ख़ास रिपोर्ट

पार्टियां सोशल मीडिया से लड़ेंगी लोकसभा चुनाव! IT सेल से जीतेंगी 90 करोड़ वोटरों का दिल...

आशुतोष कुमार राय, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| मार्च 15 , 2019 , 09:51 IST

तकनीक के बदलते आयामों का प्रयोग जनता को लुभाने और जनता तक अपना संदेश भेजने में इस तरह से किया जाएगा ये बात आज से दस साल पहले किसी ने कल्पना भी नही की होगी। वर्तमान में बदलते परिवेश में सोशल मीडिया और तमाम तकनीकी साधनों के प्रयोग से विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का चुनाव लड़ा जाने वाला है।

इस चुनाव पर बड़े-बड़े प्रयोग भी सामने आएंगे या आ रहे हैं और दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक लड़ाई में न सिर्फ राजनीतिक पार्टियां अपने मुद्दों पर ताकत दिखाएंगी बल्कि ये लड़ाई Twitter और बाकी सोशल मिडिया की होगी। जिसे पार्टियों ने अपना IT सेल का नाम दे दिया है।

जिस तरह से सोशल मीडिया पर खबरों की बौछारें की जा रहीं हैं खबरों के पीछे की सच्चाई तक को जान पाना मुश्किल होने लगा है। जी हां पीआर की पीछे बने फेक न्यूज को भी जमकर चलाया जा रहा है। 2019 में ये भी तय होगा कि व्हाट्सएप्प ग्रुपों में सरकार बनाने या बदलने की ताकत है कि नहीं। मतलब 2019 में सोशल मीडिया ही तय करेगा कि अगले 5 साल के तक कौन देश पर राज करेगा।

Facebook, Twitter, Whatsapp और फेक न्यूज के जरिए अपने वोटरों को लुभाने की जुगत भी शुरु हो चुकी है। बीजेपी या कांग्रेस। मोदी या राहुल या उत्तर प्रदेश से जन्म लिया महागठबंधन... कांग्रेस अभी तीन राज्यों की विधानसभा जीत कर पूरी उत्साहित है और बीजेपी को अभी भी मोदी मैजिक पर ही भरोसा है।

50 करोड़ वोटर्स के पास इंटरनेट-:

भारत में कुल 90 करोड़ वोटर्स हैं और वो वोट देकर यह तय करते हैं कि कौन उन पर शासन करेगा। 90 करोड़ वोटर्स में से लगभग 50 करोड़ वोटर्स के पास इंटरनेट की पहुंच है। डाटा रिसर्च फर्म IndiaSpend के मुताबिक 30 करोड़ वोटर्स फेसबुक से और लगभग 20 करोड़ वोटर्स व्हाट्सएप्प से जुड़े हैं। यह दुनिया के किसी भी लोकतंत्र से ज्यादा है। करोडों वोटर्स के पास ट्वीटर की पहुंच है।

आईटी सेल पर दोनों पार्टी करोड़ों कर रही खर्च-:

सोशल मीडिया और डेटा एनालिटिक्स 2019 के आम चुनाव में अहम फैक्टर साबित होंगे। दोनों ही बड़ी पार्टियां इस दोनों ही टूल्स का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करती है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही पार्टी की आइटी सेल जी-जान से प्रोपेगेंडा और इलेक्शन कैंपेनिंग की तैयारी पिछले एक साल से कर रही है। अब तो रीजनल पार्टियां भी अपने आईटी सेल बना कर प्रोपेगेंडा और इलेक्शन कैंपेन करने लगी है।

मसलन यूपी में अखिलेश की समाजवादी पार्टी। ऑस्ट्रेलिया के मेलबॉर्न की डेक्किन यूनिवर्सिटी की जनसंचार विभाग की प्रोफेसर उषा एम. रॉड्रिग्स जो भारतीय राजनीति पर इन दिनों रिसर्च कर रही हैं, कहती हैं कि सोशल मीडिया के जरिये फेक न्यूज का प्रसार कर राजनीतिक पार्टियां बड़े पैमाने पर वोटर्स के मूड को बदलने का काम कर रही है। सोशल मीडिया पर फेक न्यूज का जहर आसानी से वोटरों को गुमराह कर रहा है।

फेक न्यूज से पिछले साल 30 मौतें-:

डाटा एनालिटिक्स की चर्चित पोर्टल IndiaSpend के मुताबिक सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल सबसे ज्यादा हो रहा है। सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल सबसे ज्यादा फेक न्यूज फैलाने के लिए हो रहा है। आग लगाने वाली खबरें औऱ वीडियो को फैला कर धार्मिक औऱ सांप्रदायिक हिंसा कराने के लिए। IndiaSpend के आंकड़ों के मुताबिक 2017-18 में व्हाट्सएप पर न्यूज और फेक वीडियो की वजह से 30 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।

