राजनीति

लेफ्ट नहीं राइट सियासत की सेंटर में आ गई हैं ममता दीदी, आंदोलन है इनकी USP

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| फरवरी 4 , 2019 , 15:39 IST

मोदी सरकार के खिलाफ कड़े तेवर दिखाकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अचानक से सेंटर में आ गई हैं। दरअसल, सीबीआई के बहाने ममता दी ने सियासत का बड़ा दांव खेला है। कहा जाता है देश की राजनीति हमेशा लुटियन जोन से तय होती है, लेकिन फिलहाल रविवार शाम से सियासत कोलकाता के मेट्रो चैनल पर शिफ्ट हो गई है, जहां रविवार रात से ही दीदी केंद्र की मोदी सरकार के तानाशाही रवैये के खिलाफ धरने पर बैठ गई है।

उन्होंने मोदी सरकार की कार्रवाई के खिलाफ हमला बोला है। कोलकाता पुलिस कमिश्नर के घर सीबीआई टीम पहुंचने के बाद मुख्यमंत्री रविवार रात से ही धरने पर हैं। हालांकि, ममता का इतने तेवर में आना पहली बार नहीं हुआ है, वह सालों पहले भी दबंग विपक्ष नेता के रूप में सामने आ चुकी हैं। पश्चिम बंगाल की मौजूदा मुख्यमंत्री ने मामूली-सी बात पर गंभीर बहस छेड़ी है।

भले ही इस बहस की शुरुआत सीबीआई की भूमिका और उस पर बदले की राजनीति के तहत काम करने के आरोपों से हुई हो, लेकिन आखिरकार यह केंद्र-राज्य संबंध, भारत की संघीय संरचना और विपक्षी एकता पर होने वाली चर्चाओं तक पहुंच जाएगी। लेकिन इसके बहाने ममता बनर्जी ने इस बहाने खुद को सियासत के सेंटर पॉइंट (केंद्र) में रख दिया है।

बीजेपी को विपक्ष से मिल रही है सीधी चुनौती

अगर इसे सियासत कहें, तो यह भी मानना होगा कि तृणमूल कांग्रेस की नेता ने फिलहाल बाजी मार ली है। तभी तो राहुल गांधी, लालू यादव, शरद पवार, एचडी देवगौड़ा, राज ठाकरे, चंद्रबाबू नायडू, अखिलेश यादव, उमर अब्दुल्ला, अरविंद केजरीवाल, तेजस्वी यादव, हेमंत सोरेन समेत तमाम विपक्षी नेताओं ने ममता बनर्जी की इस पहल की ना केवल सराहना की है बल्कि वे साथ में ‘कदमताल’ के लिए भी तैयार हो गए हैं। यह ‘मिले सुर मेरा-तुम्हारा…’ जैसे कोरस गान ती तरह नहीं है।

नंदीग्राम आंदोलन से ही सीएम की कुर्सी तक पहुंची है ममता दी

2011 में ममता बनर्जी पहली बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनी थीं। इससे पहले उन्होंने कई तेज-विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था। उनकी जीत के पीछे भी इन धरना-प्रदर्शनों से मिली लोकप्रियता को एक वजह माना गया। 2007 में नंदीग्राम के मुद्दे पर उन्होंने काफी बड़ा आंदोलन किया था। नंदीग्राम आंदोलन इतना बड़ा हो गया कि पुलिस फायरिंग में 14 किसानों को जान गंवानी पड़ी। लेकिन तत्कालीन सीएम बुद्धादेव भट्टाचार्य को केमिकल हब बनाने के प्रोजेक्ट से पीछे हटना पड़ा था।

सिंगूर में किसानों के समर्थन में टाटा के खिलाफ ममता ने छेड़ा था आंदोलन

इसी तरह 2008 में सिंगूर में भी ममता बनर्जी ने किसानों के समर्थन में टाटा मोटर्स के नैनो प्रोजेक्ट और जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ बड़ा प्रदर्शन किया था। ममता तब अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर भी बैठ गई थीं। आखिरकार प्रोजेक्ट को वापस लेना पड़ा।

रायटर्स बिल्डिंग के सामने घरने पर बैठ गई थीं ममता

इससे पहले जनवरी 1993 में केंद्रीय मंत्री रहते हुए ममता के राइटर्स बिल्डिंग पर किए गए विरोध-प्रदर्शन को ऐतिहासिक माना जाता है। तब ममता बनर्जी एक गूंगी-बहरी लड़की के साथ हुए रेप के मामले को लेकर पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु के राइटर्स बिल्डिंग स्थित दफ्तर पहुंच गई थीं। आरोप था कि लड़की के साथ एक सीपीएम वर्कर ने रेप किया। लेकिन दफ्तर में सीएम ने मिलने से इनकार कर दिया था, तब ममता ने वहां से जाने से मना कर दिया था। पुलिस ने उन्हें खींचकर बाहर किया था। तभी ममता ने फैसला किया था कि वह तब तक राइटर्स बिल्डिंग नहीं जाएंगी, जब तक वह सीपीएम को सत्ता से बाहर नहीं कर देतीं और उन्होंने ऐसा ही किया भी।

वहीं, तृणमूल कांग्रेस पार्टी के मुताबिक, तमाम आंदोलनों का सफल नेतृत्व करने के बाद ममता को लगा कि अब आगे बढ़ने के लिए कांग्रेस पार्टी से अलग चलने की जरूरत है। इसी सोच के साथ ममता ने 1 जनवरी 1998 को अलग पार्टी की स्थापना कर दी। ममता बनर्जी ने तब कहा था- 'पश्चिम बंगाल में एक आंदोलन शांति से आगे बढ़ रहा है. लोग इतिहास लिखने जा रहे हैं।

मोदी को सीधे चुनौती दे रहीं हैं ममता दी

इस साल होने वाले संसदीय चुनावों से ठीक पहले हुई यह घटना वार्साय की उस संधि की तरह है, जो द्वितीय विश्व युद्ध का तात्कालिक कारण बनी थी। सीबीआई के बहाने केंद्र के हस्तक्षेप को नकारने की यह कोशिश दरअसल लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता की मजबूत पहल के बतौर हमारे सामने है। विपक्षी नेता इस बहाने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और उसके नेता नरेंद्र मोदी को सीधी चुनौती दे रहे हैं।


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