। कुत्ते पालने का भी शौक ऐसा कि शायद ही उनसे कोई नस्ल छूटी हो। इनके बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि ये अपने कपड़े को इस तरह से तह कर रखते कि देखकर लगता था कि कपड़ा में तुरंत ही प्रेस हुआ हो। बड़ी ही बारीकी से अंदाज में पानदान सजाते। बीड़ा लगाते तो खाना भी शानदार बनाते। मिठाई का शौक इतना की चाय-दूध में पांच चम्मच तक चीनी तो दोनों पहर खाने के बाद मिठाई खाते।

तबले की आरंभिक यात्रा

तबले की आरंभिक यात्रा के कुछ साल बाद ही उस्ताद फैय्याजखान, पंडित ओंकार ठाकुर, उस्ताद बड़े गुलाम अलीखान, पंडित भीमसेन जोशी, वसंत राय, पंडित रविशंकर, उस्ताद अली अकबर खान जैसे बड़े कलाकारों के साथ संगत की। नृत्य की दुनिया के महान हस्ताक्षर शंभु महाराज, सितारा देवी, नटराज गोपी कृष्ण और बिरजू महाराज के कार्यक्रमों में भी उन्होंने तबले पर संगत की।

किशन महाराज को वर्ष 2002 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया था। उन्हें वर्ष1973 में पद्मश्री, वर्ष 1984 में केंद्रीय संगीत नाटक पुरस्कार, वर्ष 1986 में उस्ताद इनायत अली खान पुरस्कार, दीनानाथ मंगेशकर पुरस्कार और तालविलास के अलावा उत्तरप्रदेश रत्न, उत्तरप्रदेश गौरव भोजपुरी रत्न, भागीरथ सम्मान और लाइफ टाइम अचीवमेंट सम्मान से भी नवाजा गया।

किशन महाराज 3 सितम्बर 1923 की आधी रात को ही इस धरती पर आए थे और 4 मई, 2008 की आधी रात को ही वे इस धरती को छोड़, स्वर्ग की सभा में देवों के साथ संगत करने हमेशा के लिए चले गए। उनके जाने से भारत ने एक युगजयी संगीत दिग्गज को खो दिया।


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अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं

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