राजनीतिक पार्टियों के लिए फायदेमंद साबित हो रही फेक न्यूज:-

सोशल मीडिया पर जो बहस और प्रवचन का अभी कड़वा दौड़ चल रहा है वो धीरे -धीरे चिड़चिड़ेपन की हद तक जा रही है। 2019 चुनाव में यह सिर-फुटौव्वल तक पहुंच जाएगी। ऐसा वाशिंगटन स्थिक कार्नेज इंटरनेशनल पीस के सीनियर रिसर्च फेलो मिलान वैष्णव मानते हैं।

पक्ष हो या विपक्ष दोनों ही पार्टियों को सोशल मीडिया पर खूनी लड़ाई कराने में मजा आता है और ये उनके राजनीति के लिए फायदेमंद भी साबित हो रहे हैं। हालांकि दोनों ही मुख्य पार्टियां बीजेपी और कांग्रेस एक दूसरे पर फेक न्यूज चलाने-फैलाने, आग लगाने, दंगा भड़काने का आरोप लगाते रहती है और अपने उपर जवाबदेही लेने से इंकार करते रहती है।


कौन है सोशल मीडिया पर ताकतवर, बीजेपी या कांग्रेस-:

2019 के लिए लड़ाई का बैटल ग्राउंड दोनों ही पार्टियां पहले ही तैयार कर चुकी है। कांग्रेस यानि राहुल पीएम मोदी की आर्थिक नीतियों, नोटबंदी-जीएसटी पर हमला कर रही है, भ्रष्टाचार के मुद्दे राफेल को भुनाने की कोशिश कर रही है। हिंदू राष्ट्रवाद पर आक्रमण कर रही है। वहीं बीजेपी का एकसूत्री मुद्दा या कहे एजेंडा यह है कि कांग्रेस को देश के लिए नाकारा साबित करना।

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बीजेपी हमेशा यही प्रचार करते रहती है कि कांग्रेस से जनता का मोहभंग हो चुका है और देश कांग्रेस मुक्त होना चाह रही है। लेकिन बीजेपी के इस कांग्रेस मुक्त नारे को तगड़ा झटका लगा है। 2019 के फाइनल लड़ाई से पहले कांग्रेस हिन्दी हार्ट लैंड के तीन बड़े राज्यों को जीत कर बीजेपी के हौसले को पस्त कर चुकी है।

तीन राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने यह साबित कर दिया है कि 2019 की लड़ाई में कांटे की टक्कर होगी। 2019 की लड़ाई से पहले बीजेपी को यह भी पता चल गया होगा कि जिस सोशल मीडिया के दम पर उसने 2014 का चुनाव जीता था आज उसी सोशल मीडिया के दम पर कांग्रेस ने बीजेपी को मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में करारी शिकस्त दी है।

वार रुम के पीछे का सच-:


पिछले 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस को टेक्नो सैवी नरेंद्र मोदी ने धूल चटा दी थी। नरेंद्र मोदी ने 2014 में सोशल मीडिया को ही हथियार बना कर वोटर्स को अपने पक्ष में किया था। मोदी ने अपने ट्वीटर अकाउंट से कई आक्रामक ट्वीट कर कांग्रेस पर हमला किया था।

बीजेपी ने 2014 में मोदी को एक ब्रांड बना दिया था और इसके लिए सोशल मीडिया का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा था। गांवों में मोदी के होलोग्राफिक डिस्पले लगाए गए थे। चाय के स्टॉल पर मोदी के प्रचार हो रहे थे और कांग्रेस पर ताबड़तोड़ हमले किए गए थे। 2014 की शर्मनाक हार के बाद ही 2015 में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपना ट्विटर हैंडल बनाया। और अब कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी भी सोशल मीडिया की ताकत को समझने लगे।

45 करोड़ लोगों के हाथ में स्मार्टफोन-:

भारत में अभी 45 करोड़ लोगों के हाथ में स्मार्टफोन है। 2014 में महज 15 करोड़ के लोगों के हाथ में स्मार्टफोन था और उसी 15 करोड़ स्मार्टफोन के दम पर नरेंद्र मोदी ने खुद को भारत का सबसे ताकतवर ब्रांड स्थापित किया और देश की सत्ता हासिल की।

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अभी भारत में जितने लोगों के पास स्मार्टफोन हैं वो अमेरिका की पूरी आबादी से भी ज्यादा है। जाहिर है 2019 में भी 45 करोड़ स्मार्टफोन के जरिये ही देश की सत्ता हासिल की जाएगी। जो सोशल मीडिया पर सबसे ताकतवर होगा पीएम की कुर्सी भी उसी के नाम होगी। जो प्रोपेगैंडा फैलाने में, फेक न्यूज फैलाने में माहिर होगा वही चुनाव जीतेगा।

