ईरान में हड़कंप और भारत

icon डॉ. वेदप्रताप वैदिक | 0
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| जनवरी 5 , 2018 , 15:49 IST

आजकल ईरान में जबर्दस्त प्रदर्शन हो रहे हैं। हजारों लोग सड़क पर उतर आए हैं। वे तोड़-फोड़ भी कर रहे हैं। वे लोग न तो उच्च वर्ग के हैं और न ही मध्यम वर्ग के। इनमें से ज्यादातर लोग मजदूर वर्ग के हैं, ग्रामीण हैं और छोटे-छोटे शहरों में उनका जोर ज्यादा है। अभी तक दो दर्जन लोग मारे गए हैं और सैकड़ों गिरफ्तार हो चुके हैं। मुझे नहीं लगता कि ये प्रदर्शन शंहशाह के खिलाफ 1976-77 में हुए देशव्यापी भयंकर प्रदर्शनों की तरह हैं। इनकी तुलना 2009 में अहमदनिजाद सरकार के विरुद्ध हुए प्रदर्शनों से भी नहीं की जा सकती।

यह असंतोष इसलिए भड़का है कि ईरान की अर्थव्यवस्था संभल नहीं पा रही है। ईरान की परमाणु-नीति के कारण लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने काफी दुर्दशा कर दी थी लेकिन अब जबकि ज्यादातर राष्ट्रों ने उन्हें हटा लिया है, अभी भी आशा की कोई किरण दिखाई नहीं पड़ रही है। रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजों के भाव दुगुने हो गए हैं। ईरान के लोगों में 60 प्रतिशत युवा हैं। वे बेरोजगारी के शिकार हो रहे हैं। भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं है। इस आंदोलन का कोई निश्चित नेता नहीं है, जैसे कि 1975-77 में आयतुल्लाह खुमैनी थे।

यह असंभव नहीं कि सरकारी दमन के सामने यह टिक ही नहीं पाए। लेकिन इस आंदोलन में पहली बार ईरान के सर्वोच्च इस्लामी नेता ‘अली खामेनई मुर्दाबाद’ के नारे लगे हैं। राष्ट्रपति हसन रुहानी, जो कि मूलतः उदारवादी हैं, उन पर भी नारों की मार पड़ रही है। लोग यह भी पूछ रहे हैं कि जब ईरान की आर्थिक स्थिति इतनी खराब है तो वह सीरिया, इराक, लेबनान और यमन के बागियों पर इतना पैसा और हथियार क्यों लुटा रहा है?

40 साल में यह पहली बार हो रहा है कि बादशाहत की वापसी के नारे भी लगे हैं। इन प्रदर्शनों से डोनाल्ड ट्रंप और इस्राइल के नेतन्याहू खुश दिखाई पड़ रहे हैं लेकिन ईरानी सरकार उनका नाम लिए बिना उन्हें आग में घी डालनेवाला कह रही है। इस मौके पर भारत का तटस्थ रहना ही हितकर है। हम ट्रंप और नेतन्याहू की आवाज़ में आवाज़ मिला कर न अपना भला करेंगे और न ही ईरान का। यदि ईरान स्थिर और खुशहाल रहता है तो इससे आखिरकार भारत को ही मदद मिलेगी। भारत चाबहार बंदरगाह का इस्तेमाल तो करेगा ही, ईरान से तेल-उत्पादन के सौदे पर भी फिर से बात की जा सकती है।