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जिंदा रहते अंग्रेजों के हाथ नहीं आए थे आज़ाद (पुण्यतिथि विशेष)

न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया | 0
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| फरवरी 27 , 2018 , 14:49 IST

चंद्रशेखर आज़ाद की गिनती दुनिया के महान क्रांतिकारियों में की जाती है। उन्होंने कसम खाई थी कि वह जीते-जी विदेशी शासकों के हाथ नहीं आएंगे और यह सच है कि अंग्रेज उन्हें जीवित पकड़ने में नाकामयाब रहे।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इस महान योद्धा का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में हुआ था। लाला लाजपत राय के देहांत के बाद आज़ाद ने ही भगत सिंह व अन्य क्रांतिकारियों को ट्रेनिंग दी थी।

आज के दिन 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद में पुलिस ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया था और गोलियां चलाना शुरु कर दी थी। दोनों तरफ से फायरिंग की जा रही थी। चंद्रशेखर ने अपनी जिंदगी में कसम खाई हुई थी कि वह कभी भी जिंदा पुलिस के हाथ नहीं लगेंगे। इसलिए उन्होंने उस समय खुद ही को गोली मार दी थी।

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सन् 1922 में गाँधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन के सक्रिय सदस्य बन गये। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में पहले 9 अगस्त 1925 को काकोरी काण्ड किया और फरार हो गये।

 आजाद

इसके पश्चात् सन् 1927 में 'बिस्मिल' के साथ 4 प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन का गठन किया तथा भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सॉण्डर्स का हत्या करके लिया एवं दिल्ली पहुँच कर असेम्बली बम काण्ड को अंजाम दिया।

आजाद का प्रारम्भिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित भाबरा गाँव में बीता, अतएव बचपन में आजाद ने भील बालकों के साथ खूब धनुष बाण चलाये। इस प्रकार उन्होंने निशानेबाजी बचपन में ही सीख ली थी।

बालक चन्द्रशेखर आज़ाद का मन अब देश को आज़ाद कराने के अहिंसात्मक उपायों से हटकर सशस्त्र क्रान्ति की ओर मुड़ गया। उस समय बनारस क्रान्तिकारियों का गढ़ था।

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वह मन्मथनाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी के सम्पर्क में आये और क्रान्तिकारी दल के सदस्य बन गये। क्रान्तिकारियों का वह दल "हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ" के नाम से जाना जाता था।

चंद्रशेखर सिर्फ 14 साल की उम्र में 1921 में गांधी जी के असहयोग आंदोलन से जुड़ गए थे और तभी उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और जब जज ने उनसे उनके पिता नाम पूछा तो जवाब में चंद्रशेखर ने अपना नाम आजाद और पिता का नाम स्वतंत्रता और पता जेल बताया। यहीं से चंद्रशेखर सीताराम तिवारी का नाम चंद्रशेखर आजाद पड़ा।


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