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सुरैया से प्यार करते थे देवानंद फिर क्यों करनी पड़ी किसी और से शादी (जयंती विशेष)

icon अमितेष युवराज सिंह | 0
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| सितंबर 26 , 2017 , 18:52 IST

हिंदी सिनेमा में अपने ख़ास अंदाज़ के लिए जाने जाने वाले अभिनेता धर्मदेव आनंद उर्फ देव आनंद साहब की आज जयंती है। वो एक ऐसे हीरो रहे हैं जो वक्त के हिसाब से नहीं बल्कि अपने हिसाब से सिनेमा के समय को ढाल लेते थे।

देवानंद ने निश्चय किया कि अगर नौकरी ही करनी है तो क्यों ना फिल्म इंडस्ट्री में किस्मत आजमाई जाये। वर्ष 1943 में अपने सपनों को साकार करने के लिये जब वह मुम्बई पहुंचे तब उनके पास मात्र 30 रुपये थे और रहने के लिये कोई ठिकाना नहीं था। देवानंद ने यहां पहुंचकर रेलवे स्टेशन के समीप ही एक सस्ते से होटल में कमरा किराये पर लिया। उस कमरे में उनके साथ तीन अन्य लोग भी रहते थे जो देवानंद की तरह ही फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिये संघर्ष कर रहे थे।

जब काफी दिन यूं ही गुजर गये तो देवानंद ने सोचा कि यदि उन्हें मुंबई में रहना है तो जीवन-यापन के लिये नौकरी करनी पड़ेगी चाहे वह कैसी भी नौकरी क्यों न हो। अथक प्रयास के बाद उन्हें मिलिट्री सेन्सर ऑफिस में लिपिक की नौकरी मिल गयी। यहां उन्हें सैनिको की चिट्ठियों को उनके परिवार के लोगो को पढ़कर सुनाना होता था। लगभग एक वर्ष तक मिलिट्री सेन्सर में नौकरी करने के बाद वह अपने बड़े भाई चेतन आनंद के पास चले गये जो उस समय। भारतीय जन नाट्य संघ इप्टा से जुड़े हुये थे। उन्होंने देवानंद को भी अपने साथ इप्टा मे शामिल कर लिया। इस बीच देवानंद ने नाटकों में छोटे मोटे रोल किये।

वर्ष 1945 में प्रदर्शित फिल्म 'हम एक है' से बतौर अभिनेता देवानंद ने अपने सिने कैरियर की शुरूआत की। वर्ष 1948 मे प्रदर्शित फिल्म जिद्दी देवानंद के फिल्मी कैरियर की पहली हिट फिल्म साबित हुयी । इस फिल्म की कामयाबी के बाद उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र मे कदम रख दिया और नवकेतन बैनर की स्थापना की ।नवकेतन के बैनर तले उन्होंने वर्ष 1950 मे अपनी पहली फिल्म अफसर का निर्माण किया जिसके निर्देशन की जिम्मेदारी उन्होंने बड़े भाई चेतन आनंद को सौंपी। इसके बाद देवानंद ने अपने बैनर तले वर्ष 1951 में बाजी बनायी। गुरुदत्त के निर्देशन में बनी फिल्म बाजी की सफलता के बाद देवानंद फिल्म इंडस्ट्री मे एक अच्छे अभिनेता के रूप मे शुमार हो गये

सुरैया से करते थे महोब्बत-

फिल्म अफसर के निर्माण के दौरान देवानंद का झुकाव फिल्म अभिनेत्री सुरैया की ओर हो गया था। एक गाने की शूटिंग के दौरान देवानंद और सुरैया की नाव पानी में पलट गयी। देवानंद ने सुरैया को डूबने से बचाया। इसके बाद सुरैया देवानंद से बेइंतहा मोहब्बत करने लगीं लेकिन सुरैया की नानी की इजाजत न मिलने से यह जोड़ी परवान नही चढ़ सकी। नतीजा ये हुआ कि सुरैया सारी उम्र कुंवारी रहीं। गुरु दत्त की पहली फ़िल्म 'बाजी' में देव आनंद और कल्पना कार्तिक की जोड़ी को लोगों ने खूब पसंद किया। इसके बाद दोनों ने कई फ़िल्में साथ की, जैसे 'आंधियां, टैक्सी ड्राइवर नौ दो ग्यारह।' इसी दौरान दोनों के बीच प्यार हुआ और फ़िल्म 'टैक्सी ड्राइवर' के बाद दोनों ने वर्ष 1954 में शादी कर ली।

