बिज़नेस

बजट 2018: सुनिए वित्त मंत्री जी! ये है आम लोगों की 25 उम्मीदें

सतीश वर्मा, न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
1338
| जनवरी 8 , 2018 , 17:24 IST

आम बजट में क्या टैक्स कम किए जाएंगे? संसद में फाइनांस बिल पेश किए जाने से पहले के हफ्तों में यह संभवत: सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला सवाल है। वित्त वर्ष 2018-19 के लिए आम बजट 1 फरवरी को पेश किया जाएगा और अभी से इसकी तैयारियां शुरू हो गई हैं। जहां वित्त मंत्री अरुण जेटली बजट की तैयारियों में लगे हैं वहीं दूसरी ओर लोगों की भी उम्मीदें बढ़ी हुई हैं।

टैक्स को लेकर हमारे देश में काफी चर्चा होती है, लेकिन चौंकानेवाला तथ्य यह भी है कि आबादी के केवल 3 पर्सेंट (4.1 करोड़ भारतीय) लोगों ने 2014-15 में इनकम टैक्स रिटर्न फाइल किया था। केवल 1.6 पर्सेंट लोगों ने इनकम टैक्स चुकाया था। रिटर्न फाइल करनेवाले हर दो में से एक भारतीय ने जीरो टैक्सेबल इनकम घोषित की थी।

Jaitley

उद्योग जगत कॉरपोरेट टैक्स घटने के इंतजार में

अर्थव्यवस्था को सुस्ती से उबारने के लिए अगर सरकार से सार्वजनिक खर्च के स्तर को बनाए रखने की उम्मीद की जा रही है तो उद्योग जगत आगामी बजट में कॉरपोरेट टैक्स घटाने का रोडमैप मिलने के इंतजार में है। उद्योग संगठनों का मानना है कि आगामी बजट में सरकार को कॉरपोरेट टैक्स में कम से कम दो फीसद की कमी करके इस रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए।

कॉरपोरेट टैक्स में 2 फीसदी की हो कटौती

वित्त मंत्री अरुण जेटली के साथ बजट पूर्व हुई बैठक में भी उद्योग संगठनों ने इसका प्रस्ताव रखा है। वित्त मंत्री ने 2015-16 का बजट पेश करते हुए कॉरपोरेट टैक्स की दर को 30 फीसद से घटाकर 28 फीसद पर लाने का एलान किया था। यह काम चार वर्ष में किया जाना था। हालांकि इसके तहत उद्योगों को मिल रही सभी तरह की टैक्स रियायतों को समाप्त करने का प्रावधान भी था। इस दिशा में सरकार कुछ आगे बढ़ी और वित्त विधेयक में कई रियायतों और छूटों को समाप्त कर केवल घरेलू कंपनियों के लिए कॉरपोरेट टैक्स की दर को 29 फीसद पर ला दिया गया। यह लाभ भी उन्हीं कंपनियों को मिला जिनका रेवेन्यू साल 2014-15 में पांच करोड़ रुपये तक था।

इस साल करदाताओं को बजट से कहीं ज्यादा उम्मीदें हैं क्योंकि 2018 में पांच राज्यों में और 2019 में तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। कई अर्थशास्त्रियों को डर है कि सरकार लोकप्रिय बजट पेश कर सकती है।
वित्त मंत्री और उनकी टीम बजट तैयार करने में जुट गए हैं। ऐसे में हमने ऐसे 25 उपायों की लिस्ट बनाई है, जिन्हें फाइनैंशल सर्विसेज इंडस्ट्री के एक्सपर्ट्स फाइनांस बिल 2018 में देखना चाहेंगे।

1. एजुकेशन लोन डिडक्शन की अवधि बढ़ाएं

सेक्शन 80ई के तहत किसी क्वॉलिफाइड लेंडर से लिए गए एजुकेशन लोन के लिए चुकाए गए ब्याज पर टैक्स डिडक्शन क्लेम किया जा सकता है, लेकिन यह बेनिफिट केवल आठ वित्त वर्षों तक ही उपलब्ध है। 2006 में जब इस डिडक्शन को लागू किया गया था तो चार साल के इंजिनियरिंग कोर्स की लागत लगभग 3-4 लाख रुपये थी और मेडिकल डिग्री लेने का खर्च लगभग 5-6 लाख रुपये था। हायर एजुकेशन की लागत तबसे काफी बढ़ी है। आज इंजिनियरिंग कोर्स की लागत करीब 8-9 लाख और मेडिकल डिग्री की 12-14 लाख रुपये है।

