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जर्मनी में फिर एंजेला मर्केल

icon डॉ. वेदप्रताप वैदिक | 0
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| सितंबर 27 , 2017 , 12:01 IST

जर्मनी में चांसलर एंजेला मर्केल की पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन और क्रिश्चियन सोशल यूनियन को कुल 94 सीटें व 33 प्रतिशत वोट मिले। इस चुनाव में उनके 8 प्रतिशत वोट कम हो गए। इसके बावजूद वे सबसे ज्यादा सीट और वोट वाली पार्टियां बन गई हैं। दूसरे शब्दों में मर्केल अब चौथी बार जर्मनी की चांसलर बनेंगी लेकिन इस बार उन्हें ज्यादा दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। उनकी पुरानी सहयोगी पार्टी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी को सिर्फ 20 प्रतिशत वोट मिले हैं। इस बार वह सरकार में शामिल नहीं होगी। वह प्रतिपक्ष की भूमिका में रहेगी।

इस बार मर्केल की कोशिश रहेगी कि वे ग्रीन्स, डाईलिंक और फ्रीडेमोक्रेटिक पार्टियों से मिलकर गठबंधन सरकार खड़ी करें। यह गठबंधन बड़ा टेढ़ा-मेढ़ा बनेगा, क्योंकि ये छोटी पार्टियां एक-दूसरे को फूटी आंखों नहीं सुहातीं। वे एक साथ कैसे काम करेंगी ? श्रीमती मर्केल की लोकप्रियता और ताकत पहले की तुलना में घट गई है, खासकर एक दक्षिणपंथी पार्टी ‘आल्टरनेटिव फॉर डाट्सलेंड’ के अचानक उदय के कारण ! जर्मनी के पिछले 72 साल के इतिहास में यह पहली राष्ट्रवादी पार्टी हैं, जिसका खाता जर्मन संसद में खुला है। इस पार्टी को 13 प्रतिशत वोट और 80 सीटें मिली हैं। यह पार्टी भी विरोध में बैठेगी। इस पार्टी ने मर्केल की शरणार्थी नीति और आतंकवाद का डटकर विरोध किया था। सीरिया, लीब्या और तुर्की से आनेवाले लगभग 13 लाख शरणार्थियों के खिलाफ इस पार्टी ने जबर्दस्त अभियान चला रखा था। इस पार्टी में पुराने नात्सीवादी, इस्लाम-विरोधी, बुर्का-विरोधी और घोर अतिवादी शामिल हैं। इसने ऐसी लहर उठा दी थी कि कभी-कभी लगता था कि मर्केल का सूंपड़ा साफ हो जाएगा लेकिन चुनाव के दौरान मर्केल ने कुछ लचीलापन दिखाकर उस लहर पर काबू पा लिया।

कोई आश्चर्य नहीं कि मर्केल इस अकेली पार्टी के विरुद्ध सभी दलों को जोड़कर एक संयुक्त मोर्चा खड़ा कर लें। विश्व-राजनीति में आज उनकी छवि बेजोड़ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खरी-खरी सुनाकर मर्केल ने अपनी छवि यूरोप में तो उच्चतम बिंदु तक पहुंचा ही दी है, उनकी गणना आजकल विश्व नेताओं में होने लगी हैं। उन्होंने जर्मनी को आर्थिक दृष्टि से सक्षम बनाया है और रुस, चीन, अमेरिका और ब्रिटेन से अपने संबंधों को उचित स्तर पर बनाए रखा है। यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के बाहर होने के बाद जर्मनी की भूमिका यूरोप में पहले से ज्यादा निर्णायक हो जाएगी।