ओपिनियन

विश्व हिंदी पिकनिक ?

icon डॉ. वेदप्रताप वैदिक | 0
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| अगस्त 21 , 2018 , 21:31 IST

मॉरिशस में जो हुआ, वह 11वां विश्व हिंदी सम्मेलन था। वह तीन दिन चला। 18, 19 और 20 अगस्त ! लेकिन उसे महत्व कैसा मिला ? जैसा कि किसी गांव या छोटे शहर की गोष्ठी-जैसा ! क्यों ? सरकारी लोग इसका कारण अटलजी को बताते हैं। उनका कहना है कि अटलजी के अवसान के कारण देश ने उस सम्मेलन पर कोई ध्यान नहीं दिया। सारे अखबार और टीवी चैनलों पर अटलजी ही अटलजी दिखाई पड़ रहे थे। यह सच है लेकिन उसी दौरान पाकिस्तान में इमरान खान की शपथ भी हुई। उस पर सारे अखबार और चैनल क्यों टूट पड़े ?

क्या हमारा विश्व हिंदी सम्मेलन इतना गया-बीता है कि उस पर हिंदी अखबारों और चैनलों ने भी अपनी आंखें फेर लीं ? कुछ हिंदी अखबारों में थोड़ी-बहुत खबर छपी, वह भी उल्टी-सीधी। आज मैंने इंटरनेट पर तलाश की तो पता चला कि मोरिशस में घोर अव्यवस्था रही। जो लोग भी गए थे, उन्होंने बड़ा अपमानित महसूस किया। जिन पोस्टरों का बड़ा प्रचार किया गया था, उन पर अज्ञेयजी और नीरजजी जैसे प्रसिद्ध कवियों के नाम ही गलत-सलत लिखे गए थे। कुछ मित्रों ने मोरिशस से फोन करके बताया कि सिर्फ दक्षिणपंथी साहित्यकारों का वहां जमावड़ा था। दक्षिणपंथियों याने भाजपाई और संघी साहित्यकार ! देश के अनेक मूर्धन्य साहित्यकारों, हिंदीसेवियों और हिंदी पत्रकारों को निमंत्रण तक नहीं भेजे गए। मैंने जब भी हिंदी के लिए देश में कोई आंदोलन चलाया, हमेशा सभी राजनीतिक दलों और सभी हिंदीप्रेमियों का सहयोग लिया। भोपाल का 10 वां और मोरिशस का यह 11 वां सम्मेलन भाजपा सरकार ने आयोजित किया लेकिन अन्य सरकारों द्वारा आयेाजित सम्मेलनों- जैसा सर्वसमावेशी चरित्र इस सम्मेलन का नहीं रहा। इसका दोष विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को देना उचित नहीं है। सुषमा-जैसे हिंदीप्रेमी इस सरकार में कितने हैं ?

वे हिंदी की विलक्षण वक्ता हैं। वे मेरे साथ अनेक हिंदी-आंदोलनों में कंधा से कंधा मिलाकर काम करती रही हैं। वे स्वयं वर्तमान सरकार की संकीर्ण और अहमन्य संस्कृति की शिकार हैं। उन्हें कोई स्वतंत्र विदेश मंत्री की तरह काम करने दे, तब तो वे कुछ करके दिखाएं। डर के मारे सारे मंत्री जी-हुजूरी में लगे हैं। 43 साल से चल रहा यह विश्व हिंदी सम्मेलन शुद्ध रुप से विश्व हिंदी पिकनिक बन गया है। इस पर संघ और भाजपा या जनसंघ की हिंदी नीति का कोई असर कहीं दिखाई नहीं पड़ता। गैर-भाजपाई सरकारें इसे कम से कम सर्वसमावेशी पिकनिक का रुप तो दे देती थीं। प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन (नागपुर, 1975) में जो प्रस्ताव पारित हुए थे, वे आज तक लागू नहीं हुए हैं। देखें, अगली सरकार क्या करती है ?