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पत्रकारिता के छात्रों के लिए बेहद उपयोगी है एस श्रीकांत की किताब 'स्टिंग ऑपरेशन: सिद्धांत एवं व्यवहार'

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| सितंबर 9 , 2018 , 20:22 IST

पत्रकारिता और लेखन क्षेत्र के चर्चित नाम डॉ. एस. श्रीकांत की अभी तक कुल सात पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। उनके द्वारा लिखी गई स्टिंग ऑपरेशन: सिद्धांत एवं व्यवहार को अपार सफलता मिली। वहीं भारत और वंशवादी परंपरा किताब पुस्तक प्रेमियों के दिलों-दिमाग पर गहरी छाप छोड़ने में कामयाब रही।

अभी हाल ही में प्रकाशित हुई क्रिकेटः कल आज और कल को समीक्षकों एवं पाठकों की खूब वाहवाही मिली। लेकिन ऐसा नहीं है कि उन्होंने सिर्फ सब्जेक्टिव पुस्तकें ही लिखीं हो’’गुजरे दिन कभी गुजरे नहीं’’ तथा ’’आशियाना’’ जैसे कविता संग्रह और वेटरन एक्टर तथा एथलीट्स रहे प्रवीण कुमार पर फोकस करती ’’महाभारत का भीम’’ भी लिखी। 

फिलहाल अभी भी वो हिंदी सिनेमा एक खोज विषय पर काम कर रहे हैं। उनकी इस बुक में सिनेमा से संबंधित सम्पूर्ण जानकारी होगी। इसके अतिरिक्त एक उपन्यास ‘‘मीरा’’ भी लिखा है। इसकी प्रूफरीडिंग का काम अभी बाकी है। उनके अनुसार यह उपन्यास चार महिलाओं की जिंदगी पर केन्द्रित है और वो आशा करते हैं कि बाकी पुस्तकों की तरह यह भी पाठकों को पसन्द आयेगी। गौरतलब है कि उनकी जिन दो पुस्तकों को अधिक लोकप्रियता मिली, वह सब्जेक्टिव थी। इसी कारण लोगों को लगता है कि श्रीकांत सिर्फ सब्जेक्टिव पुस्तकें ही लिखते हैं, जबकि सच्चाई इससे परे हैं।

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इसके साथ ही वह कहते हैं कि विषय आधारित पुस्तकें लिखने का एक कारण, पत्रकारिता से जुड़ा होना भी रहा। वंशवादी परंपरा तथा स्टिंग ऑपरेशन अच्छे मुद्दे लगे, उन्हें लगा कि पाठक इन विषयों को जरूर पढे़गें और हुआ भी कुछ ऐसा ही। भारत और वंशवादी परंपरा तथा स्टिंग ऑपरेशन सिद्धांत एवं व्यवहार को जापान और चीन के पाठकों ने भी खूब पढ़ा। पंसदीदा लेखकों की बात करें तो मुंशी प्रेमचन्द्र, अमृता प्रीतम तथा शरत बाबू का रचनात्मक लेखन उन्हें आकर्षित करता है। उनके द्वारा गढ़े गये चरित्र इतिहास के पन्नों पर अमिट छाप छोड़ गये। शरत बाबू की तरह अमर प्रेम कहानी लिखने की हसरत अभी बाकी है।

किस लेखक को अधिक पढ़ते हैं इसके जवाब में उन्होंने कहा कि किसी लेखक के विचारों को पढ़ने का प्रतिबंध नहीं। सामने जो भी किताब आ जाती है, उसे पढ़ लेता हूं। वह किसी युवा लेखक ने लिखी हो या फिर प्रौढ़ द्वारा लिखी गई हो। वहीं आगे वो कहते हैं कि लेखन क्षेत्र में आनेवाले युवाओं को पढ़ने की आदत को दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए। बिना पढ़े लिखने से लेखन में श्रेष्ठता हासिल नहीं की जा सकती। लिखने का निरंतर प्रयास करते रहे। आपके द्वारा लिखी गई कृति को प्रकाशक शुरूआत में अस्वीकार करें तो भी हताश होकर लिखना न छोड़ें। धैर्य बनायें रखें। लिखते समय इस बात का अवश्य ख्याल रखें कि आपका लेखन राष्ट्रहित में हो, किसी व्यक्ति अथवा समुदाय को आहत पहुंचाने वाले लेखन कार्य से बचना चाहिए।

पत्रकारिता और निजी लेखन के अंतर पर उन्होंने कहा कि पत्रकारिता में समय का दबाव रहता था। डेडलाईन से पहले ही स्टोरी एडिटोरियल टीम को देनी होती है। पुस्तक लेखन आजादी से किया जाने वाला कार्य है। समय की पाबंदी नहीं। जब इच्छा हुई लिख लिया, मन नहीं किया तो पन्द्रह दिन तक लेखन से दूरी बना ली। पुस्तक में मनमाफिक तरीके से काम किया जाता है। पत्रकारिता में संस्थान और संपादक की नीति के कारण कई बार स्थिति अनुकूल नहीं रहती। पुरस्कार लौटाने की बात को सिरे से खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि पुरस्कार के लिए अभी तक किसी ने योग्य समझा ही नहीं तो लौटाने का प्रश्न ही नहीं उठता। मेरा निजी मत है कि किसी लालसा में लिखा गया कार्य कभी सर्वश्रेष्ठ नहीं हो सकता। जब तक आपका लेखन कार्य सर्वश्रेष्ठ नहीं होगा, पाठकों को आकर्षित नहीं कर सकते। पाठकों की प्रतिक्रिया किसी भी पुरस्कार से कहीं बड़ी है। 


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