फिल्म के लंच ब्रेक में कर ली थी शादी-

देव आनंद की शादी का किस्सा भी बेहद मशहूर है। उन्होंने साल 1954 में फिल्म की शूटिंग के दौरान लंच ब्रेक में अपनी सह कलाकार कल्पना कार्तिक से शादी कर ली थी। दोनों की शादी लंबे समय तक नहीं चल सकी। उनके दो बच्चे हुए। सुनील आनंद और देविना आनंद। देविना वही नाम था जो देव की शादी से पहले उन्होंने और सुरैया ने अपनी बेटी के लिए सोचा था।

काले सूट पहनने पर लगा था बैन-

देव आनंद उस ज़माने के सबसे हैंडसम अभिनेताओं में से एक थे। उनके प्रति लोगों की दीवानगी ऐसी थी कि उन्हें काला सूट पहने देख युवतियां छत से कूद जाती है। इस वजह से सार्वजनिक जगहों पर देव आनंद के काला सूट पहनने पर बैन लगा दिया गया था। देव आनंद के घर का नाम चीरू था।

पहली रंगीन फिल्म-

देवानंद प्रख्यात उपन्यासकार आर.के.नारायण से काफी प्रभावित रहा करते थे और उनके उपन्यास गाइड पर फिल्म बनाना चाहते थे। आर.के.नारायणन की स्वीकृति के बाद देवानंद ने हॉलीवुड के सहयोग से हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं मे फिल्म गाइड का निर्माण किया जो देवानंद के सिने कैरियर की पहली रंगीन फिल्म थी। इस फिल्म के लिये देवानंद को उनके जबरदस्त अभिनय के लिये सर्वश्रेष्ठ अभिनेता फिल्म फेयर पुरस्कार भी दिया गया।

बतौर निर्माता देवानंद ने कई फिल्में बनायी। इन फिल्मों मे वर्ष 1950 मे प्रदर्शित फिल्म अफसर के अलावा हमसफर, टैक्सी ड्राइवर, हाउस न. 44, फंटूश, कालापानी, काला बाजार, हमदोनो, तेरे मेरे सपने, गाइड और ज्वैल थीफ आदि कई फिल्में शामिल हैं।

निर्देशन के क्षेत्र में रखा कदम-

वर्ष 1970 मे फिल्म प्रेम पुजारी के साथ देवानंद ने निर्देशन के क्षेत्र मे भी कदम रख दिया। हांलाकि यह फिल्म बॉक्स आफिस पर बुरी तरह से नकार दी गयी। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इसके बाद वर्ष 1971 मे फिल्म हरे रामा हरे कष्णा का भी निर्देशन किया जिसकी कामयाबी के बाद उन्होंने हीरा पन्ना, देश परदेस, लूटमार, स्वामी दादा, सच्चे का बोलबाला और अव्वल नंबर समेत कुछ फिल्मों का निर्देशन भी किया।

पुरस्कार-

देवानंद को अभिनय के लिये दो बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 2001 मे एक ओर जहां देवानंद को भारत सरकार की ओर से पद्मभूषण सम्मान प्राप्त हुआ। वर्ष 2002 में हिन्दी सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुये उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। अपनी निर्मित फिल्मों से दर्शकों के दिलों मे खास पहचान बनाने वाले महान फिल्मकार देवानंद तीन दिसंबर 2011 को इस दुनिया को अलविदा कह गये।

 


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अमितेष युवराज सिंह

लेखक न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं

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