ओपिनियन

काबुल में कहीं हम फिसल न जाएं

icon डॉ. वेदप्रताप वैदिक | 0
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| सितंबर 13 , 2017 , 15:51 IST

भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और अफगान विदेश मंत्री सलाहुद्दीन रब्बानी ने दिल्ली में चार समझौतों पर दस्तखत किए हैं। ये समझौते 2011 में हुए सामरिक भागीदारी के बड़े समझौते के तहत हुए हैं। अब तक भारत दो बिलियन डॉलर से ज्यादा राशि अफगानिस्तान में लगा चुका है। भारत ने वहां सड़कें, अस्पताल, नहरें, बिजली घर, स्कूल आदि और संसद भवन भी बनाया है। चार हेलिकॉप्टर भी दिए हैं। बरसों से सैकड़ों अफगान फौजियों को भारत सैन्य-प्रशिक्षण भी देता रहा है। भारत अपनी मदद की मात्रा बढ़ाए, यह तो अच्छी बात है। डोनाल्ड ट्रंप ने भी यही कहा है लेकिन डर यही है कि मोदी सरकार कहीं ट्रंप के जाल में न फंस जाए। कहीं भारत सरकार अफगानिस्तान में अपनी फौज भेजने की गल्ती न कर बैठे।

अब से 35 साल पहले जब काबुल में बबरक कारमल की कम्युनिस्ट सरकार थी तब सोवियत संघ चाहता था कि भारत वहां अपनी फौजें भेज दे और जब 15 साल पहले हामिद करजई की सरकार बनी तो अमेरिका चाहता था कि उसकी जगह भारत की फौजें काबुल में चली जाएं। जनवरी 1981 में प्रधानमंत्री बबरक कारमल ने काबुल में मुझसे आग्रह किया था कि मैं हमारी प्रधानमंत्री इंदिराजी को पटाऊं कि वे भारतीय फौजें काबुल भेज दें। बबरक मेरे पुराने दोस्त थे। मुझे उन्हें साफ-साफ शब्दों में समझाना पड़ा कि भारत यह काम क्यों नहीं कर सकता।

करजई के राष्ट्रपति बनने के बाद मेरी कई अमेरिका-यात्राओं के दौरान वाशिंगटन में स्टेट डिपार्टमेंट के अधिकारी भी लगभग वही बात कहते पाए गए। हमारे प्रधानमंत्रियों में से इंदिराजी, नरसिंहरावजी और अटलजी के सामने भी इस तरह के प्रस्ताव आए लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। मनमोहनसिंहजी ने सैन्य-प्रशिक्षण और उपकरण तो दिए लेकिन हमारे फौजी भेजने के पक्ष में वे भी नहीं थे। 2005 में उनके साथ मैं भी काबुल गया था। वहां पूर्व बादशाह जाहिरशाह, विदेश मंत्री सलाहुद्दीन के पिता, बुराहुनुद्दीन रब्बानी, करजई तथा कई प्रमुख नेताओं से मेरी बातचीत में मैंने उन्हें यही बताया कि हम अपनी फौज अफगानिस्तान क्यों नहीं भेज सकते। श्रीलंका का कटु अनुभव भी तब तक हमारे सामने आ चुका था। अब डर यही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहीं इस भुलावे में न फिसल जाएं कि पिछले प्रधानमंत्री तो कमजोर थे। वे पूर्ण बहुमतवाले 30 साल में पहले प्रधानमंत्री हैं। इसलिए वे भारतीय फौज को काबुल भेजने की हिम्मत क्यों नहीं दिखाएं ?

यह बड़ी नासमझी होगी। ट्रंप का कुछ भरोसा नहीं। रुस इस समय तालिबान पर नरम पड़ा हुआ है। चीन डटकर पाकिस्तान का समर्थन करेगा। ऐसे में भारत अपनी टांग फंसाकर बुरी तरह पछताएगा। नोटबंदी में मोदी के दुस्साहस के नतीजे देश भुगत रहा है। यदि हम अफगानिस्तान के दलदल में फंस गए तो उससे निकलना बहुत मुश्किल हो जाएगा। आशा है, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के रहते भारत सरकार ऐसी भूल नहीं करेगी।