मनोरंजन

Movie Review: संजू बाबा का भूमि में कमजोर कमबैक, कहानी भी कर सकती है निराश

icon अमितेष युवराज सिंह | 0
2155
| सितंबर 22 , 2017 , 11:55 IST

फिल्मकार ओमंग कुमार के निर्देशन में बनी संजय दत्त के अभिनय से सजी फिल्म 'भूमि' आज सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। फिल्म को लेकर दर्शकों के बीच पहले से ही काफी उत्सुकता बनी हुई हैं। जेल से छुटने के बाद यह संजय दत्त की पहली फिल्म है, और शायद इसीलिए फैंस के साथ-साथ यह खुद उनके लिए भी बेहद खास है। बॉलीवुड की अब तक की तासीर को देखते हुए ‘भूमि’ पहले पहल थोड़ा उदास करती है। वही रेप और फिर बदले की कहानी। हाल ही हम इस थीम पर रवीना टंडन की ‘मातृ’ और श्रीदेवी की ‘मॉम’ देख चुके हैं। वहां मां थी, यहां पिता है।

कहानी-

पिता और बेटी की कहानी है भूमि। साधारण और एक दुसरे से बेहद प्यार करने वाले अरुण सचदेव (संजय दत्त) और भूमि (अदिति हैदरी) आगरा में जहाँ रहते हैं वहां इनका जूते का छोटा सा बिज़नेस है। बाप बेटी के नोक झोक, जिगरी दोस्त ताज (शेखर सुमन) के सज़ाक यह परिवार हँसता खिलखिलाता। उनकी जिंदगी बदल जाती है जब भूमि से शादी से ठीक एक दिन पहले गैंग रेप का शिकार हो जाती है। शादी का टूट जाना, अदालत की नाइंसाफी और समाज के तानों को सहने के बाद बाप-बेटी आपने हक की लड़ाई का खुद फैसला करते हैं और अंत में दोषियों को अपने तरीके से सजा देते हैं।

अभिनय:-

लंबे समय के बाद पर्दे पर वापसी कर रहे संजय दत्त ने एक बार फिर अपनी इस फिल्म में गर्मजोशी के साथ एंट्री ली है। उन्होंने साबित कर दिया कि कुछ वक्त तक अभिनय जगत से दूर रहने के बाद भी उनकी एक्टिंग पर कोई असर नहीं पड़ता। फिल्म में अदिति राव हैदरी की एक बेटी की भूमिका में शानदार दिखी हैं। वहीं संजय दत्त के पड़ोसी के रोल में शेखर सुमन ने ठीक ठाक काम किया है। फिल्म में शरद केलकर ने विलेन की भूमिका को बेहद जबरदस्त ढंग से पर्दे पर उतारा है।

कमजोर कड़ियां-

इस फिल्म की कहानी काफी कमजोर है। आपको पता रहता है कि अगले सीन में क्या होने वाला है। सरप्राइज एलिमेंट बहुत ही कम है। फिल्म के संवाद भी ठीक ठाक ही हैं। स्क्रीनप्ले को और बेहतर किया जा सकता था। फिल्म का कोई भी गाना हिट नहीं हुआ है, उस पर और मेहनत करनी चाहिए थी। वहीं अदालत में लड़की की विर्जिनिटी का तर्क देना, बारात का वापस चले जाना, पड़ोसियों का ताना देना और विलेन का आइटम गाने पर शराब पीकर झूमना, थोड़ा घिसा पीटा लगा। फिल्म देखकर ऐसा नहीं लगेगा कि आप कुछ भी नया देख रहे हैं सिवाय संजय दत्त की दमदार एक्टिंग के। फिल्म का फर्स्ट हाफ अच्छा है, लेकिन सेकंड हाफ कुछ कमाल नहीं दिखा पाता। मुद्दों के आधार पर फिल्म सोचने पर विवश भी करती है।

क्यों देखें फिल्म:

फिल्म का डायरेक्शन, आर्ट वर्क, सिनेमेटोग्राफी और लोकेशंस कमाल के हैं। संजय दत्त का एक अरसे के बाद पर्दे पर आना और उसी गर्मजोशी के साथ उम्दा प्रदर्शन देना काबिल- ए तारीफ है। यह काफी इमोशनल फिल्म है। संजय दत्त ने उम्दा अभिनय किया है। साथ ही अदिति राव हैदरी का काम भी काफी बढ़िया है। संजय दत्त के दोस्त के रूप में शेखर सुमन ने ठीक ठाक अभिनय किया है, वहीं विलेन का रोल शरद केलकर ने जबरदस्त किया है।


author
अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं

कमेंट करें