2. स्वरोजगार वाले लोगों के NPS कॉन्ट्रिब्यूशन के लिए टैक्स डिडक्शन लिमिट बढ़ाएं

सेल्फ-एंप्लॉयड टैक्यसपेयर्स एनपीएस में अंशदान पर जो टैक्स डिडक्शन क्लेम करते हैं, उसकी एक लिमिट सेक्शन 80सीसीडी(1) के तहत तय की गई है। बजट 2017 में इसे ग्रॉस इनकम के 10 पर्सेंट से बढ़ाकर 20 पर्सेंट किया गया था। इससे सैलरीड और सेल्फ एंप्लॉयड टैक्सपेयर्स के बीच समानता आई। हालांकि सेल्फ एंप्लॉयड टैक्सपेयर्स के लिए यह सेक्शन 80सीसीई के तहत 1.5 लाख रुपये के ओवरऑल डिडक्शन लिमिट के तहत आता है। दूसरी ओर कोई एंप्लॉयी अपनी इनकम के 10 पर्सेंट तक डिडक्शन सेक्शन 80सीसीडी (1) के तहत ओवरऑल लिमिट के दायरे में क्लेम कर सकता है। इसके अलावा सेक्शन 80सीसीडी (2) के तहत बिना किसी ओवरऑल लिमिट के एंप्लॉयर्स कॉन्ट्रिब्यूशन के 10 पर्सेंट तक और डिडक्शन लिया जा सकता है।

3. डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स खत्म करें

डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स कंपनियों को डिविडेंड देने में हतोत्साहित करता है। इससे निवेशकों का भरोसा प्रभावित होता है। इन्वेस्टर सेंटीमेंट मजबूत करने के लिए डीडीटी खत्म किया जाना चाहिए। सेक्शन 14 ए, रूल 8(डी) को बदलने की भी जरूर है, जिसमें एक्सपेंस के डिस-अलाउंस की बात है। डिविडेंड को 'इग्जेम्प्टेड' इनकम में शामिल करने से भ्रम पैदा होता है क्योंकि लोगों से डीडीटी के तहत पहले ही टैक्स लिया जाता है।

4. सैलरीड क्लास के लिए स्टैंडर्ड डिडक्शन की वापसी

फाइनैंस मिनिस्टर ने संकेत दिया है कि पिछले बजटों की तरह इस साल कॉर्पोरेट टैक्स घटाने की योजना है। उन्हें इंडिविजुअल टैक्स रेट्स घटाने या स्लैब लिमिट्स बढ़ाने पर भी विचार करना चाहिए। जहां अन्य लोग एक्सपेंस के डिडक्शन के बाद टैक्स चुका रहे हैं, वहीं सैलरीड क्लास से ग्रॉस लेवल पर टैक्स लिया जा रहा है। यह तो ठीक बात नहीं है। यह मसला हल करने का सबसे अच्छा तरीका 'स्टैंडर्ड डिडक्शन' को वापस लाना है। सैलरीड क्लास के लिए एक स्टैंडर्ड डिडक्शन पर्सेंटेज तय किया जा सकता है, जिससे उनके और दूसरे टैक्सपेयर्स के बीच समानता आएगी।

5. इक्विटीज पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स बेनिफिट्स बनाए रखें

कुछ इकाइयां, खासतौर से ब्रोकर्स सिक्यॉरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स को खत्म करने और इसके साथ ही इक्विटीज से लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस को मिल रहा टैक्स फ्री स्टेटस हटाने की मांग कर रहे हैं। एसटीटी घटाना तो स्वागत योग्य है, लेकिन इसे लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस के टैक्स फ्री स्टेटस से जोड़ने की कोई तुक नहीं है। अगर यह फसिलिटी हटाई गई तो इसका इक्विटी इन्वेस्टमेंट पर बुरा असर होगा।

