ओपिनियन

गांधी मैदान में फांसी दी जाए

icon डॉ. वेदप्रताप वैदिक | 0
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| अगस्त 7 , 2018 , 13:40 IST

बिहार के मुजफ्फरपुर में एक अनाथालय की बच्चियों के साथ जो बलात्कार की घटनाएं हुई हैं, वे रोंगटे खड़े कर देती हैं। उन घटनाओं का जैसा ब्यौरा अखबारों और टीवी चैनलों पर आ रहा है, उसे पढ़-देखकर हर भारतीय का माथा शर्म से झुका जा रहा है लेकिन राजनीतिक स्तर पर एक अजीब-सी चुप्पी छाई हुई है। यह चुप्पी ऐसा संदेश दे रही है मानो यह कोई ध्यान देने लायक घटना ही नहीं है। नेताओं को फुर्सत कहां है ?

देश के दोनों महान नेता परम व्यस्त हैं। एक विदेशों के दौरे लगा रहा है और दूसरा सारे प्रांतों के चक्कर लगाकर चुनावों की तैयारी में जुटा हुआ है। विरोधी नेता अपनी रोटियां सेंकने में लगे हुए हैं। बिहार के राज्यपाल सत्यपाल मलिक की हिम्मत और पहल की मैं दाद देता हूं, जिन्होंने बिहार और राष्ट्र के प्रधान सेवकों को पत्र लिखकर उनकी नींद उड़ाने की कोशिश की है। वह अनाथालय या आश्रय-स्थल सरकारी वित्त-पोषित है और वहां की 42 में से 34 बच्चियों ने रो-रोक यह रहस्य खोला है कि उस आश्रय-स्थल का संचालक उन पर कैसे-कैसे अत्याचार करता था।

जिस लड़की ने भी उसके बलात्कार या व्यभिचार का विरोध किया, उसे भूखों मार दिया जाता था, नशे की दवाई खिलाकर बेहोश कर दिया जाता था और एक-दो लड़कियों की तो हत्या करके उन्हें गुपचुप जमीन में गाड़ दिया गया था। इस आश्रय-स्थल के इस कुकर्म का पता तब चला, जबकि मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोश्यल साइंसेस की आडिट रिपोर्ट में इस यौन-शोषण का विवरण छपा और उसे बिहार के समाज कल्याण मंत्रालय को सौंपा गया। यहां प्रश्न यही उठता है कि मुजफ्फरनगर के पत्रकार क्या करते रहे ? बिहार के पत्रकारों के लिए क्या यह कांड एक शर्मनाक चुनौती सिद्ध नहीं हुआ ?

इस संस्था का संचालक ब्रजेश ठाकुर काफी पैसे और रसूखवाला आदमी है। क्या उसने सारे नेताओं और पत्रकारों को अपनी जेब में डाल रखा है ? यह अच्छा हुआ कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस कांड पर ध्यान दिया है। यदि वह मुख्य अपराधी और उसके साथियों को अगस्त माह के अंत तक पटना के गांधी मैदान में फांसी पर लटका दे तो देश में ऐसी हरकत कोई दुबारा करने की हिम्मत नहीं करेगा।