दुनिया की जानी मानी न्यूज एजेंसी रॉयटर के संवाददाता ने राजस्थान की चुनाव में रिपोर्टिंग के दौरान जब जयपुर में कांग्रेस आईटी सेल के वार रूम का दौरा किया तो वो चौंक गए। तीन बेडरूम के एक फ्लैट में कांग्रेस का वार रूम था। तीन लोगों की टीम थी। जिसमें ऑडियो-वीडियो एक्सपर्ट, ग्राफिक डिजाइनर और सोशल मीडिया के एक कार्यकर्ता काम कर रहे थे।

कमरे की दीवारों पर टंगे दर्जनों टीवी स्क्रीन पर सभी नेशनल और रीजनल न्यूज चैनल के साथ-साथ ट्विटर, फेसबुक और व्हाट्सएप अकाउंट भी हैंडल किए जा रहे थे। कई वॉलिएंटियर्स व्हाट्सएप पर लगाए गए थे जिनका काम ग्रुप में पार्टी के इलेक्शन कैंपेन को शेयर करना था। वर्कर्स से चैट करना था।

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर मोदी को हराना मुश्किल-:

राजस्थान कांग्रेस के वार रूम या कहें आईटी सेल को मैनेज कर रहे मनीष सूद ने कई ऐसे तथ्यों के खुलासे किए जो काफी चौंकाने वाले थे। मनीष सूद ने कहा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर मोदी से फाइट करना आसान नहीं होगा कांग्रेस के लिए। फेसबुक पर मोदी के 4.5 करोड़ फॉलोअर्स हैं। दुनिया के सबसे ज्यादा फॉलो करने वाले टॉप 10 वर्ल्ड लीडर में नरेंद्र मोदी का नाम शुमार है। जबकि कांग्रेस के राहुल गांधी के ट्वीटर पर महज 80 लाख और फेसबुक पर 20 लाख फॉलोअर्स हैं।

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कांग्रेस अब धीरे-धीरे सोशल मीडिया की ताकत को महसूस करने लगी है। कांग्रेस के पास वर्कर्स और वालिएंटियर्स की भी कमी है। बीजेपी ने हर शहर में दर्जनों व्हाट्सएप ग्रुप बना रखे हैं। बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह का एक वीडियो भी वायरल हुआ था जिसमें वो कार्यकर्ताओं को व्हाट्सएप ग्रुप पर ज्यादा से ज्यादा फेक न्यूज फैलाने की अपील कर रहे थे।

बढ़ रही है Whatsapp की ताकत-:

2014 में Twitter और Facebook से नेताओं ने चुनावी लड़ाई लड़ी थी। मगर 2019 में नेताओं की पहली च्वाइस Whatsapp ही बनेगी। Whatsapp नेताओं के लिए चुनाव में सबसे पावरफुल सोशल मीडिया टूल बनते जा रही है। अभी राजस्थान के चुनाव में जयपुर और टोंक विधानसभा में कांग्रेस ने Whatsapp ग्रुप के जरिये ही इलेक्शन का प्रचार किया। चुनाव प्रचार के पारंपरिक तरीके रैली और भाषण से नहीं Whatsapp ग्रुप ने कांग्रेस को राजस्थान में जीत दिलाई।

कांग्रेस के आईटी सेल के हेड ने बताया कि कांग्रेस के वॉलिएंटर्स ने 90,000 Whatsapp ग्रुप बनाकर हर विधानसभा क्षेत्रों में ऑनलाइन प्रचार किया। जबकि बीजेपी के 15 हजार Whatsapp ग्रुप थे। लेकिन Whatsapp ग्रुप को लेकर साइबर पुलिस और कानून व्यवस्था को लेकर कई विवाद होते रहे हैं।

Whatsapp पर फेक वीडियो औऱ मैसेज चला कर कई जगह दंगे और हिंसा कराए जा चुके हैं। भारत में ही फेक बच्चों के अपहरण की खबरें चलाकर किस तरह बंगाल में हिंसा कराई गई। ब्राजील में अक्टूबर महीने में संपन्न हुए चुनाव में तो Whatsapp को बैन कर दिया गया था।

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जयपुर के सीनियर पुलिस अधिकारी नीतीन दीप ने रॉयटर के संवाददाता को बताया कि Whatsapp ग्रुप को मॉनिटर करने के लिए इलेक्शन में जयपुर पुलिस ने 10 पुलिस अधिकारियों का स्पेशल साइबर सेल बना कर रखा था। दूसरे देशों में जहां किसी भी मैसेज को Whatsapp के 20 ग्रुपों में शेयर किया जा सकता है, वहीं भारत में इसकी लिमिट 5 ग्रुप है।

राज्य में कहीं कोई धार्मिक और सांप्रदायिक हिंसा न फैले, इसके लिए Whatsapp के कंटेट और मैसेज को 24 घंटे मॉनिटर किया जाता था। पुलिस अधिकारी ने बताया कि इलेक्शन प्रचार के दौरान एक Whatsapp वीडियो बड़ी तेजी से वायरल हुआ कि एक कांग्रेस नेता की रैली में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे। लेकिन बाद में जांच के बाद पता चला कि वो डॉक्टर्ड और फर्जी वीडियो था।

 


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