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छठ पूजा: दूसरे दिन आज है खरना, ये है पूजा-विधि

icon अमितेष युवराज सिंह | 0
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| नवंबर 12 , 2018 , 11:14 IST

12 नवंबर सोमवार कार्तिक शुक्ल पंचमी है। इसी दिन छठ का खरना मनाया जाता है। खरना के दिन खीर पूड़ी बनाई जाती है। सोमवार को ज्ञान पंचमी और जया पंचमी भी है। माँ सरस्वती और माँ लक्ष्मी को खीर पूड़ी का भोग लगाएं। कार्तिक छठ को सूर्य बच्चों का मित्र बन जाता है। संतानहीन को संतान मिलेगा। छठ बहुत कठिन और सावधानी का पर्व होता है। छठी मैया बहुत से लोगों की हर मनोकामना पहले ही पूरी कर देती है। लोग फिर अपनी मन्नत पूरी होने पर छठ की व्रत पूजा करते हैं।

खरना का नियम-

छठ के दूसरे दिन खरना करने की अपनी मान्यता है, ऐसा माना जाता है कि इस दिन वर्ती को इस प्रकार खरना करना शुभ माना जाता है।

- साफ़ सुथरे चूल्हे में खीर पूड़ी बनेगी,

- महिलाएं और छठ व्रती सुबह स्नान करके साफ़ सुथरे वस्त्र धारण करेंगे

- नाक से माथे के मांग तक सिंदूर लगेगा

- अरवा बासमती चावल, गाय का दूध और गुड़ का इंतज़ाम करेंगे

- चीनी इस्तेमाल नहीं होगी

उसके बाद खीर बनेगी और आटे की पूड़ी तेल या घी में बनेगी।

सूर्य को चढ़ाने की वस्तुएं-

आटे, गुड़ से बना ठेकुआ या आटे का हलवा, गन्ना, केले, अदरक, मूली, मीठा निम्बू, कच्ची हल्दी, नयी फसल, लाल फूल, लाल चन्दन, धूप, दीपक, बांस की डालिया, ताम्बे का पात्र सूप, शुद्ध जल, दूध, चावल, अक्षत

इस दिन व्रती शुद्ध मन से सूर्य देव और छठ मां की पूजा करके गुड़ की खीर का भोग लगाते हैं। खीर पकाने के लिए साठी के चावल का प्रयोग किया जाता है। भोजन काफी शुद्ध तरीके से बनाया जाता है। खरना के दिन जो प्रसाद बनता है, उसे नए चूल्हे पर बनाया जाता है। व्रती खीर अपने हाथों से पकाते हैं। शाम को प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रतियों का 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।

13 नवंबर को दें डूबते सूर्य को अर्घ्य

सुबह को सूर्य पूजा और छठी मैया की पूजा करेंगे। छठ के सामान की धुलाई और साफ़ सफाई करेंगे। साफ़ करके डलिया में से सूप में ठेकुआ, हलवा, फल फूल, चन्दन रखना है. सबसे पहले सूप लेकर पानी में उतरा जाता है। 13 नवंबर मंगलवार शाम को नदी तालाब में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देंगे।

क्यों होती है छठ मैया की पूजा

सूर्यदेव की उपासना का पर्व छठ प्रात: काल सूर्य की प्रथम किरण और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण को अर्घ्य देकर पूर्ण किया जाता है। प्रात: काल में सूर्य की प्रथम किरण ऊषा, सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण प्रत्यूषा को अर्घ्य देकर उपासना की जाती है। छठ मैया, सूर्यदेव की बहन हैं और सूर्योपासना से वह प्रसन्न होकर घर परिवार में सुख-शांति प्रदान करती हैं।

षष्ठी देवी को ही छठ मैया कहा गया है। षष्ठी देवी को ब्रह्मा की मानसपुत्री भी कहा गया है, जो निसंतानों को संतान प्रदान करती हैं। संतान को दीर्घायु प्रदान करती हैं। जन्म के छठे दिन मनाई जाने वाली छठी पर षष्ठी देवी की ही पूजा की जाती है। मां छठी को कात्यायनी नाम से भी जाना जाता है। नवरात्रि की षष्ठी तिथि को इन्हीं की पूजा की जाती है। छठ पर्व को लेकर मान्यता है कि रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान श्रीराम और माता सीता ने उपवास रखकर सूर्यदेव की पूजा की थी। एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व का आरंभ महाभारतकाल में हुआ। सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा शुरू की। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे और पूजा के पश्चात किसी याचक को कभी खाली हाथ नहीं लौटाते थे।


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अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं

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