6. इन्वेस्टमेंट गिफ्टिंग और डोनेशन को बढ़ावा दें

लिस्टेड स्टॉक्स और म्यूचुअल फंड्स जैसी सिक्यॉरिटीज के डोनेशन और गिफ्टिंग की इजाजत देने के लिए टैक्स कानूनों में बदलाव किया जाना चाहिए ताकि इन पर कोई टैक्स न लगे। गिफ्ट या डोनेशन की वैल्यू ऐक्चुअल ट्रांसफर के दिन सिक्यॉरिटीज की फेयर मार्केट वैल्यू के आधार पर कैल्कुलेट की जा सकती है।

7. इंश्योरेंस प्रॉडक्ट्स पर GST 18% से घटाकर 5% करें

जीएसटी ने टैक्स स्ट्रक्चर को सरल तो बनाया है और कई प्रॉडक्ट्स तथा सेवाओं के लिए टैक्स रेट्स में कमी भी की है। इससे ऐंड कंज्यूमर्स पर बोझ घटा है। हालांकि फाइनैंशल सर्विसेज पर टैक्स ब्रैकिट 15 पर्सेंट से बढ़ाकर 18 पर्सेंट कर दिया गया है। इससे लाइफ इंश्योरेंस प्रॉडक्ट्स महंगे हो गए हैं, खासतौर से प्योर प्रोटेक्शन और एंडोमेंट प्लान।

8. REITs के लिए LTCG होल्डिंग पीरियड घटाएं

रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स से रियल एस्टेट मार्केट और दमदार हो सकता है क्योंकि ये निवेशकों के लिए जहां नया ऐसेट क्लास ऑफर करेंगे, वहीं मौजूदा निवेशकों और डिवेलपर्स के लिए एक भरोसेमंद एग्जिट रूट भी मुहैया कराएंगे। उनमें कमर्शल रियल एस्टेट की सप्लाई बढ़ाने की क्षमता है। इससे एंप्लॉयमेंट इकोसिस्टम मजबूत होगा। हालांकि REITs को भले ही रेग्युलेटरी मंजूरी मिल चुकी है, रियल एस्टेट इंडस्ट्री में बड़ा बदलाव लाने वाले इस इंस्ट्रूमेंट की राह रुकी हुई है।

9. मेडिकल अलाउंस के लिए टैक्स फ्री लिमिट बढ़ाएं

देश में जीवन शैली में बदलावों से होने वाले और संचारी रोगों में बहुत बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही मेडिकल इन्फ्लेशन में भी इजाफा हुआ है, जो अभी 18-20 पर्सेंट सालाना की दर से बढ़ रही है। लिहाजा किसी भी औसत परिवार का मेडिकल सेवाओं पर खर्च 15,000 रुपये सालाना की मेडिकल अलाउंस लिमिट से बड़ी आसानी से जयादा हो सकता है। हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसीज में सामान्यत: कंसल्टेशन फी, मेडिसिंस और डायग्नोस्टिक्स के खर्च कवर नहीं होते हैं और लोगों को यह रकम अपनी पॉकेट से चुकानी पड़ती है।

10. होम इंश्योरेंस अनिवार्य बनाएं और प्रीमियम पर टैक्स डिडक्शन दें

मुंबई में आई बाढ़ की यादें लोगों के जेहन में अब भी ताजा हैं। होम इंश्योरेंस पॉलिसी से कई लोगों को तब फाइनैंशल मुश्किलों से बचाया जा सकता था। होम इंश्योरेंस को बढ़ावा देने के लिए सरकार को भी प्रयास करना चाहिए।

11. इंडिविजुअल रिटायरमेंट अकाउंट शुरू कराएं

80सी के तहत अधिकतर मौजूदा इग्जेम्प्शंस का फायदा लेने के लिए निवेशकों को तमाम स्कीमों और सेक्शंस खंगालने के लिए मजबूर करने के बजाय सरकार को एक अलग इंडिविजुअल रिटायरमेंट अकाउंट शुरू करना चाहिए।

12. सेक्शन 80सी में कम रिस्कवाले हाइब्रिड फंड्स शामिल करें

कई निवेशक सेक्शन 80सी के तहत बेनिफिट लेने के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट्स में पैसे लगाते हैं। हालांकि घटती ब्याज दरों के साथ अब वे बेहतर रिटर्न वाले विकल्प खंगाल रहे हैं, जिनमें अपेक्षाकृत कम जोखिम हो और टैक्स अडवन्टेज ऐसा ही हो। कंजर्वेटिव लोगों या पहली बार निवेश करने वालों के लिए सबसे अच्छा विकल्प हाइब्रिड फंड्स का है।

