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जेब में 500 रुपये लेकर मुंबई आए थे धीरूभाई, खड़ी कर दी 75000 करोड़ की कंपनी,जानें कैसे

icon अमितेष युवराज सिंह | 4
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| दिसंबर 28 , 2017 , 19:02 IST

'बड़ा सोचो, जल्दी सोचो और दूसरों से आगे सोचो'। सोच पर किसी एक का अधिकार नहीं हो सकता है। ऐसा रिलायंस समूह के संस्थापक धीरूभाई अंबानी कहते और सोचते थे। धीरूभाई अंबानी का जन्म गुजरात के जूनागढ़ के चोरवाद में 28 दिसंबर 1932 को हुआ था। उनका पूरा नाम धीरजलाल हीरालाल अंबानी था। धीरूभाई अंबानी की कहानी फर्श से अर्श तक पहुंचने वाले उस शख्‍स की है जो मजबूत इरादों के दम पर शिखर पर विराजमान होता है। ये बात किसी ने सोचा नहीं होगा कि एक भजिया बेचने वाला शख्स दुनिया के सबसे रईस लोगों में शुमार हो जाएगा। आइए जानते हैं धीरूबाई अंबानी की करिश्माई कहानी।

भजिया बेचते थे धीरूभाई अंबानी

एक स्कूल टीचर हीराचंद गोवर्धनभाई अंबानी के घर में जन्मे धीरुभाई ने अपनी लगन और कड़ी मेहनत की वजह से दुनिया में अपना अलग मुकाम हासिल किया। धीरुभाई ने सिर्फ हाईस्कूल तक की शिक्षा पाई थी। अपने शुरुआती दिनों में धीरूभाई जूनागढ़ में माउंट गिरनार आने वाले तीर्थयात्रियों को भजिया बेचा करते थे। इसके बाद उन्होंने यमन के अदन शहर में 300 रुपये महीने पर A. Besse and Co. में गैस स्‍टेशन अटेंडेंट का काम करना शुरू किया। आठ साल वहां गुजारने के बाद 1958 में वो यमन से भारत लौट आए।

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धीरू भाई अंबानी के बारे में कहा जाता है कि जब वह मुंबई आए तो उनकी जेब में सिर्फ 500 रुपए थे। 500 रुपये की पूंजी के साथ अपने चचेरे भाई चंपकलाल दमानी के साथ एक टेक्‍सटाइल ट्रेडिंग कंपनी की शुरुआत की। इसके बाद अपने चचेरे भाई से अलग हो कर 1960 में रिलायंस कॉमर्शियल कॉरपोरेशन की स्‍थापना की। मुंबई के मस्जिद बंडर इलाके के नरसिनाथन स्‍ट्रीट में उन्‍होंने पहला ऑफिस खोला। उसका कवर एरिया केवल 350 स्‍क्‍वायर फीट था। उस ऑफिस में दो टेबल, तीन कुर्सियां और एक टेलीफोन था।

धीरूभाई अंबानी में सीखने की इतनी ललक थी कि अंग्रेजी के अखबारों को पढ़कर उन्‍होंने अंग्रेजी सीख ली क्‍योंकि बचपन में आर्थिक दिक्‍कतों के चलते वह बहुत ज्‍यादा शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाए थे। वह सीखकर लोगों को आगे बढ़ने और अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रेरित करते थे।

धीरूभाई अंबानी कहते थे,

यदि अपने सपनों का निर्माण नहीं कर पाएंगे तो कोई दूसरा आपको उसके सपने पूरा करने में मदद के लिए आपको हायर कर लेगा।

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500 रुपये से 75000 करोड़ का सफर

उनकी शुरुआती बड़ी सफलताओं में विमल साड़ी ब्रांड की कामयाबी रही। विमल पहला ऐसा टेक्‍सटाइल ब्रांड था जिसने बड़े पैमाने पर उपभोक्‍ताओं को आकर्षित किया। इसकी बानगी इसी से समझी जा सकती है कि 100 विमल फ्रेंचाइजी स्‍टोर केवल एक दिन के भीतर खोले गए थे जो एक रिकॉर्ड है। 1992 में जैसे ही देश में लाइसेंस राज खत्म हुआ, रिलायंस ने तेजी से तरक्की करना शुरू कर दिया। साल 1992 में ग्लोबल मार्केट से फंड जुटाने वाली रिलायंस देश की पहली कंपनी बन गई। साल 2000 के आसपास रिलायंस पेट्रो केमिकल और टेलीकॉम सेक्टर में भी आ गई।

धीरूभाई अंबानी ने अपनी मेहनत और विजन के दम पर ही रिलायंस इंडस्ट्री को बुलंदियों तक पहुंचाया था। 1976 में 70 करोड़ रुपए की कंपनी साल 2002 में 75,000 करोड़ की कंपनी बन गई।

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धीरे-धीरे उनकी कंपनी रिलायंस विश्व की बड़ी कंपनियों में शामिल होकर फॉर्च्यून 500 कंपनियों का हिस्सा बनी। इस दौरान उनपर कई बार अनैतिक तरीके से व्यापार करने के भी आरोप लगे हालांकि उन्होंने स्पष्ट रूप से मना कर दिया। नब्बे के दशक में अपनी  खराब तबियत के चलते उन्होंने अपना व्यापार अपने दोनों बेटों मुकेश अंबानी तथा अनिल अंबानी को सौंप दिया। 6 जुलाई 2002 को उनकी एक मेजर स्ट्रोक के कारण मुंबई के ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में मृत्यु हो गई।

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अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं

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