13. डेट फंड्स से LTCG के लिए होल्डिंग पीरियड घटाएं

निवेशकों को डेट फंड्स में निवेश करने के लिए प्रोत्साहन देने और विभिन्न ऐसेट क्लासेज में होल्डिंग पीरियड को स्टैंडर्ड बनाने के लिए लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस (LTCG) के लिए मिनिमम होल्डिंग पीरियड 36 महीनों से घटाकर 12 महीने कर दिया जाना चाहिए।

14. स्टॉक ऑप्शंस की निवेश तिथि के लिए टैक्स नियम बदलें

एंप्लॉयी स्टॉक ऑप्शन प्लान (ESOP) शेयरों के अलॉटमेंट या ट्रांसफर की सूरत में टैक्सेबल हो जाते हैं। हालांकि प्लान डिजाइन में बढ़ती जटिलता के साथ ऐसे शेयरों पर इनका अलॉटमेंट होने या इन्हें ट्रांसफर किए जाने के बाद लॉक-इन पीरियड बढ़ाया जा सकता है। लॉक-इन पीरियड खत्म होने तक टैक्स लागू न किया जाए।

15. इंडिविजुअल्स के लिए टैक्स रिटर्न फाइलिंग ऑटोमैटिक बनाएं

टैक्सपेयर्स टैक्स फाइलिंग्स के लिए ऑनलाइन पोर्टल्स का इस्तेमाल करने लगे हैं, जिनमें पर्सनल और चुकाए गए टैक्स की जानकारी टैक्स फॉर्म में दी जाती है। सरकार एक कदम और बढ़ाते हुए ऐसे प्री-पॉपुलेटेड फॉर्म टैक्सपेयर्स को भेज सकती है, जिसके साथ फॉर्म 26एएस और उनके आधार और PAN से लिंक्ड दूसरे फाइनैंशल ट्रांजैक्शंस की जानकारी भी हो।

16. रियल एस्टेट प्राइसेज घटाने के लिए इन्वेंटरी पर डिवेलपर्स से टैक्स लें

सरकार ने हाउजिंग को अफोर्डेबल बनाने के कई कदम पहले ही उठाए हैं। हालांकि रियल एस्टेट की ऊंची प्राइसेज के कारण इंडिया में अफोर्डेबिलिटी का मसला अब भी बना हुआ है। बजट में कुछ प्रतिबंधात्मक उपायों से प्रॉपर्टी प्राइसेज को वाजिब बनाने में मदद मिल सकती है। डिमांड तो कम है, लेकिन प्राइसेज ऊंची हैं क्योंकि बिल्डर्स और हाई नेटवर्थ इन्वेस्टर अपनी इन्वेंटरी डाइवेस्ट नहीं कर रहे हैं।

17. GST से तालमेल के लिए गोल्ड पर इंपोर्ट ड्यूटी घटाएं

गोल्ड को 3 पर्सेंट के स्पेशल जीएसटी स्लैब में रखा गया है। हालांकि 10 पर्सेंट की कस्टम्स ड्यूटी के चलते गोल्ड के ग्रे मार्केट को हवा मिलती है। फाइनेंशियल रिफॉर्म्स को सफल बनाने और गोल्ड का इकनॉमिक कॉन्ट्रिब्यूशन बढ़ाने के लिए इस मेटल को मेनस्ट्रीम में लाना ही होगा। इसके लिए गोल्ड पर ओवरऑल टैक्स में बदलाव होना चाहिए और कस्टम्स ड्यूटी में काफी कमी की जानी चाहिए।

18. सभी टैक्स सेविंग्स प्रॉडक्ट्स के लिए एकसमान होल्डिंग पीरियड

अभी निवेशकों को अलग-अलग लॉक-इन पीरियड्स के आधार पर टैक्स बेनिफिट्स मिलते हैं। ईएलएसएस में तीन साल का लॉक-इन पीरियड है, वहीं इक्विटी इन्वेस्टमेंट्स में लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस टैक्स बेनिफिट पाने के लिए एक साल की अवधि निश्चित है।

19. पेंशन प्लांस को टैक्स फ्रेंडली बनाएं

आरबीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, 65 साल से ज्यादा उम्र के भारतीयों का एक छोटा सा हिस्सा ही प्राइवेट पेंशन प्लांस में निवेश करता है और आबादी के एक बड़े हिस्से ने रिटायरमेंट के बाद के दिनों के लिए पर्याप्त फाइनैंशल कवरेज के लिए कोई कदम नहीं उठाया है। इसका एक प्रमुख कारण पेंशन प्लांस पर लगने वाला टैक्स है।

20. प्योर टर्म प्लांस के लिए अलग टैक्स डिडक्शन

अभी सेक्शन 80सी ब्रेकेट में काफी ओवरक्राउडिंग है। इसके दूर करने के लिए इंश्योरेंस इंडस्ट्री ने बार-बार मांग की है कि लाइफ इंश्योरेंस पलांस के लिए एक अलग टैक्स डिडक्शन लिमिट बनाई जाए। अगर यह संभव न हो तो एक अलग डिडक्शन प्योर प्रोटेक्शन प्लांस के लिए दिया जा सकता है।

21. प्रॉपर्टी पर GST रेट 12% से घटाकर 5% करें

रियल एस्टेट के लिए जीएसटी रेट सेल्स से मिलनेवाली रकम के 12 पर्सेंट के बराबर है। जीएसटी से पहले सर्विस टैक्स करीब 4.5 पर्सेंट, वैल्यू ऐडेड टैक्स 1 पर्सेंट था। इस तरह टोटल टैक्स 5.5 पर्सेंट होता था। अब कंस्ट्रक्शन मटीरियल्स की खरीद पर चुकाए गए टैक्स पर इनपुट टैक्स क्रेडिट क्लेम किया जा सकता है, जिसे जीएसटी लायबिलिटी से अजस्ट किया जा सकता है।

22. वरिष्ठ नागरिकों को कर में राहत

ब्याज दरों में गिरावट के चलते वरिष्ठ नागरिकों को बहुत नुकसान हुआ है। उनमें इक्विटी सिक्यॉरिटीज से जुड़े रिस्क उठाने की क्षमता नहीं होती। वरिष्ठ नागरिकों पर ब्याज दर में गिरावट का असर कम करने के लिए 10 लाख रुपये तक की इनकम पर फिक्स्ड इनकम इंस्ट्रूमेंट्स हेड में 75000 रुपये के डिडक्शन का लाभ दिया जाना चाहिए। उनको रूटीन मेडिकल खर्च के लिए 50,000 रुपये तक के डिडक्शन का लाभ भी दिया जा सकता है।

23. NRI को रिश्तेदारों के इलाज में डिडक्शन का लाभ दें

प्रवासी भारतीयों के लिए टैक्स के नियम निवासी भारतीयों से एकदम अलग हैं। टैक्स रिपोर्टिंग प्रोसेस बहुत लंबा है, टीडीएस रूल्स बड़े सख्त हैं और उनको सामान्य नागरिकों को मिली कुछ कर छूट का लाभ नहीं मिलता।

24. आधार लिंकेज से सेंट्रलाइज्ड KYC हो जाए

इन्वेस्टर्स ही नहीं, फाइनैंशल सर्विसेज कंपनियों के लिए भी अलग-अलग काम के लिए अलग-अलग केवाईसी प्रोसेस से गुजरना बहुत पीड़ादायक होता है। बैंक अकाउंट पहले ही होल्डर के पैन से लिंक हो चुके हैं और जल्द आधार से भी लिंक हो जाएंगे।

25. NPS का 60% हिस्सा टैक्स-फ्री हो

हाल के वर्षों में सरकार ने नैशनल पेंशन स्कीम में निवेश के लिए टैक्स में कई तरह की छूट दी है, फिर भी इसको उतनी लोकप्रियता हासिल नहीं हो पाई है जितनी सरकार उम्मीद कर रही थी। इसकी सबसे बड़ी वजह रिटायरमेंट के वक्त एनपीएस कॉरपस पर लगने वाला टैक्स है। 60 साल की उम्र में एनपीएस की 60 पर्सेंट रकम निकाली जा सकती है, लेकिन इसमें सिर्फ 40 पर्सेंट विदड्रॉल ही टैक्स फ्री है जबकि बाकी 20 पर्सेंट पर इनकम मानकर टैक्स वसूला जाएगा।

 


कमेंट करें